491 दिन तक दुश्मन के इलाके में फंसा रहा यूक्रेनी सैनिक, भारी ड्रोन से हुआ रेस्क्यू; 62 किमी का सफर 74 मिनट में पूरा
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच एक घायल यूक्रेनी सैनिक को बचाने के लिए अनोखा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, कोस्त्यांतिन व्लासेंको नाम का सैनिक करीब 491 दिनों तक मोर्चे पर फंसा रहा। चारों तरफ रूसी सैनिकों का खतरा था, जमीन पर बारूदी सुरंगें बिछी थीं और पैदल बचाव दल के लिए वहां पहुंचना बेहद मुश्किल था। आखिरकार यूक्रेनी सेना ने भारी क्षमता वाले ड्रोन की मदद से उसे बाहर निकाला।
बताया गया है कि ड्रोन ने करीब 62 किलोमीटर की दूरी तय कर घायल सैनिक को सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचाया। इस अभियान में लगभग 1 घंटा 14 मिनट 36 सेकंड लगे। इसके बाद सैनिक को जमीन पर चलने वाले रोबोटिक वाहन की मदद से आगे ले जाया गया और फिर अस्पताल पहुंचाया गया। फिलहाल उसका इलाज जारी है और उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है।
यूक्रेन की सरकारी सैन्य समाचार एजेंसी आर्मीइन्फॉर्म ने इस रेस्क्यू से जुड़ा वीडियो जारी किया है। इस ऑपरेशन में कई सैन्य इकाइयों, ड्रोन ऑपरेटरों और तकनीकी विशेषज्ञों ने मिलकर काम किया।
रूसी ड्रोन हमले में साथी की मौत, व्लासेंको भी हुए गंभीर घायल
रिपोर्ट के अनुसार, कोस्त्यांतिन व्लासेंको पूर्वी यूक्रेन के कुपियांस्क मोर्चे पर तैनात थे। वहां रूसी सेना के हमलों का लगातार खतरा बना रहता था। व्लासेंको और उनका एक साथी कंक्रीट के नाली पाइप में बने अस्थायी ठिकाने पर रहकर मोर्चा संभाल रहे थे।
14 फरवरी को रूसी सेना के ड्रोन हमले में उनके साथी की मौत हो गई। हमले में निकले विस्फोटक के छर्रों से व्लासेंको भी गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए थे। हालत बिगड़ने के बावजूद उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाना संभव नहीं था, क्योंकि उस इलाके में पहुंचना बचाव दल के लिए बेहद जोखिम भरा था।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उनके दाहिने पैर में गैंगरीन फैल गया था। इलाज नहीं मिलने और स्थिति गंभीर होने के कारण व्लासेंको ने कथित तौर पर खुद ही अपना पैर काटकर अलग कर दिया।
ड्रोन से पहुंचाया जाता था खाना, पानी और दवाइयां
गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद व्लासेंको को पूरी तरह अकेला नहीं छोड़ा गया था। यूक्रेनी सेना ड्रोन के जरिए उनके लिए खाना, पानी और दवाइयां पहुंचाती थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, हर चार से पांच दिन में जरूरी सामान उनके ठिकाने के पास गिराया जाता था। व्लासेंको रेंगकर वहां पहुंचते और सामान इकट्ठा करते थे। इसी मदद के सहारे वह दुश्मन के खतरे के बीच लंबे समय तक जीवित रहे।
हालांकि, उन्हें वहां से निकालना एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। जमीन पर बारूदी सुरंगों और दुश्मन की मौजूदगी के कारण सामान्य बचाव अभियान चलाना बेहद मुश्किल था।
जमीन पर चलने वाला रोबोट भी नहीं हो पाया सफल
व्लासेंको को सुरक्षित निकालने के लिए यूक्रेनी सेना ने पहले जमीन पर चलने वाले रोबोट का इस्तेमाल करने की कोशिश की। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, रूसी सैनिकों ने रोबोट को रास्ते में ही पहचान लिया और उसे नष्ट कर दिया।
इसके बाद सेना के सामने चुनौती थी कि घायल सैनिक तक पहुंचने के लिए ऐसा तरीका खोजा जाए, जिसमें बचाव दल के जवानों की जान भी खतरे में न पड़े। आखिरकार 30वीं मैकेनाइज्ड ब्रिगेड और 92वीं असॉल्ट ब्रिगेड के सैनिकों ने भारी ड्रोन की मदद से रेस्क्यू ऑपरेशन की योजना बनाई।
इस अभियान की तैयारी में करीब छह महीने लगने की बात कही गई है। तकनीकी विशेषज्ञों और सैनिकों ने मिलकर ऐसी व्यवस्था तैयार की, जिससे घायल व्यक्ति को ड्रोन से उठाकर सुरक्षित इलाके तक ले जाया जा सके।
130 किलो तक वजन उठाने वाले ड्रोन से हुआ रेस्क्यू
इस ऑपरेशन में यूक्रेनी कंपनी गुरज़ुफ डिफेंस का ‘हेवी शॉट अयुदाग-6’ ड्रोन इस्तेमाल किया गया। यह छह पंखों वाला भारी ड्रोन है, जिसका उपयोग सामान और सैन्य सामग्री ले जाने के लिए किया जाता है। इसकी वजन उठाने की क्षमता करीब 130 किलोग्राम बताई गई है।
रेस्क्यू के लिए ड्रोन में विशेष व्यवस्था की गई, ताकि घायल सैनिक को सुरक्षित तरीके से बांधकर हवा में उठाया जा सके। ड्रोन में लगे कैमरे और माइक्रोफोन की मदद से ऑपरेटर सैनिक से संपर्क भी कर सकता था।
ऑपरेशन शुरू होने के बाद ड्रोन व्लासेंको के ठिकाने तक पहुंचा। सैनिक को विशेष व्यवस्था से बांधने के बाद धीरे-धीरे जमीन से ऊपर उठाया गया। इसके बाद ड्रोन ने उन्हें खतरनाक इलाके से बाहर निकालने का सफर शुरू किया।
इस दौरान ड्रोन पर भारी वजन होने के कारण बैटरी की खपत भी चुनौती बनी। रिपोर्ट के अनुसार, रास्ते में निर्धारित स्थान पर बैटरी बदलने की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए टीमें पहले से तैनात थीं। बैटरी बदलने के बाद ड्रोन ने आगे का सफर पूरा किया और सैनिक को सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचा दिया।
62 किलोमीटर की दूरी तय करने में लगे 1 घंटा 14 मिनट
रिपोर्ट के मुताबिक, घायल सैनिक को ड्रोन से सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में 1 घंटा 14 मिनट 36 सेकंड लगे। इस दौरान ड्रोन ने करीब 62 किलोमीटर की दूरी तय की।
यह अभियान इसलिए भी अहम बताया जा रहा है, क्योंकि घायल सैनिक को निकालने के लिए जमीन पर पहुंचना बेहद जोखिम भरा था। भारी ड्रोन ने ऐसे इलाके से सैनिक को बाहर निकालने में मदद की, जहां पारंपरिक बचाव अभियान सफल होना मुश्किल था।
ड्रोन से उतारने के बाद रोबोटिक वाहन से अस्पताल पहुंचाया
हवाई रेस्क्यू के बाद भी व्लासेंको को अस्पताल तक पहुंचाना बाकी था। उन्हें ड्रोन से उतारने के बाद ‘मिरोतवोरेत्स’ नाम के जमीन पर चलने वाले रोबोटिक वाहन पर रखा गया। इस वाहन को दूर से नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे बचाव दल को खतरनाक रास्ते पर सीधे जाने की जरूरत कम हुई।
रोबोटिक वाहन उन्हें सुरक्षित इलाके तक लेकर गया। वहां से बचाव दल ने उन्हें गाड़ी के जरिए अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल में डॉक्टरों ने उनका इलाज शुरू किया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, उनकी हालत स्थिर है।
यूक्रेन-रूस युद्ध में तेजी से बढ़ रहा ड्रोन का इस्तेमाल
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में ड्रोन की भूमिका लगातार बढ़ी है। इनका इस्तेमाल निगरानी, हमले, सैन्य सामान पहुंचाने और मुश्किल इलाकों में अभियान चलाने के लिए किया जा रहा है।
यूक्रेन ने कम लागत वाले ड्रोन के निर्माण और लंबी दूरी तक उनका इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यूक्रेन हर साल करीब 10 लाख सस्ते ड्रोन बनाने की क्षमता रखता है।
व्लासेंको का रेस्क्यू दिखाता है कि युद्ध के दौरान भारी ड्रोन और जमीन पर चलने वाले रोबोट किस तरह ऐसे अभियानों में मदद कर सकते हैं, जहां घायल सैनिकों तक पहुंचने के लिए पारंपरिक रास्ते बेहद खतरनाक हों।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच एक घायल यूक्रेनी सैनिक को बचाने के लिए अनोखा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, कोस्त्यांतिन व्लासेंको नाम का सैनिक करीब 491 दिनों तक मोर्चे पर फंसा रहा। चारों तरफ रूसी सैनिकों का खतरा था, जमीन पर बारूदी सुरंगें बिछी थीं और पैदल बचाव दल के लिए वहां पहुंचना बेहद मुश्किल था। आखिरकार यूक्रेनी सेना ने भारी क्षमता वाले ड्रोन की मदद से उसे बाहर निकाला।
बताया गया है कि ड्रोन ने करीब 62 किलोमीटर की दूरी तय कर घायल सैनिक को सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचाया। इस अभियान में लगभग 1 घंटा 14 मिनट 36 सेकंड लगे। इसके बाद सैनिक को जमीन पर चलने वाले रोबोटिक वाहन की मदद से आगे ले जाया गया और फिर अस्पताल पहुंचाया गया। फिलहाल उसका इलाज जारी है और उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है।
यूक्रेन की सरकारी सैन्य समाचार एजेंसी आर्मीइन्फॉर्म ने इस रेस्क्यू से जुड़ा वीडियो जारी किया है। इस ऑपरेशन में कई सैन्य इकाइयों, ड्रोन ऑपरेटरों और तकनीकी विशेषज्ञों ने मिलकर काम किया।
रूसी ड्रोन हमले में साथी की मौत, व्लासेंको भी हुए गंभीर घायल
रिपोर्ट के अनुसार, कोस्त्यांतिन व्लासेंको पूर्वी यूक्रेन के कुपियांस्क मोर्चे पर तैनात थे। वहां रूसी सेना के हमलों का लगातार खतरा बना रहता था। व्लासेंको और उनका एक साथी कंक्रीट के नाली पाइप में बने अस्थायी ठिकाने पर रहकर मोर्चा संभाल रहे थे।
14 फरवरी को रूसी सेना के ड्रोन हमले में उनके साथी की मौत हो गई। हमले में निकले विस्फोटक के छर्रों से व्लासेंको भी गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए थे। हालत बिगड़ने के बावजूद उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाना संभव नहीं था, क्योंकि उस इलाके में पहुंचना बचाव दल के लिए बेहद जोखिम भरा था।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उनके दाहिने पैर में गैंगरीन फैल गया था। इलाज नहीं मिलने और स्थिति गंभीर होने के कारण व्लासेंको ने कथित तौर पर खुद ही अपना पैर काटकर अलग कर दिया।
ड्रोन से पहुंचाया जाता था खाना, पानी और दवाइयां
गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद व्लासेंको को पूरी तरह अकेला नहीं छोड़ा गया था। यूक्रेनी सेना ड्रोन के जरिए उनके लिए खाना, पानी और दवाइयां पहुंचाती थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, हर चार से पांच दिन में जरूरी सामान उनके ठिकाने के पास गिराया जाता था। व्लासेंको रेंगकर वहां पहुंचते और सामान इकट्ठा करते थे। इसी मदद के सहारे वह दुश्मन के खतरे के बीच लंबे समय तक जीवित रहे।
हालांकि, उन्हें वहां से निकालना एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। जमीन पर बारूदी सुरंगों और दुश्मन की मौजूदगी के कारण सामान्य बचाव अभियान चलाना बेहद मुश्किल था।
जमीन पर चलने वाला रोबोट भी नहीं हो पाया सफल
व्लासेंको को सुरक्षित निकालने के लिए यूक्रेनी सेना ने पहले जमीन पर चलने वाले रोबोट का इस्तेमाल करने की कोशिश की। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, रूसी सैनिकों ने रोबोट को रास्ते में ही पहचान लिया और उसे नष्ट कर दिया।
इसके बाद सेना के सामने चुनौती थी कि घायल सैनिक तक पहुंचने के लिए ऐसा तरीका खोजा जाए, जिसमें बचाव दल के जवानों की जान भी खतरे में न पड़े। आखिरकार 30वीं मैकेनाइज्ड ब्रिगेड और 92वीं असॉल्ट ब्रिगेड के सैनिकों ने भारी ड्रोन की मदद से रेस्क्यू ऑपरेशन की योजना बनाई।
इस अभियान की तैयारी में करीब छह महीने लगने की बात कही गई है। तकनीकी विशेषज्ञों और सैनिकों ने मिलकर ऐसी व्यवस्था तैयार की, जिससे घायल व्यक्ति को ड्रोन से उठाकर सुरक्षित इलाके तक ले जाया जा सके।
130 किलो तक वजन उठाने वाले ड्रोन से हुआ रेस्क्यू
इस ऑपरेशन में यूक्रेनी कंपनी गुरज़ुफ डिफेंस का ‘हेवी शॉट अयुदाग-6’ ड्रोन इस्तेमाल किया गया। यह छह पंखों वाला भारी ड्रोन है, जिसका उपयोग सामान और सैन्य सामग्री ले जाने के लिए किया जाता है। इसकी वजन उठाने की क्षमता करीब 130 किलोग्राम बताई गई है।
रेस्क्यू के लिए ड्रोन में विशेष व्यवस्था की गई, ताकि घायल सैनिक को सुरक्षित तरीके से बांधकर हवा में उठाया जा सके। ड्रोन में लगे कैमरे और माइक्रोफोन की मदद से ऑपरेटर सैनिक से संपर्क भी कर सकता था।
ऑपरेशन शुरू होने के बाद ड्रोन व्लासेंको के ठिकाने तक पहुंचा। सैनिक को विशेष व्यवस्था से बांधने के बाद धीरे-धीरे जमीन से ऊपर उठाया गया। इसके बाद ड्रोन ने उन्हें खतरनाक इलाके से बाहर निकालने का सफर शुरू किया।
इस दौरान ड्रोन पर भारी वजन होने के कारण बैटरी की खपत भी चुनौती बनी। रिपोर्ट के अनुसार, रास्ते में निर्धारित स्थान पर बैटरी बदलने की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए टीमें पहले से तैनात थीं। बैटरी बदलने के बाद ड्रोन ने आगे का सफर पूरा किया और सैनिक को सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचा दिया।
62 किलोमीटर की दूरी तय करने में लगे 1 घंटा 14 मिनट
रिपोर्ट के मुताबिक, घायल सैनिक को ड्रोन से सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में 1 घंटा 14 मिनट 36 सेकंड लगे। इस दौरान ड्रोन ने करीब 62 किलोमीटर की दूरी तय की।
यह अभियान इसलिए भी अहम बताया जा रहा है, क्योंकि घायल सैनिक को निकालने के लिए जमीन पर पहुंचना बेहद जोखिम भरा था। भारी ड्रोन ने ऐसे इलाके से सैनिक को बाहर निकालने में मदद की, जहां पारंपरिक बचाव अभियान सफल होना मुश्किल था।
ड्रोन से उतारने के बाद रोबोटिक वाहन से अस्पताल पहुंचाया
हवाई रेस्क्यू के बाद भी व्लासेंको को अस्पताल तक पहुंचाना बाकी था। उन्हें ड्रोन से उतारने के बाद ‘मिरोतवोरेत्स’ नाम के जमीन पर चलने वाले रोबोटिक वाहन पर रखा गया। इस वाहन को दूर से नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे बचाव दल को खतरनाक रास्ते पर सीधे जाने की जरूरत कम हुई।
रोबोटिक वाहन उन्हें सुरक्षित इलाके तक लेकर गया। वहां से बचाव दल ने उन्हें गाड़ी के जरिए अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल में डॉक्टरों ने उनका इलाज शुरू किया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, उनकी हालत स्थिर है।
यूक्रेन-रूस युद्ध में तेजी से बढ़ रहा ड्रोन का इस्तेमाल
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में ड्रोन की भूमिका लगातार बढ़ी है। इनका इस्तेमाल निगरानी, हमले, सैन्य सामान पहुंचाने और मुश्किल इलाकों में अभियान चलाने के लिए किया जा रहा है।
यूक्रेन ने कम लागत वाले ड्रोन के निर्माण और लंबी दूरी तक उनका इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यूक्रेन हर साल करीब 10 लाख सस्ते ड्रोन बनाने की क्षमता रखता है।
व्लासेंको का रेस्क्यू दिखाता है कि युद्ध के दौरान भारी ड्रोन और जमीन पर चलने वाले रोबोट किस तरह ऐसे अभियानों में मदद कर सकते हैं, जहां घायल सैनिकों तक पहुंचने के लिए पारंपरिक रास्ते बेहद खतरनाक हों।