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ट्रंप के रूस प्रतिबंध बिल पर हाउस में पेच, भारत पर 100% टैरिफ का खतरा फिलहाल टला
 

 

वॉशिंगटन: रूस पर नए प्रतिबंध लगाने और उससे तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने वाला अमेरिकी कानून फिलहाल प्रतिनिधि सभा में अटकता नजर आ रहा है। सीनेट से भारी बहुमत के साथ पारित हो चुके इस बिल को 3 नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में मंजूरी मिलना मुश्किल बताया जा रहा है। ऐसे में रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की आशंका फिलहाल कुछ समय के लिए टल सकती है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बिल को लेकर दोनों प्रमुख अमेरिकी पार्टियों के सांसदों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। डेमोक्रेट सांसदों को चिंता है कि प्रस्तावित कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को टैरिफ लगाने की असाधारण रूप से व्यापक शक्तियां दे सकता है। वहीं, कुछ रिपब्लिकन सांसदों को डर है कि रूस पर दबाव बनाने के लिए उठाया गया कदम अमेरिका में तेल और गैस की कीमतों को बढ़ा सकता है।


क्या है रूस पर प्रतिबंध वाला बिल?
यह बिल दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पेश किया था। ग्राहम यूक्रेन के मुखर समर्थक रहे थे। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के लिए मॉस्को की आर्थिक क्षमता को कमजोर करना है।
बिल के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों तथा रूस को ऊर्जा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले पांच प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति मिल सकती है।
भारत, चीन और तुर्किये रूस से पेट्रोलियम खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल हैं। यही वजह है कि इस कानून पर भारत की खास नजर है।
सीनेट में 86-11 से पास हुआ था बिल
अमेरिकी सीनेट ने पिछले महीने बिल को 86-11 वोट से मंजूरी दी थी। इतनी बड़ी संख्या में समर्थन मिलने के बाद माना गया था कि कानून को आगे बढ़ाने की राह आसान होगी। लेकिन प्रतिनिधि सभा में तस्वीर अलग दिखाई दे रही है।
हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने संकेत दिया है कि 3 नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले इस बिल पर सदन में वोटिंग होना मुश्किल हो सकता है। अगले कुछ हफ्तों में सांसदों के पास वॉशिंगटन में काम करने के लिए सीमित समय बचा है, जिससे प्रक्रिया और लंबी हो सकती है।
जॉनसन ने माना कि रूस पर प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से सांसदों के बीच व्यापक समर्थन है, लेकिन कानून को किस तरह तैयार किया जाए, इस पर अभी मतभेद हैं। उनका कहना है कि ऐसा फॉर्मूला तलाशा जा रहा है जिसे सदन में पर्याप्त समर्थन मिल सके।


भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई थी। अगर नया अमेरिकी कानून लागू होता है और भारत पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार के साथ-साथ भारतीय तेल आयात की लागत पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, जब तक हाउस इस बिल को मंजूरी नहीं देता और आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक प्रस्तावित अतिरिक्त टैरिफ तत्काल लागू नहीं हो सकता।
अमेरिका में भी तेल की कीमतों को लेकर चिंता
बिल का विरोध केवल विदेश नीति से जुड़ा नहीं है। अमेरिकी सांसदों को घरेलू ऊर्जा कीमतों की भी चिंता है।
हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के चेयरमैन ब्रायन मस्त के मुताबिक, अगर भारत और रूस से तेल खरीदने वाले अन्य बड़े देशों को रूसी तेल छोड़कर दूसरे स्रोतों से खरीदारी करनी पड़ी, तो वैश्विक तेल बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों का असर सीधे आम मतदाताओं पर पड़ता है। ऐसे में नवंबर के मध्यावधि चुनाव से ठीक पहले तेल की कीमतों में बढ़ोतरी रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती है।
डेमोक्रेट्स को ट्रंप की टैरिफ शक्तियों पर आपत्ति
हाउस में बिल के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक अड़चनों में से एक राष्ट्रपति को मिलने वाली अतिरिक्त टैरिफ शक्ति है।
डेमोक्रेट सांसदों का तर्क है कि कानून का इस्तेमाल केवल रूस के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इससे राष्ट्रपति को व्यापक स्तर पर टैरिफ लगाने के लिए अतिरिक्त अधिकार मिल सकते हैं।
हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट ग्रेगरी मीक्स ने कहा है कि वह ऐसे कानून का समर्थन नहीं कर सकते, जिससे राष्ट्रपति को ऐसी टैरिफ शक्तियां मिलें जो उनके पास वर्तमान में नहीं हैं।
डेमोक्रेट सांसद ब्रैड श्नाइडर ने भी सीनेट से पारित विधेयक में मौजूद टैरिफ प्रावधान पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि किसी भी राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की इतनी व्यापक और सीमित नियंत्रण वाली शक्ति देना उचित नहीं होगा।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल बिल का भविष्य प्रतिनिधि सभा में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट सांसदों के बीच समझौते पर निर्भर करता है। अगर इसके प्रावधानों में बदलाव किया जाता है, तो सीनेट और हाउस के बीच नए सिरे से सहमति की जरूरत पड़ सकती है।
इसका सीधा मतलब यह है कि भारत पर रूस से तेल खरीदने के कारण प्रस्तावित 100 प्रतिशत अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ का खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन कम से कम नवंबर के चुनाव तक इसके तत्काल लागू होने की संभावना कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
आने वाले हफ्तों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी सांसद टैरिफ शक्तियों, रूस पर प्रतिबंध और घरेलू तेल कीमतों के बीच ऐसा संतुलन कैसे बनाते हैं, जिस पर दोनों पार्टियां सहमत हो सकें।