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Trump Xi Meeting: शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा से पहले 4 मुद्दों पर नजर, भारत पर भी पड़ सकता है असर
 

 

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा को लेकर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक हलचल तेज है। करीब 11 साल बाद हो रही इस यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच अहम द्विपक्षीय बातचीत होने वाली है। ट्रंप के एयरपोर्ट पर सीधे शी का स्वागत करने की योजना भी इस मुलाकात को खास बना रही है।

शी जिनपिंग के अमेरिका पहुंचने के बाद व्हाइट हाउस में उनके और उनकी पत्नी पेंग लियुआन के सम्मान में राजकीय भोज का आयोजन किया जाएगा। इसके बाद दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच बातचीत होगी। इस बैठक में व्यापार और टैरिफ से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ताइवान और रूस से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
1. ट्रेड और टैरिफ पर क्या होगी बात?
अमेरिका और चीन के रिश्तों में व्यापार लंबे समय से सबसे प्रमुख मुद्दों में रहा है। दोनों देशों ने एक-दूसरे के उत्पादों पर कई दौर में अतिरिक्त शुल्क लगाया है। अब बातचीत का एक अहम हिस्सा इन टैरिफ को कम करने और व्यापारिक तनाव घटाने से जुड़ा हो सकता है।
करीब 30-30 अरब डॉलर के सामान पर शुल्क कम करने के प्रस्ताव और ऊर्जा एवं कृषि उत्पादों पर टैक्स घटाने को लेकर दोनों पक्षों के बीच बातचीत की खबरें सामने आई हैं।
मौजूदा टैरिफ व्यवस्था की समयसीमा 10 नवंबर को खत्म होने वाली है। ऐसे में बैठक के दौरान दोनों देश मौजूदा व्यवस्था को आगे बढ़ाने और शुल्क में अतिरिक्त कटौती की संभावनाओं पर चर्चा कर सकते हैं।

2. AI और टेक्नोलॉजी पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है। दोनों देशों के बीच यह सवाल भी अहम है कि अत्याधुनिक AI मॉडल और उनसे जुड़ी तकनीक तक किसकी कितनी पहुंच होगी।
अमेरिका चीन को उन्नत AI चिप और कुछ दूसरी तकनीकों की आपूर्ति पर कई प्रतिबंध लगा चुका है। अमेरिकी अधिकारियों की ओर से चीन की तकनीकी कंपनियों से जुड़े सुरक्षा जोखिमों को लेकर भी चिंताएं जताई जाती रही हैं।
चीन इन प्रतिबंधों का विरोध करता है और इन्हें तकनीकी एवं व्यापारिक गतिविधियों में बाधा के तौर पर देखता है।
रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों देशों ने AI से जुड़े मुद्दों पर अलग से संवाद शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संभावित AI जोखिमों की जानकारी साझा करने का प्रस्ताव भी चर्चा में रहा है।
3. ताइवान पर दोनों देशों का रुख
ट्रंप और शी की बातचीत में ताइवान भी संवेदनशील मुद्दा हो सकता है। चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका ताइवान के साथ सुरक्षा और रक्षा सहयोग बनाए हुए है।
ताइवान का महत्व केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है। यह एशिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों और वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन के लिहाज से भी अहम है।
ऐसे में बीजिंग की ओर से अमेरिका से ताइवान को लेकर अपने समर्थन को सीमित करने की मांग की जा सकती है। दूसरी ओर, वॉशिंगटन के लिए चीन के साथ तनाव बढ़ाए बिना अपनी मौजूदा नीति को बनाए रखना महत्वपूर्ण मुद्दा हो सकता है।
हालांकि, बैठक से पहले यह कहना संभव नहीं है कि ताइवान को लेकर दोनों देशों के बीच कोई बड़ा समझौता होगा।

4. रूस और ऊर्जा कारोबार पर भी नजर
रूस से चीन की ऊर्जा खरीद भी अमेरिका-चीन बातचीत में चर्चा का विषय बन सकती है। अमेरिका रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की नीति पर काम कर रहा है।
चीन रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और अन्य ऊर्जा उत्पाद खरीदता है। बीजिंग लंबे समय से अपने रूस संबंधों में अमेरिका या किसी अन्य तीसरे देश के हस्तक्षेप का विरोध करता रहा है।
ऐसे में रूस के साथ चीन के ऊर्जा कारोबार पर अमेरिकी दबाव दोनों नेताओं के बीच बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।


जिनपिंग-ट्रंप की लगातार बैठकों का क्या मतलब?
शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप के बीच पिछले कुछ समय में सीधे संपर्क बढ़ा है। दोनों नेताओं के बीच बातचीत का मुख्य फोकस अमेरिका-चीन संबंधों में तनाव को नियंत्रित करना और आर्थिक एवं रणनीतिक मुद्दों पर संवाद बनाए रखना रहा है।
आने वाले महीनों में भी दोनों नेताओं के आमने-सामने आने के अन्य अवसर बन सकते हैं। APEC और G20 जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों की संभावित मुलाकात को लेकर भी चर्चा है।
भारत के लिए क्यों अहम है ट्रंप-शी वार्ता?
अमेरिका और चीन दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। इसलिए उनके बीच व्यापारिक समझौते या तनाव में बदलाव का असर वैश्विक बाजार और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।
अगर दोनों देश टैरिफ कम करते हैं तो अमेरिका-चीन व्यापार में बदलाव देखने को मिल सकता है। इससे उन कंपनियों की रणनीति भी प्रभावित हो सकती है जो उत्पादन और सप्लाई के लिए इन दोनों देशों पर निर्भर हैं।
रूस से तेल खरीद का मुद्दा भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत और चीन दोनों रूस से ऊर्जा खरीदते हैं। इसलिए रूस के ऊर्जा कारोबार को लेकर अमेरिका की नीति में बदलाव का असर व्यापक रूप से एशियाई ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
इसके अलावा AI चिप और सेमीकंडक्टर से जुड़े अमेरिकी-चीनी नियमों में बदलाव का असर वैश्विक टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन पर पड़ सकता है। भारत भी इन वैश्विक तकनीकी और कारोबारी नेटवर्क का हिस्सा है, इसलिए दोनों देशों की बातचीत के नतीजों पर भारतीय उद्योग और बाजार की भी नजर रहेगी।