×

डाक वोटिंग पर Trump को तगड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की वोटर्स की जानकारी साझा करने की मांग

 

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने डाक से वोटिंग यानी मेल-इन बैलेट के नियमों को सख्त करने वाले ट्रम्प प्रशासन के आदेश पर लगी रोक हटाने से इनकार कर दिया है।सुप्रीम कोर्ट ने 7-2 के फैसले में निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा। यह मामला नवंबर 2026 में होने वाले अमेरिका के मिडटर्म चुनाव से जुड़ा है।

ट्रम्प ने क्या बदलाव करने का आदेश दिया था?

ट्रम्प ने मार्च 2026 में डाक से होने वाली वोटिंग में कथित गड़बड़ियों को रोकने के लिए नए नियम लागू करने का आदेश दिया था।इस व्यवस्था के तहत राज्यों से कहा जाना था कि डाक से वोट डालने वाले मतदाताओं से जुड़ी सूची अमेरिकी डाक सेवा यानी USPS को उपलब्ध कराई जाए।इसके बाद USPS को यह जांचने की व्यवस्था मिलती कि डाक से आया बैलेट तय नियमों के मुताबिक है या नहीं।अगर किसी बैलेट के साथ जरूरी जानकारी नहीं मिलती या वोटर का नाम संबंधित सूची में नहीं मिलता, तो उसे रोकने की शक्ति USPS को मिल सकती थी।

डेमोक्रेटिक राज्यों ने क्यों किया विरोध?

ट्रम्प के इस कदम का डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार वाले कई राज्यों और वोटिंग अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने विरोध किया।

उनका तर्क था कि चुनाव से कुछ समय पहले इस तरह के नए नियम लागू करने से मतदाताओं और चुनाव अधिकारियों के सामने मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

खासकर उन लोगों को परेशानी हो सकती है जो पहले से डाक के जरिए अपना वोट भेजने की प्रक्रिया में हैं।

इसी विरोध के बाद निचली अदालत ने ट्रम्प के आदेश पर रोक लगा दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने टाइमिंग को माना अहम मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं था कि ट्रम्प की योजना कानूनी है या नहीं। कोर्ट के सामने एक बड़ी चिंता समय को लेकर भी थी।

नवंबर में मिडटर्म चुनाव होने हैं और कई राज्यों में बैलेट भेजने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले पूरी वोटिंग व्यवस्था में बदलाव करना मुश्किल हो सकता है।

जस्टिस ब्रेट कावानॉ ने संकेत दिया कि ट्रम्प की योजना को भविष्य में होने वाले चुनावों में लागू किया जा सकता है, लेकिन नवंबर 2026 के चुनाव से ठीक पहले इसे लागू करने के लिए पर्याप्त समय नहीं है।

चुनाव अधिकारियों को नई व्यवस्था समझने, राज्यों में इसे लागू करने और जरूरी तैयारियां पूरी करने के लिए पर्याप्त वक्त नहीं मिलेगा।

डाक से वोटिंग को लेकर ट्रम्प पहले भी सवाल उठा चुके हैं

डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से अमेरिका में डाक से होने वाली वोटिंग पर सवाल उठाते रहे हैं।

खासकर 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद उन्होंने मेल-इन वोटिंग में गड़बड़ी के आरोप लगाए थे और दावा किया था कि चुनाव में उनके साथ धोखा हुआ। हालांकि, इन दावों के समर्थन में व्यापक रूप से स्वीकार किए गए सबूत सामने नहीं आए।

दिलचस्प बात यह है कि ट्रम्प खुद भी मेल वोटिंग का इस्तेमाल कर चुके हैं। उन्होंने इस साल फ्लोरिडा के रिपब्लिकन प्राइमरी चुनाव में डाक के जरिए वोट डाला था।

अमेरिका में 3 नवंबर को होंगे मिडटर्म चुनाव

अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को मिडटर्म चुनाव होने हैं।

इन चुनावों में अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों—हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट—की सीटों के लिए मतदान होगा।

फिलहाल कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी के पास डेमोक्रेटिक पार्टी की तुलना में ज्यादा सीटें हैं, लेकिन दोनों दलों के बीच अंतर बहुत बड़ा नहीं है।

अगर डेमोक्रेट्स इन चुनावों में पर्याप्त सीटें जीतकर किसी सदन में बहुमत हासिल करते हैं, तो ट्रम्प प्रशासन के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। कांग्रेस राष्ट्रपति के फैसलों पर निगरानी बढ़ाने के साथ-साथ सरकार के कामकाज की जांच भी कर सकती है।

अमेरिका में डाक से वोटिंग की शुरुआत कैसे हुई?

अमेरिका में डाक से वोटिंग की शुरुआत काफी पुरानी है। शुरुआती दौर में इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से सैनिकों और उन लोगों के लिए किया जाता था जो चुनाव के दिन मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच सकते थे।

बाद में कई राज्यों ने इसे आम मतदाताओं के लिए भी आसान बना दिया।

2020 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कोरोना महामारी की वजह से मेल-इन वोटिंग का इस्तेमाल काफी बढ़ गया। बड़ी संख्या में लोगों ने मतदान केंद्र जाने के बजाय घर से वोट भेजा।

इसके बाद डाक से मिले बैलेट की सुरक्षा, पहचान और गिनती को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई।

हालांकि, डाक से वोटिंग में मतदाता की पहचान और बैलेट की वैधता जांचने के लिए अलग-अलग प्रक्रियाएं होती हैं। चुनाव अधिकारी यह भी जांच करते हैं कि कोई व्यक्ति एक से ज्यादा बार वोट न डाल सके।

2020 के बाद कई राज्यों ने अपने नियमों में बदलाव किए और कुछ जगहों पर पहचान सत्यापन तथा बैलेट की निगरानी को और सख्त किया गया।

इसलिए अमेरिका में डाक से वोटिंग के नियम सभी राज्यों में एक जैसे नहीं हैं और अलग-अलग राज्यों में इसकी प्रक्रिया अलग हो सकती है।

ट्रम्प के कई फैसलों पर पहले भी कोर्ट लगा चुका है ब्रेक

ट्रम्प प्रशासन के कई बड़े फैसलों को लेकर अमेरिकी अदालतों में कानूनी लड़ाई चल चुकी है। इनमें कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रम्प प्रशासन को तत्काल राहत नहीं दी।

1. टैरिफ का मामला

फरवरी 2026 में ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा। कोर्ट ने राष्ट्रपति के टैरिफ लगाने के अधिकार पर सवाल उठाते हुए ट्रम्प प्रशासन के खिलाफ फैसला दिया।

2. इलिनॉय में नेशनल गार्ड की तैनाती

दिसंबर 2025 में ट्रम्प प्रशासन ने इलिनॉय में नेशनल गार्ड की तैनाती का प्रयास किया था। सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल तौर पर इस तैनाती की अनुमति नहीं दी।

3. बर्थराइट सिटीजनशिप

ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों को मिलने वाली जन्मसिद्ध नागरिकता को सीमित करने का प्रयास किया। इस मामले में भी उनकी नीति को कानूनी चुनौती मिली और सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के अधिकारों की सीमा पर सवाल उठाए।

4. बर्थ टूरिज्म पर कार्रवाई

बर्थराइट सिटीजनशिप को लेकर विवाद के बाद ट्रम्प प्रशासन ने बर्थ टूरिज्म पर रोक लगाने और कुछ मामलों में नागरिकता सीमित करने की दिशा में कदम उठाए। इस नीति को भी अदालत में चुनौती दी गई।

5. फेड गवर्नर लिसा कुक का मामला

ट्रम्प ने फेडरल रिजर्व की गवर्नर लिसा कुक को हटाने की कोशिश की थी। इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल ट्रम्प प्रशासन को तत्काल कार्रवाई की राह नहीं दी। मामला राष्ट्रपति की उस शक्ति से जुड़ा है कि क्या वह फेडरल रिजर्व के गवर्नर को बिना पर्याप्त कानूनी आधार और तय प्रक्रिया के हटा सकते हैं।

क्या है इस फैसले का बड़ा मतलब?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नवंबर के मिडटर्म चुनाव से पहले काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ट्रम्प प्रशासन डाक से होने वाली वोटिंग पर ज्यादा नियंत्रण और सख्त नियम चाहता है, जबकि विरोधी पक्ष को डर है कि चुनाव के ठीक पहले नियम बदलने से वैध मतदाताओं को परेशानी हो सकती है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प के प्रस्तावित नियमों को नवंबर के चुनाव से पहले लागू करने का रास्ता नहीं खोला है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसी व्यवस्था भविष्य में कभी लागू नहीं हो सकती। आने वाले चुनावों के लिए इस मुद्दे पर कानूनी लड़ाई जारी रह सकती है।