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Iran War Crisis: दुनिया परेशान, लेकिन भारत को मिला बड़ा फायदा! जानकर जल-भुन जाएंगे चीन-पाक 

 

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। वैश्विक स्थिति लगातार बिगड़ रही है, और अगर ईरान से जुड़ा यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो यह एक बड़े संकट का रूप ले सकता है। पश्चिम एशिया में तनाव का असर पड़ोसी देशों में भी साफ दिखाई दे रहा है। बांग्लादेश में जेट फ्यूल की कीमतें 100 प्रतिशत से भी ज़्यादा बढ़ गई हैं, जबकि भारत में LPG की कमी देखी जा रही है। इसके अलावा, सरकार ने औद्योगिक ईंधन (डीज़ल) और पेट्रोल की कीमतें भी बढ़ा दी हैं।

भारत के लिए अच्छी खबर

हालांकि, इस चुनौतीपूर्ण माहौल के बीच भारत के लिए एक अच्छी खबर सामने आई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में देश में रोज़गार के अवसरों में लगभग 4.7% की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ई-कॉमर्स, टेक्नोलॉजी स्टार्टअप, स्वास्थ्य सेवा, फार्मास्यूटिकल्स और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में विकास के कारण रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे।

TeamLease Services की 'एम्प्लॉयमेंट आउटलुक रिपोर्ट' के अनुसार, हायरिंग (भर्ती) गतिविधियों में सुधार का रुझान बड़ी कंपनियों में सबसे ज़्यादा देखने को मिल रहा है, जहाँ 74% कंपनियों ने विस्तार की योजना का संकेत दिया है। इसके विपरीत, मध्यम आकार की कंपनियों के लिए यह आंकड़ा 57% और छोटे व्यवसायों के लिए 38% है, जो इस बात को रेखांकित करता है कि रोज़गार वृद्धि को बढ़ावा देने में बड़े उद्यमों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण बनी हुई है।

रोज़गार के अवसरों में बढ़ोतरी तय

रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल और सितंबर 2026 के बीच, डिजिटल और पारंपरिक, दोनों ही क्षेत्रों में श्रम की मांग बढ़ने की उम्मीद है। ई-कॉमर्स और टेक स्टार्टअप क्षेत्रों में 'नेट एम्प्लॉयमेंट चेंज' (NEC) 8.9% रहने का अनुमान है। इसके बाद स्वास्थ्य और फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्रों में यह आंकड़ा 7% और मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग तथा इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में 6.6% रहने का अनुमान है। कुल मिलाकर, इस अवधि के लिए NEC 4.7% रहने का अनुमान है। यह रिपोर्ट नवंबर 2025 और जनवरी 2026 के बीच 23 उद्योगों और 20 शहरों के 1,268 नियोक्ताओं से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई है। TeamLease Services के वरिष्ठ उपाध्यक्ष बालासुब्रमण्यम का कहना है कि भारत के कार्यबल की प्रकृति अब चक्रीय मांग के बजाय संरचनात्मक और नीतिगत बदलावों से ज़्यादा प्रभावित हो रही है। श्रम संहिताओं (Labor Codes) के लागू होने के बाद, 64% संगठनों ने रोज़गार लागत में वृद्धि की सूचना दी है, जबकि 80% कंपनियाँ नए कानूनी ढांचे के अनुरूप अपनी वेतन संरचनाओं में बदलाव कर रही हैं और अपने कार्यबल का पुनर्गठन कर रही हैं।