450 साल पुराना नक्शा होगा बंद! जानिए क्यों UN में हो रही है दुनिया का मैप बदलने की वोटिंग
क्या दुनिया का नक्शा हमेशा के लिए बदलने वाला है? शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक ऐसे प्रस्ताव पर वोटिंग होने जा रही है, जिसका मकसद सदियों से इस्तेमाल हो रहे पारंपरिक मर्केटर नक्शे की जगह ऐसा नक्शा अपनाना है, जिसमें अफ्रीका समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों का आकार ज्यादा वास्तविक नजर आए।
यह प्रस्ताव अफ्रीकी देश टोगो की ओर से पेश किया गया है। अफ्रीकी संघ के बाकी 54 सदस्य देशों के साथ कई अन्य देशों ने भी इसका समर्थन किया है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते, लेकिन अगर यह प्रस्ताव मंजूर होता है तो इसका असर स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले नक्शों से लेकर टेक्नोलॉजी और सरकारी कामकाज तक दिखाई दे सकता है।
आखिर मर्केटर नक्शे में क्या गड़बड़ी है?
मर्केटर नक्शा साल 1569 में फ्लेमिश नक्शानवीस जेरार्डस मर्केटर ने तैयार किया था। उस समय इसका मुख्य उद्देश्य समुद्र में सफर करने वाले नाविकों को दिशा और रास्ता समझने में मदद करना था।
करीब 500 साल बाद भी यह दुनिया के सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले नक्शों में शामिल है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें धरती के अलग-अलग हिस्सों का वास्तविक आकार सही तरीके से दिखाई नहीं देता।
भूमध्य रेखा के आसपास के इलाके अपेक्षाकृत छोटे दिखाई देते हैं, जबकि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव की तरफ बढ़ने पर देश और क्षेत्र जरूरत से कहीं ज्यादा बड़े नजर आने लगते हैं।
अफ्रीका और ग्रीनलैंड का अंतर समझिए
इस नक्शे की सबसे चर्चित मिसाल अफ्रीका और ग्रीनलैंड की है। मर्केटर नक्शे में दोनों लगभग एक जैसे आकार के दिखाई दे सकते हैं।
लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग है। अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना ज्यादा है। यानी जो अंतर वास्तविक दुनिया में बहुत बड़ा है, वह मर्केटर नक्शे पर उतना साफ नजर नहीं आता।
यही वजह है कि नक्शे की वास्तविकता को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।
'Correct The Map' अभियान क्या है?
मर्केटर नक्शे को बदलने की मांग को लेकर #CorrectTheMap नाम से अभियान भी चलाया जा रहा है। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, Change.org पर शुरू हुए इस अभियान में अब तक 11 हजार से ज्यादा लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं।
अभियान से जुड़े लोगों का तर्क है कि अफ्रीका को नक्शे पर उसके वास्तविक आकार के मुकाबले बहुत छोटा दिखाया जाता है। उनका कहना है कि अगर अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मेक्सिको और यूरोप के बड़े हिस्से को भी एक साथ रखा जाए, तब भी अफ्रीका में काफी जमीन बच जाएगी।
अफ्रीकी संघ ने अगस्त 2025 में इस अभियान का समर्थन किया था। इसके बाद टोगो को इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र तक ले जाने की जिम्मेदारी दी गई।
क्या नक्शे में पश्चिमी देशों का प्रभाव है?
मर्केटर नक्शे को लेकर बहस सिर्फ भूगोल तक सीमित नहीं है। इतिहासकारों और भूगोल विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि इस नक्शे में पुराने पश्चिमी नजरिए की छाप भी दिखाई देती है।
कुछ विशेषज्ञ इसे 'कार्टोग्राफिक कॉलोनियलिज्म' यानी नक्शों के जरिए उपनिवेशवादी सोच के प्रभाव से जोड़ते हैं। उनका तर्क है कि नक्शे में उत्तरी गोलार्ध के देशों को उनके वास्तविक आकार से काफी बड़ा दिखाया जाता है, जबकि अफ्रीका और भूमध्य रेखा के आसपास के कई इलाके छोटे नजर आते हैं।
इसी वजह से कुछ लोगों का मानना है कि लंबे समय तक ऐसे नक्शों का इस्तेमाल दुनिया में देशों की भौगोलिक और राजनीतिक ताकत को देखने के नजरिए को भी प्रभावित कर सकता है।
सिर्फ नक्शा नहीं, सोच बदलने की भी कोशिश
इस बहस के समर्थकों का कहना है कि मामला सिर्फ एक नक्शे को बदलने का नहीं है। उनका मानना है कि दुनिया को जिस तरह स्कूलों, किताबों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और टेक्नोलॉजी में दिखाया जाता है, उसका लोगों की सोच पर भी असर पड़ता है।
अगर संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव पास होता है, तो यह तुरंत दुनिया के सभी नक्शों को नहीं बदल देगा। लेकिन इससे अफ्रीका और ग्लोबल साउथ को अधिक वास्तविक भौगोलिक रूप में दिखाने की दिशा में एक बड़ा कदम जरूर माना जा सकता है।
यानी शुक्रवार की वोटिंग भले ही कानूनी तौर पर दुनिया का नक्शा तुरंत न बदल दे, लेकिन यह तय कर सकती है कि आने वाले समय में दुनिया को नक्शे पर किस नजरिए से देखा जाए।