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Super El Niño: दुनिया पर मंडरा रहा भीषण गर्मी और सूखे का खतरा, भारत में कम बारिश से बढ़ सकती हैं मुश्किलें
 

 

दुनिया में एक बार फिर अल नीनो को लेकर चिंता बढ़ गई है। प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक होने की खबरों के बीच वैज्ञानिकों ने इसके संभावित प्रभावों पर चिंता जताई है। अल नीनो की मजबूत स्थिति दुनिया के कई क्षेत्रों में भीषण गर्मी, सूखे और कहीं-कहीं भारी बारिश का कारण बन सकती है। इसके असर से खेती, जल संसाधनों और लोगों की सेहत पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।
कुछ विशेषज्ञ इस संभावित स्थिति को ‘सुपर-डुपर अल नीनो’ कह रहे हैं। हालांकि, इसके प्रभावों की वास्तविक गंभीरता समुद्र के तापमान, वायुमंडलीय परिस्थितियों और आने वाले महीनों में मौसम के बदलाव पर निर्भर करेगी।
दिसंबर में चरम पर पहुंच सकता है अल नीनो
अल नीनो की स्थिति मजबूत होने पर वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी हो सकती है। इसके कारण दुनिया के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक गर्मी पड़ने की आशंका रहती है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के पूर्वानुमानों के मुताबिक, अल नीनो और इससे जुड़े मौसमी बदलाव बारिश के सामान्य पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं।
इसके परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बन सकती है, जबकि दूसरे इलाकों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। तापमान में बढ़ोतरी से हीट स्ट्रोक, शरीर में पानी की कमी और गर्मी से जुड़ी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।
लाखों अतिरिक्त मौतों की आशंका का दावा
अल नीनो के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर भी चर्चा तेज है। उपलब्ध कराए गए शोध संबंधी विवरण के अनुसार, शिकागो यूनिवर्सिटी की क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के शोधकर्ताओं ने जून 2026 से फरवरी 2027 के बीच दुनियाभर में लगभग 4.51 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान जताया है।
हालांकि, इस आंकड़े और इसके पीछे की शोध पद्धति की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। इसे निश्चित रूप से होने वाली मौतों की संख्या नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि वास्तविक प्रभाव मौसम की परिस्थितियों, स्वास्थ्य सेवाओं और अलग-अलग देशों की तैयारी पर निर्भर करेंगे।
भारत में कम बारिश और सूखे का खतरा
अल नीनो का असर भारत के मानसून पर भी पड़ सकता है। सामान्य तौर पर अल नीनो की स्थिति भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर कर सकती है, हालांकि हर साल इसका प्रभाव एक जैसा नहीं होता।
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से 13 प्रतिशत कम बारिश के साथ समाप्त हुआ। यदि यह आंकड़ा आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होता है, तो कम बारिश का असर खेती, जलाशयों और भूजल स्तर पर पड़ सकता है। किसानों को सिंचाई के लिए अधिक पानी की जरूरत हो सकती है और कुछ इलाकों में पेयजल संकट की आशंका भी बढ़ सकती है।
यूरोप में गर्मी और नदियों के जलस्तर पर असर
अल नीनो के साथ होने वाले वैश्विक मौसमी बदलावों के बीच यूरोप में भी गर्मी और पानी की कमी को लेकर चिंता जताई गई है। फ्रांस, स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों में अत्यधिक गर्मी की घटनाएं लोगों के स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकती हैं।
कम बारिश और अधिक तापमान की स्थिति में डेन्यूब, राइन और टेम्स जैसी प्रमुख नदियों का जलस्तर घट सकता है। इससे जल परिवहन, कृषि और बिजली उत्पादन जैसी गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका रहती है। हालांकि, किसी विशेष क्षेत्र में गर्मी या सूखे के लिए अल नीनो को अकेला कारण मानने से पहले स्थानीय मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण जरूरी है।
आखिर अल नीनो क्या है और यह कैसे बनता है?
अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसमें समुद्र की सतह का तापमान मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में सामान्य से अधिक हो जाता है। यह बदलाव समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाली प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है, जिसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है।
सामान्य परिस्थितियों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को पश्चिम की ओर, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के आसपास के क्षेत्रों की तरफ धकेलती हैं। वहीं, दक्षिण अमेरिका के तट के पास समुद्र की गहराई से अपेक्षाकृत ठंडा पानी सतह पर आता रहता है।
अल नीनो के दौरान व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इससे गर्म पानी पूर्व की ओर फैलने लगता है और प्रशांत महासागर के मध्य तथा पूर्वी हिस्से का तापमान बढ़ जाता है। समुद्र और वायुमंडल के इस बदलाव से वैश्विक मौसम प्रणालियों पर असर पड़ता है।
दूसरे महासागरों में इसे अल नीनो क्यों नहीं कहते?
दुनिया के अन्य महासागरों में भी समुद्र की सतह का तापमान बदलता रहता है, लेकिन अल नीनो एक विशिष्ट जलवायु प्रक्रिया का नाम है। इसकी पहचान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र के तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में होने वाले आपसी बदलावों से की जाती है।
इसलिए दूसरे महासागरों में होने वाली गर्मी को सीधे अल नीनो नहीं कहा जाता। वहां तापमान में बदलाव के अपने अलग कारण और जलवायु संबंधी प्रभाव हो सकते हैं।
आने वाले महीनों में मौसम पर रहेगी नजर
अल नीनो का मजबूत होना दुनिया के कई हिस्सों के लिए चुनौती पैदा कर सकता है। भारत में मानसून, कृषि और जल उपलब्धता पर इसका असर महत्वपूर्ण रहेगा, जबकि दूसरे क्षेत्रों में गर्मी, सूखे और बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, इसके प्रभावों का आकलन करने के लिए नवीनतम आधिकारिक पूर्वानुमानों और क्षेत्रवार मौसम आंकड़ों को देखना जरूरी है।