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अंतरिक्ष बना नया युद्धक्षेत्र: अगले 5 सालों में स्पेस वॉर का खतरा, खतरे में पड़ा आपका इंटरनेट और ऑनलाइन बैंक अकाउंट

 

दुनिया में सैन्य तनाव के बीच अब अंतरिक्ष में भी टकराव का खतरा बढ़ने लगा है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि आने वाले पांच सालों में अमेरिका, रूस, चीन और ब्रिटेन जैसी बड़ी ताकतों के बीच अंतरिक्ष में सैन्य संघर्ष की स्थिति बन सकती है। इस दौरान एक-दूसरे के सैटेलाइट को निशाना बनाने या उनकी कार्यक्षमता बाधित करने की कोशिशें हो सकती हैं।

आज अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिक खोज और नई तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि देशों की सैन्य ताकत और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी अहम हिस्सा बन चुका है। इंटरनेट, टीवी प्रसारण, मौसम की जानकारी, बैंकिंग, GPS और सैन्य संचार जैसी कई सेवाएं सैटेलाइट पर निर्भर हैं। ऐसे में अगर अंतरिक्ष में युद्ध होता है, तो उसका असर धरती पर आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ सकता है।

अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ क्यों बढ़ रही है?

दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियां अब अंतरिक्ष में अपनी मौजूदगी मजबूत करने में जुटी हैं। आधुनिक सेनाएं दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, मिसाइल हमलों की चेतावनी प्राप्त करने, सैनिकों की स्थिति जानने और युद्ध के दौरान संचार बनाए रखने के लिए सैटेलाइट का इस्तेमाल करती हैं।

अगर किसी देश के सैटेलाइट को नष्ट कर दिया जाए या उसके सिग्नल बाधित कर दिए जाएं, तो उसकी निगरानी, संचार और सैन्य अभियान प्रभावित हो सकते हैं। इसी वजह से अंतरिक्ष में सैटेलाइट की सुरक्षा और उन्हें निशाना बनाने वाली तकनीकों को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है।

चार देश कर चुके हैं सैटेलाइट नष्ट करने वाले हथियारों का परीक्षण

अंतरिक्ष में सैन्य क्षमता बढ़ाने की दिशा में कई देश ऐसे परीक्षण कर चुके हैं, जिनमें मिसाइलों की मदद से पृथ्वी की कक्षा में मौजूद सैटेलाइट को नष्ट किया गया।

  • अमेरिका: वर्ष 2008 में अमेरिकी नौसेना ने मिसाइल से अपने खराब जासूसी सैटेलाइट USA-193 को नष्ट किया था।

  • चीन: वर्ष 2007 में चीन ने मिसाइल से अपने पुराने मौसम संबंधी सैटेलाइट FY-1C को नष्ट किया था।

  • भारत: 27 मार्च 2019 को भारत ने 'मिशन शक्ति' के तहत एंटी-सैटेलाइट मिसाइल का सफल परीक्षण किया था।

  • रूस: 15 नवंबर 2021 को रूस ने मिसाइल से अपने पुराने Cosmos-1408 सैटेलाइट को नष्ट किया था।

इन परीक्षणों ने यह दिखाया कि पृथ्वी की कक्षा में मौजूद सैटेलाइट भी सैन्य हमलों का निशाना बन सकते हैं। हालांकि, ऐसे परीक्षणों से अंतरिक्ष में मलबा पैदा होने का खतरा भी रहता है, जो दूसरे सैटेलाइट और अंतरिक्ष अभियानों के लिए समस्या बन सकता है।

चीन और रूस की अंतरिक्ष गतिविधियों पर अमेरिका की नजर

अमेरिकी अंतरिक्ष बल के मुताबिक, चीन ने ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम किया है, जिनकी मदद से एक सैटेलाइट दूसरे सैटेलाइट के बेहद करीब पहुंच सकता है। इस तरह की गतिविधियों का इस्तेमाल मरम्मत और निरीक्षण जैसे शांतिपूर्ण कार्यों में भी हो सकता है, लेकिन सैन्य उपयोग की आशंका भी जताई जाती है।

चीन ऐसी तकनीकों पर काम कर रहा है, जिनसे अंतरिक्ष में मौजूद दूसरे सैटेलाइट को पकड़ने, उनकी स्थिति बदलने या उनके कामकाज को प्रभावित करने की क्षमता विकसित हो सकती है।

रूस की सैन्य अंतरिक्ष गतिविधियों को लेकर भी पश्चिमी देशों ने चिंता जताई है। कुछ रिपोर्टों में रूसी सैटेलाइटों के दूसरे देशों के सैटेलाइट के करीब पहुंचने और उनकी निगरानी करने की आशंका व्यक्त की गई है। रूस के Cosmos-2553 सैटेलाइट को लेकर भी अमेरिकी अधिकारियों ने सवाल उठाए हैं। हालांकि, इस सैटेलाइट में परमाणु हथियार से जुड़े उपकरण होने के दावों को पुष्ट तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

अमेरिका और ब्रिटेन ने बढ़ाई अंतरिक्ष सुरक्षा

अंतरिक्ष में बढ़ती सैन्य प्रतिस्पर्धा के बीच कई देश अपनी सैटेलाइट सुरक्षा को मजबूत कर रहे हैं।

अमेरिका ने 2019 में अपनी अलग अंतरिक्ष सेना, यानी US Space Force, स्थापित की थी। इसका उद्देश्य अमेरिकी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा करना और अंतरिक्ष में संभावित खतरों पर नजर रखना है।

ब्रिटेन ने भी अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं और सैटेलाइट सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए हैं। सैन्य योजनाओं में अब अंतरिक्ष को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखा जा रहा है।

अंतरिक्ष में हमला करने के तीन प्रमुख तरीके

1. GPS सिग्नल को जाम करना

GPS और दूसरी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणालियां मोबाइल फोन, विमानों, जहाजों और सैन्य उपकरणों को उनकी लोकेशन बताने में मदद करती हैं।

अगर इन सिग्नलों को जानबूझकर बाधित किया जाए, तो नेविगेशन सिस्टम की सटीकता प्रभावित हो सकती है। विमानों और जहाजों को वैकल्पिक प्रणालियों का सहारा लेना पड़ सकता है, जबकि सैन्य अभियानों में भी मुश्किलें पैदा हो सकती हैं।

2. नकली सिग्नल भेजकर गलत लोकेशन दिखाना

इस तकनीक को GPS स्पूफिंग कहा जाता है। इसमें असली सिग्नल की जगह नकली सिग्नल भेजकर नेविगेशन सिस्टम को गलत स्थान या समय की जानकारी दी जा सकती है।

उदाहरण के लिए, समुद्र में चल रहे किसी जहाज के नेविगेशन सिस्टम में उसकी वास्तविक स्थिति के बजाय दूसरी जगह दिखाई दे सकती है। इससे रास्ता तय करने में भ्रम पैदा हो सकता है।

3. सैटेलाइट के नियंत्रण केंद्रों पर साइबर हमला

सैटेलाइट को नियंत्रित करने और उनसे जानकारी प्राप्त करने के लिए जमीन पर मौजूद स्टेशन और कंप्यूटर सिस्टम इस्तेमाल किए जाते हैं। इन प्रणालियों पर साइबर हमला होने से सैटेलाइट से संपर्क बाधित हो सकता है या डेटा की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

हालांकि, सैटेलाइट की सुरक्षा के लिए कई स्तरों पर तकनीकी उपाय किए जाते हैं। किसी सिस्टम को प्रभावित करने की वास्तविक क्षमता उसकी सुरक्षा व्यवस्था और हमले की प्रकृति पर निर्भर करती है।

अंतरिक्ष में जंग हुई तो आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

अंतरिक्ष में सैन्य टकराव केवल अंतरिक्ष एजेंसियों या सेनाओं तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर रोजमर्रा की कई सेवाओं पर पड़ सकता है।

  • इंटरनेट और संचार: कुछ सैटेलाइट आधारित संचार सेवाएं बाधित हो सकती हैं।

  • बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था: सटीक समय के लिए उपग्रह प्रणालियों पर निर्भर कुछ वित्तीय सेवाओं में परेशानी आ सकती है।

  • मौसम का पूर्वानुमान: मौसम संबंधी सैटेलाइट प्रभावित होने पर तूफान और दूसरी प्राकृतिक घटनाओं की निगरानी मुश्किल हो सकती है।

  • विमान और जहाज: GPS में रुकावट आने पर नेविगेशन प्रभावित हो सकता है और वैकल्पिक प्रणालियों की जरूरत बढ़ सकती है।

  • सैन्य सुरक्षा: मिसाइलों की चेतावनी, निगरानी और सेनाओं के बीच संचार की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

यह जरूरी नहीं कि किसी एक सैटेलाइट पर हमले से ये सभी सेवाएं बंद हो जाएं। असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा सैटेलाइट प्रभावित हुआ है और उसके विकल्प कितने उपलब्ध हैं।

क्या सच में अगले पांच साल में अंतरिक्ष युद्ध होगा?

अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा बढ़ना एक वास्तविक सुरक्षा चिंता है, लेकिन अगले पांच साल में युद्ध निश्चित रूप से होगा, ऐसा कहना अभी सही नहीं होगा। सैटेलाइट के करीब पहुंचने वाली तकनीक, एंटी-सैटेलाइट हथियार और साइबर हमलों की आशंकाएं देशों के बीच तनाव बढ़ा सकती हैं।

दूसरी ओर, अंतरिक्ष में टकराव से सभी देशों की संचार, नेविगेशन और सुरक्षा प्रणालियों को नुकसान पहुंचने का खतरा है। यही वजह है कि सैटेलाइट की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ को सीमित करने की जरूरत पर जोर दिया जाता है।

कुल मिलाकर, अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक खोज का क्षेत्र नहीं रह गया है। यह वैश्विक सुरक्षा और सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। आने वाले वर्षों में बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि अंतरिक्ष सहयोग का केंद्र बना रहेगा या सैन्य तनाव का नया मोर्चा बन जाएगा।