नेपाल में जल-प्रलय का साइंस: 4 हजार फीट से गिरे ग्लेशियर ने कैसे ली 162 लोगों की जान? जानिए पूरी बैकस्टोरी
26 अगस्त 2026 की सुबह नेपाल के लिए बेहद भयावह साबित हुई। काठमांडू से करीब 45 किलोमीटर उत्तर में स्थित 23,733 फीट ऊंचे लांगटांग लिरुंग पर्वत से ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा अचानक टूटकर नीचे जा गिरा। करीब 2,000 फीट चौड़ा यह बर्फीला हिस्सा लगभग 4,000 फीट नीचे घाटी में गिरा, जिससे इतना जबरदस्त कंपन पैदा हुआ कि शुरुआत में इसे भूकंप समझ लिया गया।
अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण यानी USGS ने भी शुरुआती तौर पर इसे भूकंप के तौर पर रिकॉर्ड किया। बाद की जांच में सामने आया कि यह भूकंप नहीं था, बल्कि ग्लेशियर के ढहने से पैदा हुई भूकंपीय तरंगें थीं। इस घटना से करीब 5.2 तीव्रता जैसा कंपन महसूस किया गया।
आखिर ग्लेशियर कैसे टूटा?
घटना की शुरुआत लांगटांग लिरुंग पर्वत की उत्तरी ढलान से हुई। करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर मौजूद ग्लेशियर का निचला हिस्सा अचानक टूट गया और बर्फ, चट्टान तथा मलबे का विशाल ढेर तेजी से नीचे घाटी की ओर गिरने लगा।
ग्लेशियर के हजारों फीट नीचे गिरने से जबरदस्त ऊर्जा पैदा हुई। इसी वजह से धरती में भूकंप जैसी तरंगें पैदा हुईं। शुरुआती आकलन के मुताबिक इस घटना से निकली ऊर्जा बेहद शक्तिशाली थी।
सबसे खास बात यह रही कि यहां भूकंप की वजह से ग्लेशियर नहीं टूटा, बल्कि ग्लेशियर के गिरने से भूकंप जैसा कंपन पैदा हुआ।
ग्लेशियर टूटने के बाद कैसे आई मलबे की सुनामी?
ग्लेशियर का विशाल हिस्सा घाटी में गिरने के बाद ल्हेन्डे खोला नदी का रास्ता बंद हो गया। यह नदी भोटे कोशी नदी की सहायक नदी है। नदी का रास्ता रुकने से वहां प्राकृतिक बांध जैसा बन गया और उसके पीछे पानी जमा होने लगा।
ग्लेशियर के गिरने से पैदा हुई गर्मी और घर्षण के कारण बर्फ का कुछ हिस्सा तेजी से पिघला। इसके बाद पानी में मिट्टी, चट्टान, बर्फ और भारी मलबा शामिल हो गया।
जब प्राकृतिक बांध टूटा तो सिर्फ पानी नहीं निकला, बल्कि मलबे और कीचड़ की एक बेहद तेज धारा नीचे की ओर दौड़ पड़ी। इसकी ऊंचाई करीब 100 फीट तक बताई गई। यह ल्हेन्डे खोला से होते हुए भोटे कोशी और फिर त्रिशूली नदी की ओर बढ़ती चली गई।
इसे सामान्य बाढ़ के बजाय मलबे और पानी की एक विशाल लहर के रूप में देखा गया, जिसने रास्ते में आने वाली कई चीजों को अपनी चपेट में ले लिया।
तबाही का मंजर देखकर कांप उठे लोग
बाढ़ और मलबे की इस तेज धारा ने रास्ते में मौजूद घरों, सड़कों और दूसरी संरचनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। तिब्बत की ओर जाने वाले ग्यिरोंग बॉर्डर पोस्ट से सामने आए दृश्यों में लोग जान बचाने के लिए भागते नजर आए।
मलबे की तेज लहर ने कई इमारतों को नुकसान पहुंचाया और वाहनों को भी अपनी चपेट में ले लिया। नेपाल के कई इलाकों में अचानक आई इस तबाही से लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला।
बाढ़ में फंसे लोगों ने बताया कि मलबे और पानी की आवाज इतनी तेज थी कि ऐसा लग रहा था जैसे कोई बड़ा भूकंप आ गया हो। कई लोगों ने पेड़ों और ऊंची जगहों पर पहुंचकर अपनी जान बचाई।
एक स्थानीय मजदूर के मुताबिक, वह जान बचाने के लिए भाग रहा था तभी पानी और मलबे की एक बड़ी लहर उसकी तरफ आई। वह बहते हुए एक आम के पेड़ से जा टकराया और उसी को पकड़कर उसकी जान बच सकी।
कितनी बड़ी है तबाही?
इस आपदा में जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। तिब्बत के ग्यिरोंग क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।
इस आपदा का असर पर्यटकों और तीर्थयात्रियों पर भी पड़ा है। लांगटांग ट्रेकिंग रूट के शुरुआती इलाके स्याब्रुबेसी को भारी नुकसान पहुंचा है। कैलाश मानसरोवर यात्रा के रास्ते भी प्रभावित हुए हैं।
रसुवा जिले में कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई है। इसके अलावा बैंक शाखाओं और स्थानीय बुनियादी ढांचे पर भी बाढ़ का असर पड़ा है।
पहाड़ों में क्यों बढ़ रही हैं ऐसी घटनाएं?
विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालयी क्षेत्र पहले से ही भौगोलिक रूप से बेहद संवेदनशील है। भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों की लगातार टक्कर के कारण हिमालय में भूगर्भीय हलचल बनी रहती है।
इसके साथ ही बढ़ता तापमान ग्लेशियरों के लिए नई चुनौती पैदा कर रहा है। हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ग्लेशियल झीलों और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ने से पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन, हिमस्खलन और ग्लेशियर झील फटने जैसी घटनाओं का खतरा भी बढ़ रहा है।
नेपाल के लिए बड़ी चेतावनी
लांगटांग लिरुंग से जुड़ी यह घटना नेपाल के लिए एक बड़ी चेतावनी मानी जा रही है। इससे पहले 2015 के विनाशकारी भूकंप के दौरान भी लांगटांग क्षेत्र में बड़े हिमस्खलन ने भारी तबाही मचाई थी।
इस बार ग्लेशियर के टूटने के बाद पैदा हुई बाढ़ और मलबे की लहर ने कई किलोमीटर तक तबाही मचाई। पानी और मलबा आगे बढ़ते हुए नारायणी नदी तक पहुंच गया।
बढ़ता तापमान, तेजी से पिघलते ग्लेशियर और अस्थिर हिमालयी भूभाग आने वाले समय में ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकते हैं। ऐसे में नेपाल समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए बेहतर निगरानी, समय रहते चेतावनी और मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था बेहद जरूरी हो गई है।