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Saudi Arabia vs Houthis: अमेरिकी हथियारों के बावजूद हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रहा सऊदी अरब? ड्रोन-मिसाइलों ने बढ़ाई चुनौती

 

सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइलें और अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम हैं। अमेरिका भी उसे हथियारों, खुफिया जानकारी और तकनीकी सहयोग के जरिए मदद देता रहा है। इसके बावजूद यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब को निर्णायक जीत नहीं मिल पाई है। साल 2015 में शुरू हुए सैन्य अभियान के एक दशक से अधिक समय बाद भी हूती यमन के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।

इस संघर्ष ने सऊदी अरब के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। हूती अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन और मिसाइलों से हमले करने की क्षमता रखते हैं, जबकि इन हमलों को रोकने के लिए सऊदी अरब को महंगे रक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि सैन्य ताकत और विदेशी मदद के बावजूद हूतियों को पूरी तरह पीछे धकेलना इतना मुश्किल क्यों है?

2015 से जारी है सऊदी अरब और हूतियों का संघर्ष

यमन में हूती विद्रोहियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद मार्च 2015 में सऊदी अरब ने कई देशों के साथ मिलकर हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया।

सऊदी अरब का उद्देश्य यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को दोबारा सत्ता में लाना और हूतियों के नियंत्रण को खत्म करना था। इस दौरान गठबंधन ने कई वर्षों तक हवाई हमले किए, लेकिन हूतियों की ताकत पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी।

हूती आज भी यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं। उनकी सैन्य क्षमताओं में ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल शामिल है, जिससे सऊदी अरब को अपनी सीमाओं और अहम ठिकानों की सुरक्षा पर लगातार ध्यान देना पड़ता है।

अमेरिकी हथियारों के बावजूद निर्णायक जीत क्यों नहीं?

सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान और दुश्मन के हवाई हमलों को रोकने वाले रक्षा सिस्टम हैं। अमेरिका लंबे समय से उसे सैन्य उपकरण और दूसरी तरह की सहायता देता रहा है। इसके बावजूद केवल हथियारों की ताकत से हूतियों को हराना आसान साबित नहीं हुआ।

इसकी एक बड़ी वजह हमले और बचाव की लागत है। हूती अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन और कुछ प्रकार की मिसाइलों का इस्तेमाल कर सकते हैं। दूसरी ओर, इन हमलों को रोकने के लिए सऊदी अरब को महंगे इंटरसेप्टर इस्तेमाल करने पड़ सकते हैं।

इससे रक्षा पर होने वाला खर्च बढ़ सकता है। हालांकि, वास्तविक लागत हथियारों के प्रकार, हमले की संख्या और इस्तेमाल किए गए रक्षा सिस्टम पर निर्भर करती है।

यमन का पहाड़ी इलाका भी बड़ी चुनौती

यमन की भौगोलिक स्थिति भी हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान को मुश्किल बनाती है। देश के कई हिस्सों में पहाड़ और दुर्गम इलाके हैं, जहां विद्रोहियों के ठिकानों का पता लगाना और उन पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है।

हवाई हमलों से किसी ठिकाने को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, लेकिन इससे पूरे इलाके पर नियंत्रण स्थापित नहीं होता। हूतियों को हटाने के लिए बड़े जमीनी अभियान की जरूरत पड़ सकती है, जिसमें सैनिकों के हताहत होने और संघर्ष लंबे समय तक जारी रहने का जोखिम रहता है।

ईरान से संबंधों ने बढ़ाई हूतियों की सैन्य क्षमता

ईरान और हूती विद्रोहियों के बीच लंबे समय से संबंध हैं। सऊदी अरब और अमेरिका आरोप लगाते रहे हैं कि ईरान हूतियों को हथियार, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देता है। ईरान की भूमिका को लेकर अलग-अलग पक्षों के दावे हैं, लेकिन हूतियों की ड्रोन और मिसाइल क्षमताएं क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं।

हालांकि, हूतियों को केवल ईरान के इशारे पर चलने वाला संगठन मानना सही नहीं होगा। उनका अपना नेतृत्व, राजनीतिक एजेंडा और यमन के भीतर सत्ता से जुड़े हित भी हैं।

सऊदी अरब और ईरान के बीच क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता ने भी इस संघर्ष को व्यापक भू-राजनीतिक महत्व दिया है।

तेल और गैस से होने वाली कमाई पर भी विवाद

यमन में तेल और गैस से मिलने वाले राजस्व का बंटवारा लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। हूती चाहते हैं कि इस आय का इस्तेमाल सरकारी कर्मचारियों के वेतन और अन्य जरूरतों को पूरा करने में किया जाए। वे तेल-गैस से होने वाली कमाई में हिस्सेदारी की मांग भी करते रहे हैं।

यह विवाद केवल आर्थिक नहीं है। तेल और गैस से होने वाले राजस्व पर नियंत्रण का असर यमन में राजनीतिक ताकत और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी पड़ता है। इसलिए किसी भी संभावित समझौते में राजस्व का बंटवारा अहम मुद्दा बन सकता है।

एयरपोर्ट और तेल ठिकानों की सुरक्षा पर दबाव

ड्रोन और मिसाइल हमलों की आशंका सऊदी अरब के लिए सुरक्षा संबंधी चुनौती बनी हुई है। ऐसे हमले एयरपोर्ट, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और दूसरे अहम ठिकानों के संचालन को प्रभावित कर सकते हैं। इससे तेल कारोबार और नागरिक उड़ानों की सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं बढ़ती हैं।

हालांकि, किसी खास हमले, उसके समय और उससे हुए नुकसान की पुष्टि के लिए विश्वसनीय ताजा रिपोर्टों की जरूरत है।

सऊदी अरब के सामने क्या हैं विकल्प?

हूतियों के खिलाफ संघर्ष में सऊदी अरब के सामने सैन्य कार्रवाई जारी रखने, जमीनी अभियान बढ़ाने या बातचीत के जरिए राजनीतिक समझौते की कोशिश करने जैसे विकल्प हैं। लेकिन हर विकल्प के साथ अलग-अलग जोखिम जुड़े हैं।

लंबा सैन्य अभियान आर्थिक और सुरक्षा संबंधी दबाव बढ़ा सकता है, जबकि जमीनी कार्रवाई में सैनिकों के हताहत होने का खतरा रहता है। दूसरी ओर, बातचीत के जरिए समझौते के लिए यमन की सत्ता, सुरक्षा और राजस्व से जुड़े विवादों पर सहमति बनाना जरूरी होगा।

इस संघर्ष से यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक हथियार और विदेशी सैन्य सहायता होने के बावजूद किसी मजबूत स्थानीय विद्रोही संगठन को हराना आसान नहीं होता। यमन का भूगोल, हूतियों की स्थानीय पकड़, ड्रोन-मिसाइलों की रणनीति और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता सऊदी अरब के लिए चुनौती बनी हुई है।