Saudi Arabia-Houthis War: बाब-अल-मंदेब पर कब्जे को लेकर सऊदी की बड़ी तैयारी, 1 लाख यमनी सैनिक हो सकते हैं शामिल
यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब बड़े सैन्य अभियान की तैयारी कर रहा है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर फिर से नियंत्रण स्थापित करने के लिए यमनी जमीनी बलों के साथ अभियान शुरू करने के विकल्पों पर विचार कर रहा है. अभियान का नेतृत्व यमनी बल कर सकते हैं, जबकि उन्हें सऊदी अरब की हवाई सहायता मिलने की संभावना है. रिपोर्ट के अनुसार, अभियान के आकार के आधार पर 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिकों को जुटाया जा सकता है.
बाब-अल-मंदेब क्यों है इतना अहम?
बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. इसके जरिए एशिया से आने-जाने वाले जहाज लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते यूरोप तक पहुंचते हैं. यही वजह है कि इस जलडमरूमध्य में अस्थिरता का असर अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है. रॉयटर्स के मुताबिक, बाब-अल-मंदेब से दुनिया के तेल उत्पादन का करीब 7% गुजरता है.
हाल के हफ्तों में हूती बलों ने यमन के लाल सागर तट के इलाकों में अपनी स्थिति मजबूत की है. रॉयटर्स के अनुसार, हूतियों ने बाब-अल-मंदेब के आसपास महत्वपूर्ण इलाकों और द्वीपों पर अपनी पकड़ बढ़ाई है.
सैन्य अभियान के दो विकल्पों पर विचार
रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी नेतृत्व के सामने सैन्य कार्रवाई के दो प्रमुख विकल्प हैं. पहला विकल्प बाब-अल-मंदेब के आसपास सीमित अभियान चलाकर समुद्री मार्ग को सुरक्षित करना है.
दूसरे विकल्प के तहत यमन के कई मोर्चों पर एक साथ कार्रवाई की जा सकती है. इनमें अल-बायदा, मारिब, ताइज और अल-जौफ जैसे इलाके शामिल हैं. अभियान का दायरा कितना बड़ा होगा, इसी आधार पर जमीनी बलों की संख्या तय की जा सकती है.
अभियान की सटीक तारीख अभी तय नहीं बताई गई है. रॉयटर्स से बात करने वाले अधिकारियों और सूत्रों के अनुमान अलग-अलग हैं और कार्रवाई आने वाले हफ्तों में शुरू होने की संभावना जताई गई है.
अमेरिका सीधे युद्ध में शामिल नहीं होगा
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका सऊदी अरब को खुफिया और लक्ष्य संबंधी सहायता दे रहा है, लेकिन अमेरिकी या अन्य सहयोगी देशों की सेनाओं के सीधे जमीनी युद्ध में उतरने की उम्मीद नहीं है. तुर्किये और पाकिस्तान समेत कुछ देश मुख्य रूप से रक्षात्मक सैन्य सहायता उपलब्ध करा रहे हैं.
पाकिस्तान ने सऊदी अरब को सैन्य उपकरण और सलाहकार उपलब्ध कराए हैं, लेकिन रॉयटर्स के अनुसार उसने यमन में लड़ाकू भूमिका के लिए अपने सैनिक भेजने का फैसला नहीं किया है. फ्रांस ने भी सऊदी अरब के लाल सागर तट पर स्थित यानबू की सुरक्षा के लिए रक्षात्मक प्रणालियां और सैनिक भेजने की घोषणा की है.
यमनी गुटों के बीच मतभेद बड़ी चुनौती
सऊदी अरब के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यमन के हूती विरोधी गुटों के बीच एकजुटता की कमी है. रॉयटर्स के मुताबिक, इन गुटों के राजनीतिक और सैन्य हित अलग-अलग हैं और लंबे समय तक चलने वाले अभियान के लिए उनके बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा.
विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी भी सैन्य अभियान का परिणाम केवल सैनिकों की संख्या पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि जमीनी बलों की संगठनात्मक क्षमता और विभिन्न गुटों के बीच तालमेल भी अहम होगा.
समुद्री व्यापार पर बढ़ रहा दबाव
बाब-अल-मंदेब में बढ़ते तनाव का असर पहले से ही समुद्री यातायात पर दिखाई दे रहा है. रॉयटर्स के मुताबिक, सितंबर में इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कमोडिटी जहाजों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई थी. इससे शिपिंग कंपनियों के सामने मार्ग बदलने और परिवहन लागत बढ़ने की चुनौती पैदा हुई है.
यमन में हालिया लड़ाई से मानवीय संकट भी बढ़ा है. संयुक्त राष्ट्र की प्रवासन एजेंसी के अनुसार, सितंबर में संघर्ष बढ़ने के बाद बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं. ऐसे में किसी बड़े सैन्य अभियान से सुरक्षा और मानवीय स्थिति पर भी असर पड़ने की आशंका है.