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भारत के लिए राहत की खबर: ट्रम्प ने रोकी 100% टैरिफ की धमकी! रूस से डीजल डील पर बोले- अमेरिका को मिलेंगे 6 बड़े फायदे

 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर सख्त प्रतिबंध लगाने की योजना को फिलहाल रोक दिया है। शुक्रवार को इस फैसले से जुड़े आदेश पर हस्ताक्षर करते हुए ट्रम्प ने कहा कि यह कदम अमेरिका के हित में है। प्रस्तावित कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता था। इससे भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों पर भी असर पड़ने की आशंका थी।

इस फैसले को भारत के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आने वाले कच्चे तेल से पूरा करता है। रूस भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। हालांकि, अमेरिकी फैसले का आगे क्या असर होगा, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

रूस पर प्रतिबंध लगाने का मकसद क्या था?

रूस पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े प्रस्ताव का उद्देश्य उसकी तेल और गैस से होने वाली कमाई को सीमित करना था, ताकि यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध के लिए रूस को आर्थिक संसाधन जुटाने में कठिनाई हो। इस कानून के तहत रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान था।

भारत और चीन के अलावा स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों पर भी संभावित टैरिफ का असर पड़ सकता था। यदि 100% तक टैरिफ लगाया जाता, तो इन देशों के अमेरिका के साथ व्यापार पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका थी।

ट्रम्प ने रूस पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े लिंडसे ग्राहम एक्ट पर 18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर किए थे। इससे पहले 16 सितंबर को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने इस विधेयक को 262 के मुकाबले 159 वोटों से मंजूरी दी थी। कानून पर हस्ताक्षर के बाद ट्रम्प को 30 दिनों के भीतर प्रतिबंध लगाने के बारे में फैसला करना था। हालांकि, उन्होंने समय सीमा पूरी होने से पहले ही इस मामले में राहत देने का फैसला कर लिया।

भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85% से अधिक हिस्सा आयात करता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त 2026 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 45% थी। इस दौरान भारत ने रूस से प्रतिदिन औसतन 20.8 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा था।

ऐसे में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक अमेरिकी टैरिफ लगाए जाने की आशंका भारत के लिए चिंता का विषय थी। इससे भारत के व्यापारिक संबंधों और ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसलों पर दबाव बढ़ सकता था।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को कहा था कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए तेल की उपलब्धता और वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखता है। भारत पहले भी अमेरिकी अधिकारियों के सामने ऊर्जा आयात से जुड़ा अपना पक्ष रख चुका है।

विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की स्थिति में रूस से तेल की आपूर्ति घटाना वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ा सकता है। इसका असर केवल भारत ही नहीं, बल्कि कई दूसरे तेल आयातक देशों पर भी पड़ सकता है।

तेल की बढ़ती कीमतों के बीच ट्रम्प का फैसला

ट्रम्प के फैसले के पीछे अमेरिका में तेल और पेट्रोल की कीमतों को लेकर बढ़ती चिंता भी एक वजह मानी जा रही है। यूक्रेन की ओर से रूस की तेल रिफाइनरियों पर किए जा रहे हमलों से आपूर्ति प्रभावित होने की खबरें हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

अमेरिका में नवंबर 2026 में मिडटर्म चुनाव होने हैं। इन चुनावों में महंगाई और पेट्रोल की कीमतें मतदाताओं के लिए अहम मुद्दे हो सकती हैं। यदि ईंधन महंगा होता है, तो इसका असर आम लोगों के घरेलू बजट पर पड़ सकता है और सरकार को राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।

ऐसे में रूस पर और सख्त प्रतिबंध लगाने से पहले ट्रम्प प्रशासन को ऊर्जा बाजार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर का आकलन करना पड़ रहा है।

रूस से डीजल खरीदने की छूट पर भी विवाद

रूस को लेकर ट्रम्प प्रशासन का रुख पहले से चर्चा में है। खबरों के मुताबिक, ट्रम्प ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत के बाद अमेरिका की ओर से रूस से डीजल खरीदने से जुड़े समझौते की घोषणा की थी। रूसी डीजल की बिक्री पर लगी कुछ पाबंदियों में अप्रैल 2027 तक छूट दिए जाने की बात भी सामने आई है।

इस कदम पर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने नाराजगी जताई है। यूरोपीय अधिकारियों ने भी इसका विरोध किया। अमेरिकी संसद के दोनों दलों के कुछ सदस्यों ने इस सप्ताह ट्रम्प से डीजल की बिक्री पर दी गई छूट वापस लेने की मांग की थी।

इस पूरे घटनाक्रम ने रूस के खिलाफ अमेरिकी नीति को लेकर सवाल खड़े किए हैं। एक तरफ अमेरिका यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की बात करता रहा है, वहीं दूसरी ओर ऊर्जा की कीमतों और आपूर्ति से जुड़े हितों के कारण कुछ मामलों में राहत भी दी जा रही है।

अमेरिकी सांसदों ने फैसले की आलोचना की

रूस पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े कानून को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों दलों के सांसदों का समर्थन मिला था। इसके बावजूद ट्रम्प द्वारा प्रतिबंधों को फिलहाल रोकने के फैसले की कुछ अमेरिकी सांसदों ने आलोचना की है।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ सांसदों को पहले से आशंका थी कि ट्रम्प इस कानून के तहत रूस पर अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाएंगे। अब प्रतिबंधों को फिलहाल रोकने के फैसले के बाद अमेरिकी राजनीति में इस मुद्दे पर बहस और तेज होने की संभावना है।

आगे क्या होगा?

ट्रम्प के ताजा फैसले से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर तत्काल भारी टैरिफ लगाए जाने की आशंका फिलहाल कम हुई है। भारत के लिए यह राहत इसलिए अहम है, क्योंकि रूस से होने वाली तेल खरीद देश की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा है।

हालांकि, इस फैसले को रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की स्थायी समाप्ति नहीं माना जाना चाहिए। आने वाले समय में अमेरिका की नीति, वैश्विक तेल कीमतों, यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया की परिस्थितियों के आधार पर आगे के कदम तय हो सकते हैं।

कुल मिलाकर, ट्रम्प के सामने एक बड़ी चुनौती है—रूस पर आर्थिक दबाव बनाए रखना और साथ ही अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश करना। इस संतुलन का असर भारत समेत दुनिया के कई देशों की ऊर्जा नीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर सख्त प्रतिबंध लगाने की योजना को फिलहाल रोक दिया है। शुक्रवार को इस फैसले से जुड़े आदेश पर हस्ताक्षर करते हुए ट्रम्प ने कहा कि यह कदम अमेरिका के हित में है। प्रस्तावित कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता था। इससे भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों पर भी असर पड़ने की आशंका थी।

इस फैसले को भारत के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आने वाले कच्चे तेल से पूरा करता है। रूस भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। हालांकि, अमेरिकी फैसले का आगे क्या असर होगा, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

रूस पर प्रतिबंध लगाने का मकसद क्या था?

रूस पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े प्रस्ताव का उद्देश्य उसकी तेल और गैस से होने वाली कमाई को सीमित करना था, ताकि यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध के लिए रूस को आर्थिक संसाधन जुटाने में कठिनाई हो। इस कानून के तहत रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान था।

भारत और चीन के अलावा स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों पर भी संभावित टैरिफ का असर पड़ सकता था। यदि 100% तक टैरिफ लगाया जाता, तो इन देशों के अमेरिका के साथ व्यापार पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका थी।

ट्रम्प ने रूस पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े लिंडसे ग्राहम एक्ट पर 18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर किए थे। इससे पहले 16 सितंबर को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने इस विधेयक को 262 के मुकाबले 159 वोटों से मंजूरी दी थी। कानून पर हस्ताक्षर के बाद ट्रम्प को 30 दिनों के भीतर प्रतिबंध लगाने के बारे में फैसला करना था। हालांकि, उन्होंने समय सीमा पूरी होने से पहले ही इस मामले में राहत देने का फैसला कर लिया।

भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85% से अधिक हिस्सा आयात करता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त 2026 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 45% थी। इस दौरान भारत ने रूस से प्रतिदिन औसतन 20.8 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा था।

ऐसे में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक अमेरिकी टैरिफ लगाए जाने की आशंका भारत के लिए चिंता का विषय थी। इससे भारत के व्यापारिक संबंधों और ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसलों पर दबाव बढ़ सकता था।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को कहा था कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए तेल की उपलब्धता और वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखता है। भारत पहले भी अमेरिकी अधिकारियों के सामने ऊर्जा आयात से जुड़ा अपना पक्ष रख चुका है।

विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की स्थिति में रूस से तेल की आपूर्ति घटाना वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ा सकता है। इसका असर केवल भारत ही नहीं, बल्कि कई दूसरे तेल आयातक देशों पर भी पड़ सकता है।

तेल की बढ़ती कीमतों के बीच ट्रम्प का फैसला

ट्रम्प के फैसले के पीछे अमेरिका में तेल और पेट्रोल की कीमतों को लेकर बढ़ती चिंता भी एक वजह मानी जा रही है। यूक्रेन की ओर से रूस की तेल रिफाइनरियों पर किए जा रहे हमलों से आपूर्ति प्रभावित होने की खबरें हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

अमेरिका में नवंबर 2026 में मिडटर्म चुनाव होने हैं। इन चुनावों में महंगाई और पेट्रोल की कीमतें मतदाताओं के लिए अहम मुद्दे हो सकती हैं। यदि ईंधन महंगा होता है, तो इसका असर आम लोगों के घरेलू बजट पर पड़ सकता है और सरकार को राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।

ऐसे में रूस पर और सख्त प्रतिबंध लगाने से पहले ट्रम्प प्रशासन को ऊर्जा बाजार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर का आकलन करना पड़ रहा है।

रूस से डीजल खरीदने की छूट पर भी विवाद

रूस को लेकर ट्रम्प प्रशासन का रुख पहले से चर्चा में है। खबरों के मुताबिक, ट्रम्प ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत के बाद अमेरिका की ओर से रूस से डीजल खरीदने से जुड़े समझौते की घोषणा की थी। रूसी डीजल की बिक्री पर लगी कुछ पाबंदियों में अप्रैल 2027 तक छूट दिए जाने की बात भी सामने आई है।

इस कदम पर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने नाराजगी जताई है। यूरोपीय अधिकारियों ने भी इसका विरोध किया। अमेरिकी संसद के दोनों दलों के कुछ सदस्यों ने इस सप्ताह ट्रम्प से डीजल की बिक्री पर दी गई छूट वापस लेने की मांग की थी।

इस पूरे घटनाक्रम ने रूस के खिलाफ अमेरिकी नीति को लेकर सवाल खड़े किए हैं। एक तरफ अमेरिका यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की बात करता रहा है, वहीं दूसरी ओर ऊर्जा की कीमतों और आपूर्ति से जुड़े हितों के कारण कुछ मामलों में राहत भी दी जा रही है।

अमेरिकी सांसदों ने फैसले की आलोचना की

रूस पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े कानून को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों दलों के सांसदों का समर्थन मिला था। इसके बावजूद ट्रम्प द्वारा प्रतिबंधों को फिलहाल रोकने के फैसले की कुछ अमेरिकी सांसदों ने आलोचना की है।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ सांसदों को पहले से आशंका थी कि ट्रम्प इस कानून के तहत रूस पर अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाएंगे। अब प्रतिबंधों को फिलहाल रोकने के फैसले के बाद अमेरिकी राजनीति में इस मुद्दे पर बहस और तेज होने की संभावना है।

आगे क्या होगा?

ट्रम्प के ताजा फैसले से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर तत्काल भारी टैरिफ लगाए जाने की आशंका फिलहाल कम हुई है। भारत के लिए यह राहत इसलिए अहम है, क्योंकि रूस से होने वाली तेल खरीद देश की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा है।

हालांकि, इस फैसले को रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की स्थायी समाप्ति नहीं माना जाना चाहिए। आने वाले समय में अमेरिका की नीति, वैश्विक तेल कीमतों, यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया की परिस्थितियों के आधार पर आगे के कदम तय हो सकते हैं।

कुल मिलाकर, ट्रम्प के सामने एक बड़ी चुनौती है—रूस पर आर्थिक दबाव बनाए रखना और साथ ही अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश करना। इस संतुलन का असर भारत समेत दुनिया के कई देशों की ऊर्जा नीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।