फ्रांस में बेकाबू हुआ विरोध प्रदर्शन: धमाके में छात्र ने गंवाया हाथ, 5000 गिरफ्तारियों में से ज्यादातर नाबालिग
फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार बढ़ता जा रहा है। सितंबर में शुरू हुआ विरोध अब देश के कई हिस्सों तक पहुंच गया है। छात्र स्कूलों में बढ़ती भीड़, शिक्षकों की कमी, जर्जर इमारतों और पर्याप्त संसाधन नहीं मिलने का विरोध कर रहे हैं।पिछले एक सप्ताह में छात्रों ने सैकड़ों स्कूलों में कामकाज प्रभावित किया है। कई जगह प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प की खबरें भी सामने आई हैं। आंदोलन के दौरान कुछ छात्रों के घायल होने की घटनाओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
प्रदर्शन के दौरान छात्रों के घायल होने की खबर
लेंस शहर में एक स्कूल के पास हुए धमाके में 15 साल के एक छात्र के हाथ में गंभीर चोट आई और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। इससे पहले 14 वर्षीय ईडन नाम के एक छात्र के सिर पर आंसू गैस का गोला लगने की खबर सामने आई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, उसके जबड़े में फ्रैक्चर हुआ और उसे सर्जरी करानी पड़ी।प्रदर्शन से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, अब तक कम से कम 190 छात्र घायल हुए हैं और करीब 5,060 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार लोगों में बड़ी संख्या नाबालिगों की बताई जा रही है।
मंगलवार को बड़े देशव्यापी प्रदर्शन की तैयारी
छात्रों के समर्थन में मंगलवार को देशभर में बड़े प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है। प्रमुख छात्र संगठन यूनियन सिंडिकेल लिसेन ने लोगों से आंदोलन में शामिल होने की अपील की है। शिक्षकों के संगठनों ने भी अपने सदस्यों से प्रदर्शन में भाग लेने का आह्वान किया है।छात्रों का कहना है कि स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन उसके अनुपात में कक्षाओं, शिक्षकों और दूसरी जरूरी सुविधाओं में बढ़ोतरी नहीं हुई है। उनका आरोप है कि इसका सीधा असर पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
सरकार ने कदम उठाने का भरोसा दिया
फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू ने छात्रों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों की समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ कदमों की घोषणा की है। सरकार की ओर से स्कूलों में सुधार और संसाधन बढ़ाने का भरोसा दिया गया है।हालांकि, प्रदर्शन के दौरान हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामलों को लेकर सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। कई जगह स्कूलों की नाकेबंदी की गई और कूड़ेदानों में आग लगाने की घटनाएं सामने आईं।शिक्षा मंत्री एडुआर जॉफ्रे के मुताबिक, आंदोलन शुरू होने के बाद से 24 स्कूलों में आगजनी या तोड़फोड़ की घटनाएं हुई हैं।
21 सितंबर को पेरिस से शुरू हुआ था विरोध
इस आंदोलन की शुरुआत 21 सितंबर को पेरिस के एक स्कूल से हुई थी। यहां छात्रों ने स्टाफ और जरूरी संसाधनों की कमी को लेकर विरोध शुरू किया था।स्कूल में अतिरिक्त स्टाफ भेजे जाने के बाद वहां की हड़ताल खत्म हो गई, लेकिन तब तक दूसरे इलाकों में भी प्रदर्शन शुरू हो चुके थे। इसके बाद विश्वविद्यालयों के छात्र भी इस आंदोलन से जुड़ गए।छात्र नेता मानेस नडेल का कहना है कि शुरुआती स्कूल में विरोध खत्म होने तक आंदोलन दूसरे क्षेत्रों में फैल चुका था। उनके मुताबिक, इतने बड़े स्तर पर स्कूलों का किसी आंदोलन में शामिल होना पहले कम ही देखने को मिला है।
छात्रों की संख्या बढ़ी, लेकिन शिक्षकों की संख्या कम हुई
फ्रांस में मौजूदा शिक्षा संकट की एक बड़ी वजह छात्रों की बढ़ती संख्या और शिक्षकों की कमी को बताया जा रहा है।2010 में फ्रांस में करीब 8.33 लाख बच्चों का जन्म हुआ था। अब उस साल जन्मे बच्चे 15-16 साल की उम्र में हाई स्कूल में पहुंच चुके हैं। ऐसे में माध्यमिक स्कूलों पर छात्रों का दबाव बढ़ गया है।दूसरी ओर, छात्रों की संख्या बढ़ने के बावजूद स्कूलों में शिक्षकों और दूसरी सुविधाओं में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2008 की तुलना में माध्यमिक स्कूलों में शिक्षकों की संख्या कम हुई है, जबकि छात्रों की संख्या करीब 2.5 लाख बढ़ी है।यही वजह है कि कई स्कूलों में भीड़भाड़, स्टाफ की कमी और संसाधनों की कमी को लेकर शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं।
सिर्फ छात्र ही नहीं, कई वर्ग सरकार से नाराज
फ्रांस में इस समय विरोध केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। शिक्षक, सरकारी कर्मचारी, फायरफाइटर, स्वास्थ्यकर्मी और मछुआरे भी अलग-अलग मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
सरकारी कर्मचारी: सरकारी खर्च कम करने और वेतन से जुड़ी प्रस्तावित नीतियों का विरोध कर रहे हैं। उन्हें आशंका है कि बजट कटौती का असर उनकी आय और सुविधाओं पर पड़ सकता है।
शिक्षक: स्कूलों में स्टाफ की कमी, बढ़ते काम के दबाव और सरकार की बजट नीतियों को लेकर नाराज हैं।
फायरफाइटर: बेहतर फंडिंग, संसाधन और काम करने की सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। हाल की बड़ी जंगल की आग के बाद भी पर्याप्त संसाधनों का मुद्दा सामने आया है।
स्वास्थ्यकर्मी: सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ज्यादा फंड और संसाधनों की मांग कर रहे हैं।
मछुआरे: ईंधन की बढ़ती कीमतों का विरोध कर रहे हैं। महंगे डीजल के कारण मछली पकड़ने की लागत बढ़ने से उन्होंने कई जगह बंदरगाहों और ईंधन टर्मिनलों पर विरोध किया है।
महंगे ईंधन ने बढ़ाई सरकार की चिंता
अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच तेल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी ने फ्रांस की आर्थिक चुनौतियों को और बढ़ाया है। सरकार कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए कई कदमों पर काम कर रही है।
G7 देशों की ओर से रणनीतिक भंडार से बड़ी मात्रा में तेल और डीजल बाजार में जारी करने की योजना भी इसी कोशिश का हिस्सा बताई जा रही है। इसका उद्देश्य ऊर्जा कीमतों पर दबाव कम करना है।
बढ़ता सरकारी कर्ज सरकार के लिए बड़ी चुनौती
फ्रांस के सामने सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में भारी सरकारी कर्ज भी शामिल है। देश का सरकारी कर्ज उसकी अर्थव्यवस्था के आकार के मुकाबले काफी ऊंचे स्तर पर है। कर्ज पर बढ़ती ब्याज लागत सरकार के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है।इसके अलावा देश की बढ़ती उम्रदराज आबादी के कारण पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। वहीं यूक्रेन युद्ध के बाद रक्षा खर्च बढ़ने से सरकार पर आर्थिक दबाव और बढ़ा है।
ऐसे में फ्रांस की सरकार के सामने एक साथ कई चुनौतियां हैं—शिक्षा व्यवस्था में सुधार, सरकारी कर्मचारियों की मांगें, स्वास्थ्य और सुरक्षा सेवाओं के लिए फंडिंग, बढ़ता कर्ज और महंगा ईंधन। अब देखना होगा कि सरकार इन मांगों के बीच किस तरह संतुलन बनाती है और छात्रों का आंदोलन आगे किस दिशा में जाता है।