H-1B वीजा पर भारी शुल्क का प्रस्ताव, भारतीय IT कंपनियों और छात्रों की बढ़ी चिंता; जानें क्या होगा असर
अमेरिका में ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन नीतियों को सख्त करने की कवायद के बीच H-1B वीजा को लेकर प्रस्तावित नए नियमों ने भारतीय IT कंपनियों और अमेरिका में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों की चिंता बढ़ा दी है। प्रस्ताव के तहत सालाना वीजा सीमा के अंतर्गत आने वाली नई H-1B याचिका पर अमेरिकी नियोक्ता से $103,265 (करीब 86 लाख रुपये) का शुल्क लेने का प्रस्ताव है।इसके अलावा विदेशी छात्रों के लिए उपलब्ध OPT (Optional Practical Training) कार्यक्रम पर भी $100,000 का शुल्क लगाने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, इन प्रस्तावों पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। 24 अगस्त को जारी प्रस्ताव पर 30 दिनों तक लोगों और संबंधित पक्षों से राय मांगी गई है।
नई H-1B याचिका पर 86 लाख रुपये तक का प्रस्तावित शुल्क
प्रस्तावित नियम का सबसे बड़ा असर नई H-1B याचिकाओं पर पड़ सकता है। यदि यह शुल्क लागू होता है, तो हर नई पात्र H-1B याचिका के लिए नियोक्ता को करीब 1 लाख डॉलर से ज्यादा अतिरिक्त राशि खर्च करनी पड़ सकती है।
इसका असर खास तौर पर उन कंपनियों पर पड़ सकता है जो भारत समेत दूसरे देशों से तकनीकी विशेषज्ञों को अमेरिका में काम करने के लिए बुलाती हैं।
H-1B और L-1 एक्सटेंशन पर भी अतिरिक्त बोझ
नई याचिकाओं के अलावा कुछ बड़ी कंपनियों के मौजूदा कर्मचारियों के वीजा एक्सटेंशन पर भी अतिरिक्त शुल्क का प्रावधान है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, जिन कंपनियों के 50% से अधिक कर्मचारी H-1B या L-1 वीजा पर हैं, उन्हें कुछ मामलों में H-1B एक्सटेंशन पर $4,000 और L-1 एक्सटेंशन पर $4,500 का सरचार्ज देना पड़ सकता है।
इससे अमेरिकी परियोजनाओं पर भारतीय कर्मचारियों को लंबे समय तक तैनात रखने की लागत बढ़ सकती है।
भारतीय IT कंपनियों पर बढ़ सकता है दबाव
भारत की कई बड़ी IT कंपनियां अमेरिकी बाजार में बड़ी संख्या में तकनीकी कर्मचारियों के साथ काम करती हैं। इनमें Tata Consultancy Services, Infosys, Wipro और HCLTech जैसी कंपनियां शामिल हैं।
वीजा की लागत बढ़ने पर कंपनियों के लिए भारत से कर्मचारियों को अमेरिका भेजना पहले की तुलना में महंगा हो सकता है। इसका संभावित असर बिजनेस मॉडल, कर्मचारियों की तैनाती और अमेरिकी प्रोजेक्ट्स की लागत पर पड़ सकता है।
कंपनियां बढ़ा सकती हैं लोकल हायरिंग
अगर विदेशी कर्मचारियों के लिए वीजा स्पॉन्सर करना बेहद महंगा हो जाता है, तो अमेरिकी कंपनियां स्थानीय कर्मचारियों की भर्ती को प्राथमिकता दे सकती हैं। इससे अमेरिकी नागरिकों और ग्रीन कार्ड धारकों के लिए नौकरियों के अवसर बढ़ सकते हैं, लेकिन विदेशी प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिकी नौकरी बाजार में प्रवेश कठिन हो सकता है।
इसके साथ ही कंपनियां कुछ काम अमेरिका के बजाय भारत जैसे देशों से रिमोट तरीके से कराने पर भी ज्यादा जोर दे सकती हैं।
भारतीय छात्रों के लिए क्यों बढ़ सकती है मुश्किल?
अमेरिका में पढ़ने वाले बड़ी संख्या में भारतीय छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद OPT के जरिए काम का अनुभव हासिल करते हैं और इसके बाद H-1B वीजा के जरिए अमेरिका में काम जारी रखने की कोशिश करते हैं।
यदि OPT पर प्रस्तावित $100,000 शुल्क लागू होता है या H-1B स्पॉन्सरशिप की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, तो कंपनियां नए विदेशी ग्रेजुएट्स को स्पॉन्सर करने से बच सकती हैं। इसका असर खास तौर पर उन छात्रों पर पड़ सकता है जो पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिकी नौकरी के जरिए अपने करियर को आगे बढ़ाने की योजना बना रहे हैं।
किन प्रोफेशनल्स को मिल सकती है प्राथमिकता?
ऊंची वीजा लागत की स्थिति में कंपनियां संभवतः ऐसे विदेशी कर्मचारियों को प्राथमिकता देंगी जिनके पास बेहद विशेष तकनीकी कौशल, लंबा अनुभव या किसी खास क्षेत्र में विशेषज्ञता है। सामान्य IT और एंट्री-लेवल भूमिकाओं के लिए H-1B स्पॉन्सरशिप पहले की तुलना में कठिन हो सकती है।
अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ
यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्रस्तावित शुल्क और नियम अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुए हैं। सरकार ने प्रस्ताव पर सार्वजनिक टिप्पणियां मांगी हैं और इसके बाद नियम में बदलाव भी संभव है।
अगर प्रस्ताव मौजूदा स्वरूप में लागू होता है, तो इसका असर अमेरिकी कंपनियों, भारतीय IT सेवा क्षेत्र और अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों पर काफी व्यापक हो सकता है। भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिकी नौकरी बाजार में प्रतिस्पर्धा और कंपनियों की स्पॉन्सरशिप नीति आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।