टॉर्च की रोशनी में इलाज कराने को मजबूर मरीज! बांग्लादेश में बिजली का हाहाकार, जानिए भारत के सामने क्या है मजबूरी
बांग्लादेश इस समय करीब 20 साल के सबसे गंभीर बिजली संकट से जूझ रहा है। देश के कई हिस्सों में रोजाना घंटों बिजली कटौती हो रही है। इसका असर सिर्फ आम लोगों की जिंदगी पर ही नहीं, बल्कि अस्पतालों और बड़े उद्योगों पर भी पड़ रहा है।
हालात कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा बारिशाल के एक अस्पताल से सामने आई घटना से लगाया जा सकता है। यहां बैकअप जनरेटर का डीजल खत्म होने के बाद नर्सों को मोबाइल फोन की टॉर्च की रोशनी में मरीजों की देखभाल करनी पड़ी।
बिजली की कमी के बीच बांग्लादेश को भारत से तत्काल बड़ी अतिरिक्त बिजली मिलने की संभावना भी सीमित नजर आ रही है। भारत पहले ही बांग्लादेश को 2,656 मेगावाट से ज्यादा बिजली दे रहा है। ऐसे में अतिरिक्त बिजली उपलब्ध कराने के लिए भारत को अपनी उत्पादन क्षमता और ट्रांसमिशन नेटवर्क की स्थिति भी देखनी होगी।
2022 के मुकाबले चार गुना तक बढ़ी कमी
बांग्लादेश में इस समय करीब 3,000 से 3,500 मेगावाट बिजली की कमी बताई जा रही है। यानी देश में बिजली की मांग और उत्पादन के बीच बड़ा अंतर पैदा हो गया है।
अगस्त में बांग्लादेश में रोजाना औसतन करीब 13,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन हुआ, जबकि मांग 16,000 मेगावाट से अधिक थी। इसका मतलब है कि हर दिन करीब 3,000 मेगावाट बिजली की कमी रही।
साल 2022 में भी बांग्लादेश को बिजली संकट का सामना करना पड़ा था। उस समय बिजली की कमी करीब 750 मेगावाट थी। मौजूदा कमी उस आंकड़े के मुकाबले करीब चार गुना तक पहुंच गई है।
बिजली बनाने की क्षमता है, लेकिन ईंधन नहीं
बांग्लादेश में बिजली उत्पादन के लिए पर्याप्त प्लांट मौजूद हैं, लेकिन उन्हें पूरी क्षमता से चलाने के लिए जरूरी ईंधन की कमी हो रही है। खासतौर पर प्राकृतिक गैस की सप्लाई में कमी ने बिजली उत्पादन को प्रभावित किया है।
2024-25 में बांग्लादेश की करीब 44 फीसदी बिजली गैस से पैदा हुई थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश का घरेलू गैस उत्पादन लगातार कम हुआ है।
2018-19 में घरेलू गैस उत्पादन करीब 27.2 अरब घन मीटर था, जो 2024-25 में घटकर लगभग 19.6 अरब घन मीटर रह गया।
घरेलू उत्पादन की कमी को पूरा करने के लिए बांग्लादेश ने LNG यानी Liquefied Natural Gas का आयात बढ़ाया। इस दौरान LNG आयात करीब 143 फीसदी बढ़कर 3.28 अरब से 7.98 अरब घन मीटर तक पहुंच गया।
LNG टर्मिनल में आग से और बिगड़े हालात
बांग्लादेश विदेशी गैस की सप्लाई के लिए कॉक्स बाजार के मोहेशखाली इलाके में बने LNG टर्मिनलों पर काफी निर्भर है।
21 जुलाई को दो LNG टर्मिनलों में से एक में आग लग गई, जिसके बाद उसे बंद करना पड़ा। इससे गैस की उपलब्धता पर अतिरिक्त दबाव पड़ा और बिजली उत्पादन भी प्रभावित हुआ।
अगस्त में देश को रोजाना करीब 2,235 मिलियन क्यूबिक फीट गैस मिल रही थी, जबकि जरूरत लगभग 3,860 मिलियन क्यूबिक फीट की थी।
हालांकि, 16 सितंबर को सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक गैस उत्पादन में सुधार के बाद सप्लाई में कुछ सुधार हुआ है और यह पहले के स्तर पर लौटने लगी है।
कोयला प्लांट भी पूरी क्षमता से नहीं चल रहे
बांग्लादेश की परेशानी सिर्फ गैस तक सीमित नहीं है। कोयले से चलने वाले कई बिजली संयंत्र भी तकनीकी खराबियों और दूसरी समस्याओं के कारण अपनी पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं।
देश में कोयला आधारित बिजली प्लांटों की कुल क्षमता करीब 7,000 मेगावाट है। लेकिन कई संयंत्रों से फिलहाल काफी कम बिजली मिल रही है।
चीन के सहयोग से पाटुआखाली में बनाए गए दो 1,320 मेगावाट क्षमता वाले प्लांटों में से प्रत्येक से करीब 500 से 800 मेगावाट तक ही बिजली उत्पादन हो रहा था।
वहीं भारत के सहयोग से बने 1,100 मेगावाट के रामपाल पावर प्लांट में बॉयलर खराब होने के कारण उत्पादन घटकर करीब 657 मेगावाट रह गया था।
गारमेंट इंडस्ट्री भी बिजली संकट की चपेट में
बिजली और गैस की कमी का बड़ा असर बांग्लादेश के गारमेंट सेक्टर पर पड़ा है। देश के कुल मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में इस सेक्टर की हिस्सेदारी 80 फीसदी से ज्यादा है।
BKMEA के सर्वे के मुताबिक, 55 फीसदी निटवेयर फैक्ट्रियों के ऑर्डर या तो रद्द हुए या कम हुए। वहीं 78 फीसदी फैक्ट्रियों में उत्पादन प्रभावित हुआ और 87 फीसदी कंपनियों को सामान भेजने में देरी का सामना करना पड़ा।
बिजली और गैस की कमी के कारण निटिंग का उत्पादन करीब 37 से 38 फीसदी, डाइंग का उत्पादन 51 फीसदी और गारमेंट सिलाई का उत्पादन करीब 40 फीसदी तक घट गया।
इसके अलावा करीब 600 टेक्सटाइल फैक्ट्रियों में गैस और बिजली की कमी के कारण उत्पादन रुकने की भी रिपोर्ट सामने आई है।
कई इलाकों में रोज 3 से 10 घंटे बिजली कटौती
बिजली संकट का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर भी दिखाई दे रहा है। मयमनसिंह, बारिशाल, रंगपुर, सिलहट, राजशाही और खुलना समेत कई इलाकों में रोजाना 3 से 10 घंटे तक बिजली कटौती की शिकायतें सामने आई हैं।
बारिशाल जनरल अस्पताल में भी बिजली बार-बार जाने की खबर सामने आई। जब बैकअप जनरेटर के लिए डीजल खत्म हो गया, तो नर्सों को मोबाइल फोन की टॉर्च की रोशनी में मरीजों की देखभाल करनी पड़ी।
बिजली संकट को लेकर सरकार और विपक्ष आमने-सामने
लगातार बिजली कटौती के खिलाफ बांग्लादेश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं। सितंबर में जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन ने ढाका से चटगांव तक लॉन्ग मार्च निकाला।
प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 5 सितंबर को बिजली संकट से प्रभावित लोगों से माफी मांगी थी। इसके बाद 9 सितंबर को उन्होंने कहा कि सरकार लंबे समय में आयातित ऊर्जा पर निर्भरता कम करने के लिए सोलर पावर को बढ़ावा देने की योजना पर काम कर रही है।
सरकार ने मौजूदा बिजली संकट के लिए पिछली अवामी लीग सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। वहीं विपक्ष ने मौजूदा सरकार पर संकट से निपटने में कुप्रबंधन और देरी के आरोप लगाए हैं।
आखिर क्यों गहराया बिजली संकट?
बांग्लादेश का मौजूदा बिजली संकट किसी एक वजह से पैदा नहीं हुआ है। इसके पीछे कई समस्याएं एक साथ जिम्मेदार बताई जा रही हैं।
घरेलू गैस उत्पादन में गिरावट, बिजली उत्पादन में गैस पर ज्यादा निर्भरता, महंगे ईंधन का आयात और कई पावर प्लांटों में तकनीकी खराबी ने स्थिति को और मुश्किल बना दिया है।
अगर घरेलू गैस उत्पादन बढ़ता है, बंद पड़े या कम क्षमता पर चल रहे पावर प्लांट दोबारा पूरी क्षमता से काम करने लगते हैं और ईंधन की सप्लाई बेहतर होती है, तो बिजली संकट में कुछ राहत मिल सकती है।
लेकिन लंबे समय में इस समस्या से निपटने के लिए बांग्लादेश को ऊर्जा के अलग-अलग स्रोतों को बढ़ावा देने, घरेलू उत्पादन मजबूत करने और आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम करना होगा।