'पेरिस जल्द बनेगा मुस्लिम शहर': ट्रम्प ने फ्रांस हिंसा के लिए मैक्रों की इमिग्रेशन नीति को ठहराया जिम्मेदार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फ्रांस की इमिग्रेशन नीति को लेकर राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पर निशाना साधा है। ट्रम्प ने दावा किया कि पेरिस जल्द ही मुस्लिम शहर बन जाएगा। उन्होंने फ्रांस में जारी हिंसा और अशांति के लिए दूसरे देशों से बड़ी संख्या में लोगों को आने देने की नीति को जिम्मेदार ठहराया।
ट्रम्प लंबे समय से इमिग्रेशन पर सख्ती करने की वकालत करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि करीब आठ साल पहले भी उन्होंने मैक्रों को चेतावनी दी थी कि दूसरे देशों से बड़ी संख्या में लोगों को फ्रांस में प्रवेश देना एक बड़ी गलती हो सकती है। उनके मुताबिक, इसके बावजूद फ्रांस सरकार ने इस दिशा में जरूरी कदम नहीं उठाए।
फ्रांस में कितनी है मुस्लिम आबादी?
फ्रांस में धर्म के आधार पर जनगणना के नियमित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए वहां की धार्मिक आबादी को लेकर अलग-अलग सर्वे के आंकड़ों में अंतर देखने को मिलता है।
प्यू रिसर्च सेंटर के आंकड़ों के अनुसार, फ्रांस की आबादी में लगभग 9% मुस्लिम हैं। वहीं, करीब 46% लोग ईसाई धर्म को मानते हैं और लगभग 43% लोग किसी धर्म से जुड़ा होना नहीं बताते। अन्य धर्मों को मानने वालों की आबादी करीब 1% बताई गई है।
फ्रांस के 2019-20 के एक सरकारी सर्वे में 18 से 59 वर्ष की उम्र के लोगों में लगभग 10% ने खुद को मुस्लिम और 29% ने कैथोलिक ईसाई बताया था। वहीं, 51% लोगों ने कहा था कि वे किसी धर्म को नहीं मानते।
क्या फ्रांस में हिंसा की वजह सिर्फ इमिग्रेशन है?
ट्रम्प ने फ्रांस में हिंसक घटनाओं को इमिग्रेशन नीति से जोड़ते हुए मैक्रों सरकार की आलोचना की है। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी देश में हिंसा और सामाजिक अशांति के पीछे कई कारण हो सकते हैं।
महंगाई, रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतें, आर्थिक मुश्किलें, सरकारी सेवाओं पर दबाव और युवाओं में बढ़ता असंतोष भी फ्रांस में तनाव की वजहों में शामिल बताए जा रहे हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, फ्रांस में दक्षिणपंथी नेता और कुछ राजनीतिक टिप्पणीकार इमिग्रेशन नियमों को और सख्त बनाने की मांग कर रहे हैं। हालांकि, मौजूदा हिंसा को केवल इमिग्रेशन से जोड़ना स्थिति की पूरी तस्वीर पेश नहीं करता।
फ्रांस के कई शहरों में प्रदर्शन के दौरान हिंसा
रिपोर्ट में बताया गया है कि 17 अक्टूबर को फ्रांस के कई शहरों में प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। इस दौरान दुकानों में लूटपाट, सरकारी इमारतों में आगजनी और ऐतिहासिक स्थलों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं।
खबर के मुताबिक, पुलिस ने 2,400 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया, जबकि हिंसा को नियंत्रित करने की कोशिशों के दौरान करीब 1,000 पुलिसकर्मियों और सैन्य जवानों के घायल होने का दावा किया गया है।
इन घटनाओं के बाद प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने सोमवार को सरकार की आपात बैठक बुलाई। रिपोर्ट में पेरिस, लिली और नीस समेत कई शहरों में कर्फ्यू लगाने के निर्देश दिए जाने की बात कही गई है। जरूरत पड़ने पर देश में आपातकाल लगाने की संभावना पर भी चर्चा हुई।
मैक्रों की चेतावनी: तोड़फोड़ करने वालों को भुगतना होगा अंजाम
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसक घटनाओं के बाद सख्त कार्रवाई का संकेत दिया। उन्होंने कहा कि तोड़फोड़ और लूटपाट में शामिल लोगों को अपने कृत्यों की कीमत चुकानी होगी।
मैक्रों ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों की कुछ मांगें जायज हो सकती हैं, लेकिन उनकी मांगों को हिंसा करने वालों की गतिविधियों के साथ नहीं मिलाया जाना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि फ्रांस के नागरिक अपने ही देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने में कैसे शामिल हो सकते हैं।
इसी बीच, फ्रांस के लिमोज शहर में 143 साल पुराने टाउन हॉल में आग लगाए जाने की खबर भी सामने आई। इस घटना से ऐतिहासिक इमारत को भारी नुकसान पहुंचने की बात कही गई है।
मैक्रों की लोकप्रियता में गिरावट, राजनीतिक संकट गहराया
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इस समय राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं। महंगाई, कमजोर आर्थिक स्थिति, बढ़ता सरकारी कर्ज और शिक्षा समेत सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी समस्याओं को लेकर सरकार के प्रति असंतोष बढ़ने की खबरें हैं।
रिपोर्ट में दिए गए एक सर्वे के मुताबिक, केवल 15% लोगों ने मैक्रों के प्रति सकारात्मक राय जताई, जबकि 82% लोगों ने उनके कामकाज पर नाराजगी जाहिर की। इन आंकड़ों के बीच उनके राजनीतिक विरोधी उन्हें कमजोर राष्ट्रपति बता रहे हैं।
फिलहाल फ्रांस में हिंसा, इमिग्रेशन नीति और सरकार की लोकप्रियता को लेकर बहस तेज है। ट्रम्प के बयान ने इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और चर्चा में ला दिया है। हालांकि, फ्रांस की मौजूदा स्थिति के पीछे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारणों की भूमिका को भी ध्यान में रखना जरूरी है।