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नेतन्याहू का सबसे बड़ा इम्तिहान! इजरायल में सत्ता का नया संग्राम; जानिए पीएम कुर्सी की जंग का भारत और मिडिल ईस्ट पर क्या होगा असर

 

इजरायल में 27 अक्टूबर को होने वाले संसदीय चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। यह चुनाव सिर्फ सत्ता में बने रहने या नई सरकार चुनने का मामला नहीं है, बल्कि सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था, सरकार की जवाबदेही और पश्चिम एशिया में देश की भावी रणनीति की भी परीक्षा है। चुनाव के नतीजों का असर इजरायल की घरेलू राजनीति से आगे बढ़कर क्षेत्रीय कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी पड़ सकता है।

भारत की नजरें भी इस चुनाव पर रहेंगी। इजरायल के साथ भारत के रक्षा सहयोग, ड्रोन और निगरानी तकनीक, साइबर सुरक्षा, व्यापार और पश्चिम एशिया में आर्थिक संपर्क जैसे कई महत्वपूर्ण हित जुड़े हैं। ऐसे में सवाल यह है कि यदि नेतन्याहू सत्ता में लौटते हैं तो भारत-इजरायल संबंधों की दिशा क्या होगी? और अगर विपक्ष सरकार बनाने में सफल रहता है, तो क्या दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी पर कोई असर पड़ेगा?

नेतन्याहू के सामने जवाबदेही और नेतृत्व की चुनौती

बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से इजरायल की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल रहे हैं। राजनीतिक संकटों के बीच वापसी करना उनकी प्रमुख ताकत रही है। लेकिन इस बार उनके सामने केवल चुनाव जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि सरकार के पिछले फैसलों और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों का जवाब देने का दबाव भी है।

सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले ने इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद गंभीर खामियों को उजागर किया था। इसके बाद गाजा में लंबे समय तक चले सैन्य अभियान, बंधकों की वापसी और हमले से पहले सुरक्षा एजेंसियों की तैयारियों को लेकर सरकार की आलोचना होती रही है।

इसी पृष्ठभूमि में सुरक्षा विफलताओं की जांच और उच्चस्तरीय जांच आयोग के गठन की मांग महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है। इसके अलावा अति-रूढ़िवादी हरेदी समुदाय के पुरुषों की सैन्य भर्ती का सवाल भी नेतन्याहू की सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती पैदा कर सकता है। इस मुद्दे पर मतभेद उनके गठबंधन में शामिल दलों के बीच तनाव बढ़ा सकते हैं।

नेतन्याहू की व्यक्तिगत कानूनी स्थिति भी चुनावी चर्चा का हिस्सा है। उनके खिलाफ रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात से जुड़े आरोपों का मुकदमा चल रहा है। ऐसे में सत्ता में उनकी वापसी या संभावित विदाई का असर उनके राजनीतिक भविष्य पर पड़ सकता है। हालांकि, चुनाव परिणाम से कानूनी कार्यवाही अपने आप समाप्त नहीं हो जाती।

चुनावी सर्वेक्षणों में विपक्ष को बढ़त, लेकिन बहुमत सबसे बड़ी चुनौती

इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इजरायल की आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कारण किसी एक पार्टी के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना कठिन हो सकता है। ऐसे में छोटी पार्टियां और गठबंधन सहयोगी सरकार गठन में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

चुनावी चर्चा में गादी आइजेनकोट, नफ्ताली बेनेट और अन्य विपक्षी नेताओं के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं। कुछ चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के मुकाबले विपक्षी नेताओं को बढ़त मिलने की बात कही गई है। हालांकि, सर्वेक्षणों को चुनाव परिणाम नहीं माना जा सकता।

विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल नेतन्याहू को सत्ता से हटाना नहीं, बल्कि उनके स्थान पर ऐसी सरकार बनाना है जो संसद में बहुमत जुटा सके और लंबे समय तक स्थिर बनी रहे।

विपक्षी दलों के बीच सुरक्षा नीति, अरब दलों के समर्थन और सरकार गठन की रणनीति को लेकर मतभेद भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यदि कोई भी खेमा 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो गठबंधन वार्ता लंबी खिंच सकती है और राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ सकती है।

भारत के लिए क्यों अहम है इजरायल का चुनाव?

भारत और इजरायल के संबंध पिछले कई वर्षों में रक्षा और तकनीकी सहयोग से आगे बढ़कर व्यापक रणनीतिक साझेदारी का रूप ले चुके हैं। दोनों देश रक्षा उपकरणों, ड्रोन तकनीक, साइबर सुरक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और उभरती तकनीकों जैसे क्षेत्रों में सहयोग करते हैं।

भारत के लिए इजरायल विशेष रूप से रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदार है। आधुनिक निगरानी प्रणालियां, मानवरहित विमान, मिसाइल तकनीक और अन्य रक्षा उपकरण दोनों देशों के सहयोग के प्रमुख क्षेत्र हैं। ऐसे में इजरायल की अगली सरकार की नीतियां इन परियोजनाओं की गति और प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकती हैं।

इसके साथ ही व्यापार, निवेश और तकनीकी अनुसंधान में सहयोग बढ़ाना भी भारत के हित में है। दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को विस्तार देने और मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की संभावनाएं भी महत्वपूर्ण हैं।

हालांकि, यह मान लेना सही नहीं होगा कि नेतन्याहू के चुनाव हारने से भारत-इजरायल संबंध कमजोर हो जाएंगे। दोनों देशों के बीच सहयोग कई संस्थागत व्यवस्थाओं, रक्षा जरूरतों और साझा रणनीतिक हितों पर आधारित है। इसलिए किसी भी नई सरकार के आने पर भी इन संबंधों में निरंतरता रहने की संभावना बनी रहेगी।

नेतन्याहू लौटे तो भारत को क्या फायदा हो सकता है?

यदि नेतन्याहू सत्ता में वापसी करते हैं, तो मौजूदा राजनीतिक संपर्क और रणनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में निरंतरता देखने को मिल सकती है। रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और दोनों देशों के बीच पहले से चल रही परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर रह सकता है।

लेकिन नेतन्याहू की सरकार की क्षेत्रीय नीतियां भी भारत के लिए महत्वपूर्ण होंगी। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने या अरब देशों के साथ इजरायल के संबंधों में मुश्किलें आने से भारत की कूटनीतिक स्थिति जटिल हो सकती है।

भारत के इजरायल के साथ मजबूत संबंध हैं, वहीं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य अरब देशों के साथ भी उसके महत्वपूर्ण आर्थिक, ऊर्जा और रणनीतिक हित जुड़े हैं। इसलिए भारत के लिए सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा।

विपक्ष की सरकार बनी तो क्या बदलेगा?

यदि गादी आइजेनकोट, नफ्ताली बेनेट या विपक्ष के किसी अन्य नेता के नेतृत्व में सरकार बनती है, तो इजरायल की राजनीतिक शैली और कुछ नीतिगत प्राथमिकताओं में बदलाव संभव है। नई सरकार घरेलू सुरक्षा, सैन्य भर्ती और सात अक्टूबर के हमले से जुड़ी जवाबदेही के मुद्दों पर अलग दृष्टिकोण अपना सकती है।

इसके बावजूद, भारत के साथ रक्षा सहयोग में बड़े बदलाव की संभावना का आकलन केवल नेतृत्व परिवर्तन के आधार पर नहीं किया जा सकता। इजरायल की सुरक्षा जरूरतें और भारत की रक्षा संबंधी आवश्यकताएं दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करती रहेंगी।

भारत के लिए असली महत्व इस बात का होगा कि नई सरकार पहले से चल रही परियोजनाओं को कितनी तेजी से आगे बढ़ाती है, व्यापारिक समझौतों पर क्या रुख अपनाती है और पश्चिम एशिया के क्षेत्रीय संकटों से निपटने के लिए कैसी नीति अपनाती है।

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर असर

इजरायल के चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू पश्चिम एशिया की व्यापक सुरक्षा स्थिति भी है। ईरान के साथ तनाव, क्षेत्रीय संघर्ष और समुद्री मार्गों की सुरक्षा का असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने से तेल की कीमतों, समुद्री परिवहन लागत और आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव आ सकता है। इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के खर्च पर भी पड़ सकता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा भारत के लिए विशेष मायने रखती है। इस क्षेत्र में किसी भी बड़े व्यवधान से ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकता है।

यही वजह है कि भारत की नजर केवल इजरायल में बनने वाली सरकार पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी रहेगी कि नई सरकार क्षेत्रीय तनाव को कम करने और कूटनीतिक समाधान की दिशा में क्या भूमिका निभाती है।

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे पर भी नजर

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा यानी IMEC भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संपर्क और आर्थिक परियोजना है। इसका उद्देश्य भारत को पश्चिम एशिया के रास्ते यूरोप से बेहतर परिवहन और व्यापार नेटवर्क के जरिए जोड़ना है।

इस परियोजना की प्रगति क्षेत्रीय स्थिरता, देशों के बीच सहयोग और बुनियादी ढांचे के विकास पर निर्भर करती है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तो संपर्क परियोजनाओं, निवेश और व्यापारिक योजनाओं में देरी हो सकती है।

इसलिए भारत के लिए इजरायल में राजनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय शांति दोनों महत्वपूर्ण हैं। नई सरकार की नीतियां इस व्यापक आर्थिक वातावरण को प्रभावित कर सकती हैं, हालांकि IMEC की प्रगति कई देशों और संस्थाओं के सहयोग पर निर्भर करती है।

भारत के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती

भारत की विदेश नीति के लिए इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी अरब देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना भी है। भारत के पश्चिम एशिया में बड़े व्यापारिक हित हैं और लाखों भारतीय नागरिक इस क्षेत्र में काम करते हैं।इसके अलावा, फिलिस्तीन के मुद्दे पर भारत का घोषित रुख और क्षेत्रीय शांति की जरूरत भी उसकी कूटनीति का हिस्सा हैं। ऐसे में इजरायल की अगली सरकार के साथ काम करते हुए भारत को अपने सभी रणनीतिक और आर्थिक हितों में संतुलन बनाकर चलना होगा।

चुनाव के बाद असली परीक्षा शुरू होगी

इजरायल का चुनाव नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के साथ-साथ देश की सुरक्षा नीति, घरेलू राजनीति और पश्चिम एशिया में उसकी भूमिका के लिए भी अहम साबित हो सकता है। लेकिन चुनावी नतीजे आने के बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण सरकार गठन का होगा।यदि कोई गठबंधन स्पष्ट बहुमत जुटा लेता है, तो सरकार की नीतिगत दिशा अपेक्षाकृत जल्दी स्पष्ट हो सकती है। लेकिन यदि संसद में बहुमत को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, तो राजनीतिक बातचीत लंबी खिंच सकती है।

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि नेतन्याहू सत्ता में रहते हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि इजरायल की अगली सरकार कितनी स्थिर होगी, वह भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को किस तरह आगे बढ़ाएगी और पश्चिम एशिया में शांति तथा स्थिरता के लिए क्या कदम उठाएगी। इन्हीं कारकों से आने वाले समय में भारत-इजरायल संबंधों और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग की दिशा तय होगी।