हूतियों के खिलाफ जंग में इजराइल की एंट्री चाहता है नेतन्याहू? सऊदी अरब के सामने रखा प्रस्ताव, क्राउन प्रिंस ने जताई चिंता
हालांकि, सऊदी अरब के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा। फिलिस्तीन के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच गहरे मतभेद हैं और इजराइल के साथ खुले सैन्य सहयोग को लेकर अरब जगत में विरोध की आशंका भी बनी हुई है।
2. ईरान के प्रभाव को कमजोर करना
हूतियों और ईरान के बीच लंबे समय से संबंध रहे हैं। सऊदी अरब, अमेरिका और उनके सहयोगी ईरान पर हूतियों को हथियारों और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने के आरोप लगाते रहे हैं। ईरान इन आरोपों के अलग-अलग पहलुओं पर अपना पक्ष रखता रहा है।हूती विद्रोही ड्रोन और मिसाइलों के जरिए हमले करने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाया है और इजराइल पर भी हमले किए हैं।इजराइल के लिए हूतियों की सैन्य क्षमता को कमजोर करना इसलिए अहम हो सकता है, क्योंकि इससे ईरान से जुड़े क्षेत्रीय समूहों के दबाव को कम करने की कोशिश की जा सकती है। दूसरी ओर, हूतियों के खिलाफ किसी नए सैन्य अभियान से संघर्ष और व्यापक होने का खतरा भी बना रहेगा।
3. सऊदी अरब के साथ सैन्य तालमेल बढ़ाना
सऊदी अरब मध्य पूर्व की प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियों में शामिल है। इजराइल के लिए उसके साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।यदि दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर पर किसी तरह का तालमेल बनता है, तो खुफिया जानकारी साझा करने, मिसाइल और ड्रोन से पैदा होने वाले खतरों का मुकाबला करने तथा समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहयोग की संभावनाएं बन सकती हैं।लेकिन इस तरह का सहयोग राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी होगा। सऊदी अरब को घरेलू जनमत, फिलिस्तीन के मुद्दे और दूसरे अरब देशों की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखना पड़ेगा।
इजराइल से रिश्ते सामान्य करने पर सऊदी अरब का क्या रुख है?
अमेरिका लंबे समय से सऊदी अरब और इजराइल के बीच संबंध सामान्य कराने की कोशिश करता रहा है। वर्ष 2020 में अब्राहम समझौते के तहत संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन सहित कुछ अरब देशों ने इजराइल के साथ संबंध सामान्य किए थे।हालांकि, सऊदी अरब ने फिलिस्तीन के मुद्दे को अपने रुख का अहम हिस्सा बनाए रखा है। सऊदी नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना और उससे जुड़े मुद्दों का समाधान इजराइल के साथ सामान्य संबंधों की दिशा में महत्वपूर्ण है।इसी वजह से हूतियों के खिलाफ इजराइल की संभावित भागीदारी का मामला सिर्फ सैन्य रणनीति तक सीमित नहीं है। इसका संबंध सऊदी अरब की विदेश नीति, फिलिस्तीन के मुद्दे और क्षेत्रीय राजनीति से भी है।
2015 से यमन में जारी है संघर्ष
यमन में मौजूदा संघर्ष की जड़ें कई साल पुरानी हैं।
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2014: हूती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। इससे देश की राजनीतिक स्थिति और अस्थिर हो गई।
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2015: सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के समर्थन में हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया।
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इसके बाद: कई वर्षों तक हवाई हमले और जमीनी संघर्ष जारी रहे, लेकिन हूतियों को पूरी तरह पराजित नहीं किया जा सका।
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लाल सागर में तनाव: हूतियों के जहाजों पर हमलों ने यमन के संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा से जोड़ दिया।
हूती अब भी यमन के बड़े हिस्से में प्रभाव रखते हैं। उनके हमलों और उनके खिलाफ होने वाली सैन्य कार्रवाइयों का असर यमन से बाहर भी महसूस किया जाता है।
क्या मध्य पूर्व में नया सैन्य गठबंधन बन सकता है?
अगर इजराइल और सऊदी अरब के बीच हूतियों के खिलाफ सहयोग को लेकर बातचीत आगे बढ़ती है, तो यह मध्य पूर्व की रणनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव हो सकता है। इससे ईरान और उसके सहयोगियों पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन साथ ही संघर्ष के दूसरे देशों तक फैलने का खतरा भी पैदा हो सकता है।फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सऊदी अरब इजराइल की संभावित सैन्य भागीदारी स्वीकार करेगा या राजनीतिक और कूटनीतिक कारणों से इससे दूरी बनाए रखेगा। इस मामले में किसी अंतिम फैसले की पुष्टि के बिना इसे संभावित रणनीतिक पहल और मीडिया रिपोर्ट के रूप में ही देखा जाना चाहिए।