ब्राजील में लूला की सत्ता में वापसी, संसद में दक्षिणपंथियों की चुनौती; अर्थव्यवस्था संभालना होगा मुश्किल
ब्राजील की राजनीति में लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा का सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाने से लेकर दोबारा राष्ट्रपति बनने तक उन्होंने लंबा राजनीतिक संघर्ष किया है। चुनाव के पहले दौर में पिछड़ने के बावजूद दूसरे दौर में जीत हासिल करना उनकी राजनीतिक ताकत को दर्शाता है। हालांकि, सत्ता में वापसी के बाद उनके सामने आर्थिक चुनौतियों और संसद में विपक्ष के मजबूत प्रभाव से निपटने की मुश्किल होगी।
लूला इससे पहले 2003 से 2010 तक ब्राजील के राष्ट्रपति रह चुके हैं। इसके बाद 2022 में उन्होंने जायर बोल्सोनारो को हराकर एक बार फिर सत्ता हासिल की। भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाने के बाद उनकी सजा रद्द हुई, जिससे उनके राजनीतिक जीवन में वापसी का रास्ता खुला।
पहले दौर में पिछड़ने के बाद कैसे पलटी बाजी?
राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में लूला अपने प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो से पीछे बताए गए थे। दूसरे दौर में उन्हें उन मतदाताओं का समर्थन हासिल करने की चुनौती थी, जिन्होंने पहले चरण में अन्य उम्मीदवारों को वोट दिया था।
चुनाव से पहले हुए सर्वेक्षणों में महिलाओं और कैथोलिक मतदाताओं के बीच लूला को बढ़त दिखाई गई थी। महिलाओं में 49% ने लूला का समर्थन किया, जबकि फ्लावियो के पक्ष में 40% महिलाएं थीं। इसी तरह कैथोलिक मतदाताओं में लूला को 52% और फ्लावियो को 42% समर्थन मिलने की बात सामने आई थी।
लूला ने अपने चुनाव प्रचार में ब्राजील की स्वतंत्र विदेश नीति पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश को अपने फैसले खुद लेने चाहिए और बाहरी दबाव से स्वतंत्र रहना चाहिए। उनके अभियान में गरीबों, मजदूरों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के मुद्दे भी प्रमुख रहे।
बोल्सोनारो परिवार से राजनीतिक मुकाबला
फ्लावियो बोल्सोनारो पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं। बोल्सोनारो परिवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का करीबी माना जाता है। ब्राजील की राजनीति में दक्षिणपंथी विचारधारा का प्रभाव भी इस चुनाव का अहम पहलू रहा।
लूला की जीत के बावजूद संसद में दक्षिणपंथी दलों की मजबूत स्थिति उनके लिए चुनौती बन सकती है। सरकारी खर्च, सामाजिक कल्याण योजनाओं और आर्थिक सुधारों जैसे मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आ सकते हैं।
गरीब परिवारों और मजदूरों को राहत देने का वादा
चुनाव प्रचार के दौरान लूला ने आम लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारने और गरीब परिवारों को राहत देने पर जोर दिया। उनके प्रमुख वादों में शामिल हैं:
- सरकारी सहायता में बढ़ोतरी: गरीब परिवारों को आर्थिक मदद देने वाली योजनाओं के तहत मिलने वाली राशि में 15% तक वृद्धि करने का प्रस्ताव।
- वीकेंड पर मुफ्त सार्वजनिक परिवहन: शनिवार और रविवार को बस और मेट्रो जैसी सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में मुफ्त सफर की सुविधा देने का वादा। इसे लागू करने के लिए जरूरी मंजूरियां हासिल करनी होंगी।
- रोजगार के अवसर बढ़ाना: बेरोजगारी कम करने, मजदूरों की स्थिति बेहतर बनाने और गरीब परिवारों की आय बढ़ाने पर जोर।
इन योजनाओं को लागू करने के लिए पर्याप्त सरकारी संसाधनों और राजनीतिक समर्थन की जरूरत होगी। संसद में विपक्ष की स्थिति मजबूत होने से इन प्रस्तावों पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा।
बढ़ता सरकारी कर्ज और महंगाई बड़ी चुनौती
लूला के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में ब्राजील की अर्थव्यवस्था को संभालना शामिल है। ऊंची ब्याज दरें, बढ़ता सरकारी कर्ज और आम लोगों पर कर्ज का बोझ आर्थिक नीतियों के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं।
सरकारी अनुमानों के मुताबिक, ब्राजील की आर्थिक विकास दर अगले साल 2.3% रह सकती है। वहीं, सरकारी कर्ज देश की जीडीपी के 82% से अधिक होने का अनुमान जताया गया है। ऐसे में सरकार को सामाजिक योजनाओं पर खर्च बढ़ाने और वित्तीय संतुलन बनाए रखने के बीच तालमेल बैठाना होगा।
गोल्डमैन सैक्स के आकलन के मुताबिक, लूला सरकार के लिए सरकारी खर्च को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। चुनाव प्रचार के दौरान लूला ने लोगों को कर्ज से राहत देने के उपायों की भी बात की थी। ऑनलाइन सट्टेबाजी पर अस्थायी रोक लगाने जैसे कदम भी इस चर्चा का हिस्सा रहे।
संसद में विपक्ष से टकराव की आशंका
ब्राजील की संसद में दक्षिणपंथी दलों का प्रभाव लूला की सरकार के कामकाज को प्रभावित कर सकता है। विपक्ष कारोबारियों के हित में आर्थिक सुधारों की मांग कर सकता है, जबकि लूला गरीबों और मजदूरों के लिए सरकारी सहायता जारी रखने पर जोर दे सकते हैं।
ऐसे में बजट, सामाजिक कल्याण योजनाओं और आर्थिक नीतियों को लेकर दोनों पक्षों के बीच टकराव की आशंका है। लूला को अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए अन्य राजनीतिक दलों का समर्थन जुटाना होगा।
कुल मिलाकर, लूला की राजनीतिक वापसी उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है, लेकिन असली परीक्षा सरकार चलाने और अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में होगी। गरीबों को राहत देने, रोजगार बढ़ाने और सरकारी कर्ज पर नियंत्रण रखने के बीच संतुलन बनाना उनके कार्यकाल की दिशा तय कर सकता है।