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Israel News: भारत के पूर्वोत्तर से इजरायल जाएंगे 6,000 यहूदी, 29 मिलियन डॉलर खर्च करेगी नेतन्याहू सरकार, जानिए कौन हैं बनेई मेनाशे

 

भारत और इजरायल के बीच दोस्ती अब एक नए मुकाम पर पहुंचती दिखाई दे रही है। इजरायल सरकार ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में रहने वाले करीब 6,000 बनेई मेनाशे यहूदियों को अपने देश में बसाने की बड़ी योजना बनाई है। इसके लिए लगभग 29 मिलियन डॉलर यानी करीब 250 करोड़ रुपये का कार्यक्रम तैयार किया गया है। इस योजना के तहत मिजोरम और मणिपुर में रहने वाले इन लोगों को इजरायल ले जाकर वहां बसाने, प्रशिक्षण देने और नई जिंदगी शुरू करने में मदद की जाएगी।

इस पहल से भारत और इजरायल के बीच लोगों का जुड़ाव और मजबूत होने की उम्मीद है। खास बात यह है कि बनेई मेनाशे समुदाय के लोग खुद को प्राचीन इजरायल के उन दस खोए हुए कबीलों का वंशज मानते हैं, जिनका जिक्र बाइबिल में मिलता है। आइए जानते हैं कौन हैं ये लोग और आखिर क्यों इजरायल सरकार इन्हें अपने देश में बसाना चाहती है।

पीएम मोदी ने भी इजरायल में भारतीय यहूदी समुदाय से की थी मुलाकात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 फरवरी 2026 को अपनी इजरायल यात्रा के दौरान वहां रहने वाले करीब 85 हजार भारतीय मूल के यहूदी समुदाय के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। इस दौरान दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों को लेकर भी चर्चा हुई।

मुंबई स्थित थिंक टैंक 'गेटवे हाउस' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के मिजोरम और मणिपुर में रहने वाले बनेई मेनाशे समुदाय के करीब 6,000 लोग आने वाले वर्षों में इजरायल जा सकते हैं। इस प्रक्रिया को यहूदी परंपरा में 'अलियाह' कहा जाता है, जिसका अर्थ इजरायल की ओर जाना या वहां बसना है।

कौन हैं भारत में रहने वाले बनेई मेनाशे यहूदी?

बनेई मेनाशे समुदाय मुख्य रूप से मिजोरम और मणिपुर में रहने वाली कुकी-मिजो जनजातियों से जुड़ा है। इनकी ऐतिहासिक मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं का संबंध प्राचीन यहूदी समुदाय से बताया जाता है।

1930 और 1940 के दशक में इस समुदाय के कई लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया था, लेकिन इसके बावजूद उनकी पुरानी मान्यताओं और कुछ रीति-रिवाजों का प्रभाव बना रहा। समुदाय के लोगों का मानना है कि उनके पूर्वज 'मनमासी' या 'मनासिया' नामक व्यक्ति से जुड़े थे, जिनका संबंध यहूदी परंपरा में वर्णित मेनाशे से माना जाता है।

बाइबिल के अनुसार, मेनाशे पैगंबर याकूब के पोते और जोसेफ के पुत्र थे। इसी आधार पर बनेई मेनाशे खुद को इजरायल के दस खोए हुए कबीलों में से एक का वंशज मानते हैं। हिब्रू बाइबिल का अध्ययन करने के बाद समुदाय के कई लोगों में अपनी कथित यहूदी जड़ों की ओर लौटने की इच्छा और मजबूत हुई।

10 खोए हुए यहूदी कबीलों से क्या है संबंध?

बनेई मेनाशे समुदाय लंबे समय से इजरायल के धार्मिक संगठनों से अपने यहूदी वंश की मान्यता पाने की कोशिश कर रहा है। माना जाता है कि 722 ईसा पूर्व में असीरियाई साम्राज्य के हमले के बाद प्राचीन इजरायल के उत्तरी राज्य के दस कबीलों को निर्वासित कर दिया गया था। इसके बाद वे अलग-अलग क्षेत्रों में फैल गए।

हालांकि, यहूदी धार्मिक कानूनों के मुताबिक, लंबे समय तक यहूदी धार्मिक परंपराओं का पालन नहीं करने के कारण बनेई मेनाशे को सीधे यहूदी मान्यता नहीं मिली थी।

1970 के दशक के आखिरी वर्षों से इस समुदाय ने अपनी पहचान को मान्यता दिलाने के लिए प्रयास शुरू किए। इसके बाद 1990 के दशक में कुछ धार्मिक नेताओं की मदद से समुदाय के लोगों का इजरायल जाना शुरू हुआ। साल 2006 में इजरायल के मुख्य रब्बीनेट ने बनेई मेनाशे समुदाय को इजरायल के खोए हुए कबीलों से जुड़ा माना और उनके इजरायल आने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता खुला।

क्या है 29 मिलियन डॉलर का 'ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन'?

बनेई मेनाशे समुदाय को इजरायल में बसाने के लिए नवंबर 2025 में इजरायली कैबिनेट ने एक विशेष योजना को मंजूरी दी थी। इसे 'ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन' नाम दिया गया है।

इस कार्यक्रम के लिए करीब 29 मिलियन डॉलर का बजट निर्धारित किया गया है। इसके तहत भारत में रह रहे बनेई मेनाशे समुदाय के इच्छुक लोगों को इजरायल लाने, धार्मिक प्रशिक्षण देने और वहां बसने में मदद की जाएगी।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 2030 तक इस प्रक्रिया को पूरा करने का लक्ष्य रखा है। इसमें इजरायल का मंत्रालय ऑफ अलियाह एंड इंटीग्रेशन और ज्यूइश एजेंसी फॉर इजरायल भी अहम भूमिका निभाएंगे।

कब तक इजरायल पहुंचेंगे भारत के ये यहूदी?

रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना के तहत अप्रैल और मई 2026 में करीब 600 बनेई मेनाशे सदस्य इजरायल जा चुके हैं। मिजोरम में रह रहे लगभग 600 अन्य लोगों के भी 2026 के अंत तक इजरायल जाने की योजना है।

वहीं, मणिपुर में करीब 4,800 बनेई मेनाशे लोग रह रहे हैं। इनमें से कई लोग संघर्ष और विस्थापन की परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। इन लोगों को 2027 से 2030 के बीच इजरायल ले जाने की योजना बनाई गई है।

मिजोरम के आइजोल और कोलासिब जैसे इलाकों में रहने वाले समुदाय के कई लोग इजरायल जाने की तैयारी कर रहे हैं। कुछ लोग हिब्रू भाषा सीख रहे हैं, जबकि अन्य अपनी संपत्ति और जरूरी दस्तावेजों से जुड़े काम निपटा रहे हैं।

इजरायल पहुंचने के बाद भी पूरी करनी होगी धार्मिक प्रक्रिया

बनेई मेनाशे समुदाय के लोगों को इजरायल पहुंचने के बाद भी एक जरूरी धार्मिक प्रक्रिया से गुजरना होगा। उन्हें यहूदी धर्म की ऑर्थोडॉक्स परंपरा के अनुसार औपचारिक धर्मांतरण करना होगा। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रक्रिया में करीब छह महीने का समय लग सकता है।

इसे पूरा करने के बाद वे इजरायल की नागरिकता पाने के पात्र हो सकते हैं। इस समुदाय के कई लोग पहले से इजरायल में रह रहे अपने रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों से दोबारा मिलने की उम्मीद कर रहे हैं।

रब्बी अविचैल ने दिखाई थी इजरायल जाने की राह

बनेई मेनाशे समुदाय को यहूदी धर्म और उसकी परंपराओं से जोड़ने में रब्बी अविचैल की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। उन्होंने समुदाय के लोगों को तोराह की धार्मिक पुस्तकें, प्रार्थना की किताबें और यहूदी धार्मिक परंपराओं में इस्तेमाल होने वाली शॉल यानी तल्लित भेंट की थीं।

उन्होंने एक हिब्रू स्कूल की स्थापना में भी मदद की और समुदाय को बनेई मेनाशे नाम दिया। इसके अलावा समुदाय के सदस्य गिदोन रेई को इजरायल भेजकर धार्मिक शिक्षा दिलाने की व्यवस्था की। दो साल तक येशिवा में पढ़ाई करने के बाद रेई भारत लौटे और अपने समुदाय के धार्मिक जीवन को आगे बढ़ाने में जुट गए।

मुंबई के ORT स्कूल ने भी निभाई अहम भूमिका

भारत से इजरायल जाने वाले यहूदी समुदाय के लोगों को प्रशिक्षण देने में मुंबई के ऑर्गेनाइजेशन फॉर एजुकेशनल रिसोर्सेज एंड टेक्नोलॉजिकल ट्रेनिंग (ORT) स्कूल का भी योगदान रहा है।

यह संस्थान इजरायल जाने वाले लोगों को कौशल आधारित प्रशिक्षण देने और वहां की संस्कृति से परिचित कराने का काम करता था। रिपोर्ट के मुताबिक, 1983 में बनेई मेनाशे समुदाय के शुरुआती प्रवासियों को इजरायल जाने के लिए तैयार करने में भी इसकी भूमिका रही थी। रब्बी ने अपने एनजीओ अमिचाव के माध्यम से ORT के करीब 50 छात्रों को इजरायल जाने के लिए प्रायोजित किया था।

अब इजरायल सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली है। इससे उन लोगों को नई उम्मीद मिली है, जो वर्षों से इजरायल जाने का इंतजार कर रहे थे।

2030 तक बदल जाएगी पूर्वोत्तर की तस्वीर

अगर इजरायल सरकार की यह योजना तय समय के अनुसार पूरी होती है, तो 2030 तक भारत के पूर्वोत्तर में रहने वाले बनेई मेनाशे समुदाय के ज्यादातर इच्छुक सदस्य इजरायल पहुंच जाएंगे। इससे भारत में इस समुदाय की आबादी बेहद कम हो सकती है।

यह पहल सिर्फ लोगों के एक देश से दूसरे देश में बसने की कहानी नहीं है, बल्कि उन परिवारों की भी कहानी है जो अपनी ऐतिहासिक पहचान, धार्मिक परंपराओं और जड़ों से जुड़ने की उम्मीद में दशकों से इंतजार कर रहे हैं। साथ ही इससे भारत और इजरायल के बीच सांस्कृतिक रिश्तों को भी एक नया आयाम मिल सकता है।