भारतीय नौसेना को मिला आसमान का ‘शिकारी’, 11 हजार KM की रेंज और 40 घंटे तक निगरानी; ₹1,943 करोड़ का करार
भारतीय नौसेना अपनी समुद्री निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने की क्षमताओं को काफी बढ़ाने जा रही है। 17 अगस्त को, रक्षा मंत्रालय ने नई दिल्ली के कर्तव्य भवन-2 में अमेरिका की कंपनी 'जनरल एटॉमिक्स एयरोनॉटिकल सिस्टम्स इंक.' के साथ एक अहम लीज़ एग्रीमेंट (पट्टे का समझौता) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत, भारतीय नौसेना 30 महीनों के लिए दो 'MQ-9B सी गार्डियन' हाई-एल्टीट्यूड लॉन्ग-एंड्योरेंस (HALE) रिमोटली पाइलटेड एयरक्राफ्ट (बिना पायलट वाले विमान) लीज़ पर लेगी। लगभग ₹1,943 करोड़ मूल्य के इस समझौते पर अतिरिक्त सचिव और महानिदेशक (अधिग्रहण) ए. अंबारासु की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए गए।
MQ-9B सी गार्डियन: रेंज, स्पीड और पेलोड क्षमता
MQ-9B सी गार्डियन दुनिया के सबसे एडवांस्ड और शक्तिशाली समुद्री निगरानी ड्रोनों में से एक है:
• रेंज और एंड्योरेंस: यह ड्रोन लगातार 30 से 40 घंटे से ज़्यादा समय तक हवा में रह सकता है। इसकी कुल उड़ान रेंज 11,000 किलोमीटर से ज़्यादा है, जिससे यह बिना ईंधन भरे एक ही उड़ान में हिंद महासागर के बड़े इलाकों की निगरानी कर सकता है। यह 40,000 फीट से ज़्यादा ऊंचाई पर काम कर सकता है।
• स्पीड: इसकी अधिकतम स्पीड लगभग 388 से 440 किलोमीटर प्रति घंटा (210-240 नॉट्स) है, जो इसे तेज़ी से कार्रवाई करने और गश्त लगाने के लिए बेहतरीन बनाती है।
• पेलोड क्षमता: इसमें 2,155 किलोग्राम तक का भारी पेलोड ले जाने की क्षमता है, जिसमें 4,750 पाउंड (लगभग 2,150 किलोग्राम) का बाहरी पेलोड भी शामिल है।
• सेंसर और पेलोड की क्वालिटी: यह 360-डिग्री मैरीटाइम सर्च रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रारेड (EO/IR) कैमरा, ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (ASW) के लिए सोनोबॉय डिस्पेंसर से लैस है। इसका रडार खराब मौसम और घने बादलों में भी जहाजों की सटीक मैपिंग कर सकता है।
हिंद महासागर में चीन की घेराबंदी का माकूल जवाब
भारत के लिए हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) का रणनीतिक और व्यावसायिक रूप से बहुत महत्व है। हाल के वर्षों में, इस क्षेत्र में चीनी नौसेना और उसके रिसर्च जहाजों की मौजूदगी काफी बढ़ गई है। इस माहौल में, 30 महीने की लीज़ पर दो MQ-9B सी गार्डियन ड्रोन को शामिल करना एक दूरदर्शी कदम है।
1. तुरंत ऑपरेशनल क्षमता: पूरी खरीद प्रक्रिया में बहुत समय लगता है। लीज़ एग्रीमेंट के ज़रिए, नेवी को बिना किसी देरी के तुरंत आधुनिक सर्विलांस क्षमताएं मिल गई हैं।
2. किफायती ऑपरेशन और इंसानी जोखिम में कमी: फाइटर जेट या पायलट वाले टोही विमानों के इस्तेमाल की तुलना में ड्रोन से निगरानी करना कहीं ज़्यादा किफायती है। इसके अलावा, इससे पायलटों की जान जोखिम में डाले बिना लंबे समय तक गश्त करना मुमकिन हो जाता है।
3. बेहतर समुद्री सुरक्षा: यह मलक्का जलडमरूमध्य से लेकर अदन की खाड़ी तक संदिग्ध जहाजों, पनडुब्बियों और गुप्त गतिविधियों के बारे में रियल-टाइम जानकारी भारतीय नौसेना के कमांड सेंटर तक पहुंचाएगा।