☰
×

ईरान में कट्टरपंथियों की नई जिद्द: मस्जिदों में लगे 'परमाणु बम' के नारे, सुप्रीम लीडर खामेनेई के पुराने आदेश को चुनौती!

 

ईरान में परमाणु हथियार बनाने को लेकर बहस तेज हो गई है। देश की कई मस्जिदों में शुक्रवार की नमाज के दौरान इमाम और कट्टरपंथी नेता खुले तौर पर परमाणु बम बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका और इजराइल जैसे देशों के हमलों से बचने के लिए ईरान के पास परमाणु हथियार होना जरूरी है।

यह मांग ऐसे समय में उठ रही है, जब ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य तनाव को खत्म करने के लिए बातचीत की कोशिशें भी चल रही हैं। खास बात यह है कि ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने परमाणु हथियार बनाने और इस्तेमाल करने के खिलाफ फतवा जारी किया था। अब देश के भीतर ही इस नीति को बदलने की आवाज तेज होती जा रही है।

ईरान में बदलते इस माहौल को अमेरिका और इजराइल के साथ हुए सैन्य टकराव के बाद पैदा हुई सुरक्षा चिंताओं से जोड़कर देखा जा रहा है। कई लोगों का मानना है कि अगर ईरान के पास परमाणु बम होता तो विरोधी देश उस पर हमला करने से पहले कई बार सोचते।

शुक्रवार की नमाज के बाद मस्जिदों में परमाणु बम बनाने के नारे

ईरान के अलग-अलग शहरों में शुक्रवार की नमाज के दौरान परमाणु हथियार बनाने की मांग उठ रही है। पिछले सप्ताह पश्चिमी ईरान के कुहदाश्त शहर में नमाज के बाद इमाम ने कहा कि देश को परमाणु हथियारों से लैस होना चाहिए, ताकि अमेरिका का मजबूती से मुकाबला किया जा सके।

इस बयान के बाद वहां मौजूद लोगों ने नारे लगाते हुए कहा कि परमाणु हथियार बनाकर अपनी रक्षा करना ईरान का अधिकार है।

इसी तरह राजधानी तेहरान में भी शुक्रवार की नमाज के दौरान इमाम अकबरी ने देश की परमाणु नीति में बदलाव को जरूरी बताया। उनके बयान के बाद नमाजियों ने भी परमाणु हथियार बनाने के समर्थन में नारे लगाए।

इन घटनाओं से संकेत मिल रहे हैं कि ईरान में परमाणु कार्यक्रम को लेकर पहले से चली आ रही बहस अब आम लोगों और धार्मिक मंचों तक पहुंच रही है।

अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद बदली ईरान की सोच

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की परमाणु नीति यह थी कि देश परमाणु बम न बनाए, लेकिन अपनी परमाणु क्षमता इतनी मजबूत रखे कि अमेरिका और इजराइल उस पर हमला करने से पहले डरें।

उनका मानना था कि ईरान की परमाणु क्षमता को लेकर बना रणनीतिक दबाव ही दुश्मन देशों को सैन्य कार्रवाई से रोकने के लिए पर्याप्त हो सकता है।

हालांकि, अमेरिका और इजराइल के साथ हुए सैन्य टकराव के बाद ईरान में इस सोच पर सवाल उठने लगे हैं। इस साल अमेरिकी हमले में अली खामेनेई की मौत के बाद परमाणु हथियार बनाने के समर्थकों को अपनी मांग के लिए नया आधार मिल गया है।

ईरान के जानकार मोहम्मद अली शबानी के मुताबिक, सैन्य हमलों के बाद देश के लोगों की सोच में बदलाव आया है। अब कई लोगों को लगता है कि अगर ईरान के पास परमाणु बम होता तो अमेरिका और इजराइल उस पर हमला करने से पहले कई बार विचार करते।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के एक बयान ने भी इस बहस को हवा दी। उन्होंने सितंबर में कहा था कि अगर ईरान के पास परमाणु हथियार होते तो वह उसके सुप्रीम लीडर को फोन करके उनका हाल पूछते और मदद की पेशकश करते। इस बयान को ईरान में परमाणु हथियारों की जरूरत के समर्थन में इस्तेमाल किया जा रहा है।

परमाणु समझौते से बाहर निकलने की मांग भी तेज

ईरान में सिर्फ परमाणु बम बनाने की मांग ही नहीं उठ रही, बल्कि परमाणु अप्रसार संधि यानी NPT से बाहर निकलने की आवाजें भी तेज हो रही हैं।

इस अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत ईरान ने परमाणु हथियार नहीं बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। लेकिन अब देश के कुछ नेता इस संधि से बाहर निकलने को जरूरी बता रहे हैं।

ईरान के विदेश मामलों के जानकार मोहम्मद गदरी के मुताबिक, पहले सरकार के कुछ ही लोग NPT से बाहर निकलने की बात करते थे। अब इस विचार का समर्थन करने वाले नेताओं की संख्या बढ़ रही है।

ईरान के सुरक्षा अधिकारी मोहसेन रेजाई ने भी सरकारी टेलीविजन पर कहा था कि सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है। हालांकि, अभी तक संधि से बाहर निकलने को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।

नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई का रुख क्या होगा?

ईरान में परमाणु नीति को लेकर बढ़ती बहस के बीच सबसे बड़ा सवाल नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई के रुख को लेकर है।

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वह परमाणु हथियार बनाने की मांग का समर्थन करते हैं या अपने पूर्ववर्ती अली खामेनेई की नीति को जारी रखना चाहते हैं।

दूसरी तरफ राष्ट्रपति मसूद पजशकियान और पूर्व राष्ट्रपति हसन रूहानी का रुख अब भी परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उद्देश्यों तक सीमित रखने का रहा है।

ऐसे में ईरान के नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती है। उसे एक तरफ देश की सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं का जवाब देना है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव से भी निपटना है।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से विवादों में

ईरान का परमाणु कार्यक्रम कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विवाद का विषय रहा है। ईरानी सरकार लगातार दावा करती रही है कि उसका परमाणु कार्यक्रम बिजली उत्पादन, चिकित्सा और अन्य शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।

हालांकि, अमेरिका और इजराइल समेत कई पश्चिमी देशों ने समय-समय पर आरोप लगाया है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

इस विवाद को खत्म करने के लिए साल 2015 में ईरान और अमेरिका समेत दुनिया की प्रमुख शक्तियों के बीच परमाणु समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कई प्रतिबंध लगाए गए और बदले में उस पर लगे कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने की व्यवस्था की गई।

लेकिन मई 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर लिया। इसके बाद ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया।

परमाणु बम की मांग से अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश?

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में परमाणु हथियार बनाने की मांग के पीछे सिर्फ सुरक्षा की चिंता ही नहीं, बल्कि अमेरिका पर कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है।

ईरान के जानकार ओमिद मेमरियन के मुताबिक, परमाणु बम बनाने की मांग के जरिए ईरान अमेरिका को यह संदेश देना चाहता है कि अगर बातचीत से विवाद का समाधान नहीं निकला तो वह अपनी मौजूदा परमाणु नीति बदलने पर विचार कर सकता है।

फिलहाल कतर की मदद से दोनों देशों के बीच बातचीत की कोशिशें जारी हैं। ऐसे में परमाणु हथियारों को लेकर बढ़ती बयानबाजी वार्ता को प्रभावित कर सकती है।

वहीं, मोहम्मद अली शबानी का कहना है कि ईरान में अब धार्मिक मंचों पर भी अली खामेनेई के परमाणु हथियारों के खिलाफ जारी फतवे का विरोध सुनाई देने लगा है।

क्या ईरान वास्तव में परमाणु नीति बदल देगा?

ईरान में परमाणु बम बनाने की मांग तेज होने के बावजूद अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सरकार अपनी मौजूदा नीति बदलने जा रही है। देश के भीतर इस मुद्दे पर अलग-अलग विचार मौजूद हैं।एक तरफ कट्टरपंथी नेता परमाणु हथियारों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ नेता शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम जारी रखने के पक्ष में हैं।

अगर ईरान NPT से बाहर निकलने या परमाणु हथियार बनाने की दिशा में कदम उठाता है तो अमेरिका, इजराइल और अन्य पश्चिमी देशों के साथ उसका तनाव और बढ़ सकता है। इससे पश्चिम एशिया में सुरक्षा संकट गहराने के साथ वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ने की आशंका है।फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि ईरान का नया नेतृत्व परमाणु नीति को लेकर क्या फैसला करता है और अमेरिका के साथ चल रही बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है।