×

Global Weather Crisis: यूरोप की जानलेवा गर्मी और भारत में सूखे का खतरा, आखिर किस बड़ी तबाही की ओर इशारा कर रहे हैं ये संकेत?

 

दुनिया के एक हिस्से में मौसम में बदलाव किसी दूसरी जगह के लिए आने वाली आपदा का संकेत हो सकता है। यूरोप में अभी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और ज़बरदस्त हीटवेव (लू) चल रही है, और यह घटना भारत में सूखे के बढ़ते ख़तरे से सीधे जुड़ी हुई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी का मौसम सिस्टम एक चेन की तरह आपस में जुड़ा हुआ है; यूरोप के आसमान में पैदा होने वाली तेज़ गर्मी परोक्ष रूप से भारत के मॉनसून चक्र को बिगाड़ सकती है। आइए, आसान शब्दों में उस विज्ञान को समझते हैं जो हज़ारों किलोमीटर दूर होने वाली इस मौसमी गतिविधि के पीछे है।

पृथ्वी का ग्लोबल क्लाइमेट सिस्टम क्या है?

असल में, पृथ्वी का मौसम हवा और ऊर्जा के बड़े बहाव से तय होता है। जब सूरज की तेज़ किरणें पृथ्वी और महासागरों के अलग-अलग हिस्सों को गर्म करती हैं, तो उन इलाकों की हवा गर्म होकर ऊपर उठने लगती है। ऊपर उठती हुई यह हवा वायुमंडलीय दबाव को बदल देती है। दबाव में यह बदलाव सिर्फ़ एक इलाके तक सीमित नहीं रहता; यह हवा की धाराओं के साथ हज़ारों किलोमीटर की दूरी तक फैल जाता है। नतीजतन, जब भी यूरोप के मौसम में कोई बड़ा बदलाव होता है, तो उसका असर एशिया, और खासकर भारत के मौसम के पैटर्न पर भी पड़ता है।

'टेली-कनेक्टिविटी' क्या है?

मौसम विज्ञान की भाषा में, दूर-दराज़ के इलाकों के बीच इस जुड़ाव को "टेली-कनेक्टिविटी" कहा जाता है। इसका सीधा सा मतलब है कि दुनिया के एक हिस्से में मौसम में बदलाव बहुत दूर की जगह पर भी मौसम को पूरी तरह बदल सकता है। उदाहरण के लिए, अल नीनो और ला नीना जैसी समुद्री घटनाएँ, जो प्रशांत महासागर में शुरू होती हैं, दुनिया भर के तापमान पर असर डालती हैं। इसी तरह, जब यूरोपीय महाद्वीप में तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है, तो उसका असर अटलांटिक महासागर तक फैल जाता है और भारत के मॉनसून सिस्टम में रुकावट डालने लगता है।

जेट स्ट्रीम का रास्ता बदलना और मौसम पर उसका असर

जब यूरोप में लगातार कई दिनों तक तेज़ गर्मी पड़ती है, तो उस इलाके के ऊपर वायुमंडल में एक स्थिर हाई-प्रेशर वाला क्षेत्र बन जाता है। यह स्थिति जेट स्ट्रीम - यानी ज़्यादा ऊंचाई पर बहने वाली तेज़ हवाओं - का रास्ता बदल देती है। बदला हुआ यह रास्ता फिर एशिया और हिंद महासागर के ऊपर हवाओं के पैटर्न को बिगाड़ देता है। चूंकि भारत का पूरा मॉनसून हिंद महासागर की हवाओं पर निर्भर करता है, इसलिए वहाँ कोई भी रुकावट देश के लिए बुरी खबर होती है।

**समुद्र के तापमान में उतार-चढ़ाव का मॉनसून पर असर**

भारत में बारिश के लिए अरब सागर और हिंद महासागर से आने वाली नमी बहुत ज़रूरी है। यूरोप में तेज़ हीटवेव से पास के अटलांटिक महासागर का पानी गर्म हो जाता है। अटलांटिक के तापमान में बदलाव का सीधा असर हिंद महासागर की ओर बढ़ने वाली मॉनसून हवाओं पर पड़ता है। नतीजतन, महासागर से भारत की ओर आने वाली जल-वाष्प और नमी की मात्रा में वैश्विक स्तर पर बदलाव होता है, जिससे बारिश का संतुलन बिगड़ जाता है।

**सूखे का असर और भारत के लिए बड़े जोखिम**

हालांकि यूरोप की गर्मी भारत के मॉनसून को पूरी तरह खत्म नहीं करती, लेकिन यह मॉनसून हवाओं के व्यवहार को तीन खतरनाक तरीकों से बदल देती है। पहला जोखिम यह है कि मॉनसून सामान्य समय से बहुत देर से या बहुत पहले आ जाता है। दूसरा, इसके कारण लंबे समय तक सूखा पड़ता है या बारिश में असामान्य रुकावट आती है - ऐसी स्थिति अभी कई राज्यों में देखी जा रही है। तीसरा और सबसे बड़ा डर यह है कि देश के कुछ हिस्सों में बाढ़ आ रही है, जबकि दूसरे हिस्से पानी की एक बूंद के लिए भी तरस रहे हैं।