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Global Politics: चीन में ट्रम्प-पुतिन-जिनपिंग की संभावित मुलाकात पर सस्पेंस, यूक्रेन युद्ध बना सबसे बड़ी बाधा

 

अमेरिका, रूस और चीन के बीच एक अहम कूटनीतिक बैठक की संभावनाएं बन रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चीन में एक साथ मुलाकात करना चाहते हैं। इस प्रस्ताव में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भी शामिल करने की बात कही गई है। तीनों नेताओं की यह बैठक 18-19 नवंबर को चीन के शेनझेन शहर में होने वाले APEC समिट के दौरान हो सकती है।

जानकारी के मुताबिक, पुतिन ने 19 अक्टूबर को इस बैठक का प्रस्ताव रखा था। उसी दिन ट्रम्प ने भी इसमें शामिल होने की सहमति दे दी। हालांकि, चीन ने अभी तक इस प्रस्ताव पर आधिकारिक सहमति नहीं जताई है। उसने इसे खारिज भी नहीं किया है। फिलहाल तीनों देशों के बीच बातचीत जारी है।

इस मुलाकात में सबसे बड़ी अड़चन यूक्रेन युद्ध को लेकर चीन की चिंता है। जिनपिंग रूस के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन साथ ही यूरोपीय देशों के साथ व्यापारिक और आर्थिक संबंधों को भी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते।

1945 के याल्टा समझौते की याद से चीन सतर्क

इस संभावित बैठक को लेकर चीन की चिंता का एक ऐतिहासिक पहलू भी है। करीब 80 साल पहले फरवरी 1945 में अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन के नेताओं ने क्रीमिया के याल्टा में मुलाकात की थी। उस बैठक में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप की राजनीतिक व्यवस्था और सीमाओं को लेकर अहम फैसले किए गए थे।

उस समय चीन भी जापान के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था, लेकिन उसे इस बैठक में शामिल नहीं किया गया। याल्टा में हुए एक गुप्त समझौते के तहत सोवियत संघ को चीन में कुछ विशेष अधिकार मिले थे। इनमें मंगोलिया में सैन्य मौजूदगी बनाए रखने और मंचूरिया के रेलवे तथा बंदरगाहों के इस्तेमाल जैसे प्रावधान शामिल थे।

चीन ने लंबे समय तक इस समझौते की आलोचना की। उसका मानना था कि उसकी गैरमौजूदगी में उसके क्षेत्र और अधिकारों से जुड़े फैसले किए गए। ऐसे में अब तीन बड़ी ताकतों की संभावित बैठक चीन के लिए कूटनीतिक रूप से संवेदनशील बन गई है।

यूक्रेन युद्ध पर चर्चा, लेकिन यूक्रेन ही बैठक से बाहर?

अगर ट्रम्प, पुतिन और जिनपिंग एक साथ बैठते हैं, तो यूक्रेन युद्ध बातचीत का प्रमुख मुद्दा हो सकता है। रूस चाहता है कि इस बैठक के जरिए युद्ध खत्म करने के रास्ते तलाशे जाएं। लेकिन इस प्रस्ताव पर यूक्रेन की आपत्ति भी अहम है।

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले ही कह चुके हैं कि उनके देश के भविष्य से जुड़े फैसले उसकी गैरमौजूदगी में नहीं किए जा सकते। ऐसे में अगर तीनों महाशक्तियां यूक्रेन युद्ध पर कोई समझौता करने की कोशिश करती हैं, तो सवाल उठेगा कि यूक्रेन उसे स्वीकार करेगा या नहीं।

तीनों देशों को बैठक से क्या हासिल हो सकता है?

रूस: पुतिन के लिए यह बैठक अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी भूमिका मजबूत करने का मौका हो सकती है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के साथ रूस के रिश्ते तनावपूर्ण हैं। ऐसे में अमेरिकी और चीनी राष्ट्रपति के साथ एक मंच साझा करना रूस की कूटनीतिक स्थिति को मजबूत दिखा सकता है।

अमेरिका: ट्रम्प रूस के साथ सीधे बातचीत का रास्ता खोलने और यूक्रेन युद्ध खत्म करने की कोशिशों को आगे बढ़ा सकते हैं। इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने वाले नेता के रूप में अपनी छवि पेश करने का अवसर मिलेगा।

चीन: जिनपिंग के लिए यह अमेरिका और रूस जैसे दो बड़े देशों के नेताओं की मेजबानी करने का मौका होगा। इससे चीन वैश्विक कूटनीति में अपनी भूमिका और प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकता है।

चीन के सामने दोस्ती और व्यापार बचाने की चुनौती

जिनपिंग के लिए सबसे मुश्किल फैसला यही है कि रूस के साथ करीबी रिश्ते बनाए रखते हुए यूरोप को नाराज होने से कैसे बचाया जाए। चीन लगातार कहता रहा है कि यूक्रेन युद्ध का समाधान बातचीत से निकलना चाहिए और इसमें रूस तथा यूक्रेन दोनों की भागीदारी जरूरी है।

अगर चीन ऐसी बैठक की मेजबानी करता है, जिसमें यूक्रेन के भविष्य पर चर्चा हो लेकिन यूक्रेन को ही शामिल न किया जाए, तो उसकी घोषित शांति नीति पर सवाल उठ सकते हैं। यूरोपीय देश भी इस बात को लेकर असहज हो सकते हैं कि उनके क्षेत्र में चल रहे युद्ध पर फैसला तीन अन्य देशों के नेता करें।

जिनपिंग बदल सकते हैं बैठक का प्रारूप

विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन के पास इस प्रस्ताव को पूरी तरह ठुकराने के बजाय बैठक का स्वरूप बदलने का विकल्प भी है। जिनपिंग ट्रम्प और पुतिन से अलग-अलग मुलाकात कर सकते हैं या तीनों नेताओं के बीच अनौपचारिक बातचीत कराई जा सकती है।

ऐसी स्थिति में चर्चा का केंद्र यूक्रेन युद्ध के अंतिम समाधान के बजाय वैश्विक अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और तीनों देशों के आपसी संबंध हो सकते हैं।

फिलहाल चीन की सहमति का इंतजार है। अगर बैठक होती है, तो यह वैश्विक राजनीति के लिए बड़ा घटनाक्रम हो सकता है। लेकिन यूक्रेन युद्ध और यूरोप के साथ संबंधों को लेकर चीन की चिंताएं इस मुलाकात के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।