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विदेश नीति पर ढाका में उबाल: भारत को ट्रांजिट सुविधा देने से इनकार, 1996 गंगा जल समझौते पर भी खड़े किए सवाल

 

ढाका में प्रदर्शन के दौरान लगे ‘दिल्ली नहीं, ढाका’ के नारे, गंगा जल समझौते पर भी उठाए सवाल; जापान के साथ हुए समझौतों के बाद कॉरिडोर को लेकर बढ़ी राजनीतिक चर्चाबांग्लादेश में भारत को ट्रांजिट कॉरिडोर देने की संभावित योजना को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आया है। नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के नेता नाहिद इस्लाम ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार पर आरोप लगाया है कि वह बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत को ट्रांजिट सुविधा देने के लिए कर सकती है। शुक्रवार को ढाका में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की जमीन भारत को नहीं दी जाएगी।नाहिद इस्लाम ने गंगा जल समझौते को लेकर भी सरकार से सख्त रुख अपनाने की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि नए समझौते में अगर बांग्लादेश के हितों को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो लोग इसके विरोध में सड़कों पर उतर सकते हैं।

ढाका में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, भारत विरोधी नारे लगे

नेशनल सिटिजन पार्टी के नेता नाहिद इस्लाम के नेतृत्व में ढाका में तारिक रहमान सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारियों ने बढ़ती महंगाई, बिजली संकट और पेट्रोल-डीजल व गैस की कमी को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने गृह मंत्री और ऊर्जा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी की।प्रदर्शन के दौरान भारत विरोधी नारे भी सुनाई दिए। प्रदर्शनकारियों ने ‘दिल्ली नहीं, ढाका’ के नारे लगाकर भारत को ट्रांजिट कॉरिडोर देने की किसी भी संभावित योजना का विरोध किया।

क्या है ट्रांजिट कॉरिडोर और भारत को इससे क्या फायदा होगा?

ट्रांजिट कॉरिडोर का मतलब है कि एक देश दूसरे देश की जमीन, सड़कों या परिवहन नेटवर्क का इस्तेमाल करके अपने किसी दूसरे क्षेत्र तक सामान पहुंचा सके। इससे परिवहन की दूरी और समय कम हो सकता है, साथ ही व्यापार को भी बढ़ावा मिल सकता है।भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक सामान पहुंचाने के लिए बांग्लादेश के रास्ते संपर्क मार्गों का इस्तेमाल उपयोगी हो सकता है। इससे पूर्वोत्तर भारत को बेहतर कनेक्टिविटी मिल सकती है और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के अवसर भी बन सकते हैं।इसी संभावित योजना को लेकर नाहिद इस्लाम ने आपत्ति जताई है। हालांकि, ट्रांजिट कॉरिडोर को लेकर उनके आरोपों और किसी औपचारिक समझौते के बीच अंतर करना जरूरी है।

जापान दौरे के बाद क्यों उठा ट्रांजिट कॉरिडोर का मुद्दा?

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान 26 से 29 अक्टूबर तक जापान के दौरे पर थे। इस दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार और संपर्क सुविधाओं को बढ़ाने से जुड़े मुद्दों पर बातचीत हुई।जापान बांग्लादेश में मातरबाड़ी बंदरगाह परियोजना पर भी काम कर रहा है। इस बंदरगाह के विकसित होने से समुद्री व्यापार और माल ढुलाई की सुविधाओं को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।प्रस्तुत रिपोर्ट के मुताबिक, इस बंदरगाह को भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने के लिए बांग्लादेश के रास्ते सड़क और अन्य संपर्क मार्गों के इस्तेमाल की संभावना पर चर्चा हो रही है। इस तरह के संपर्क मार्ग भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र तक माल पहुंचाने में मददगार हो सकते हैं। हालांकि, इससे जुड़ी किसी अंतिम व्यवस्था की पुष्टि अलग से जरूरी है।

बांग्लादेश सरकार का जवाब—जापान से बातचीत में भारत का मुद्दा नहीं उठा

बांग्लादेश के विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने शुक्रवार को कहा कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान के जापान दौरे के दौरान भारत या किसी अन्य तीसरे देश को लेकर चर्चा नहीं हुई थी।ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, कबीर ने स्पष्ट किया कि जापान के साथ बातचीत बांग्लादेश और जापान के आर्थिक संबंधों पर केंद्रित थी। उन्होंने कहा कि यदि किसी तीसरे देश से जुड़े विषय पर चर्चा करनी होती, तो उस देश के प्रतिनिधियों को भी बातचीत में शामिल किया जाता।इस बयान के बाद ट्रांजिट कॉरिडोर को लेकर उठे सवालों पर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।

भारत ने जापान के साथ पूर्वोत्तर से जुड़ी योजनाओं पर जोर दिया

28 अक्टूबर को भारत ने जापान के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की बात कही थी। इसमें भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़ी योजनाओं को भी महत्वपूर्ण बताया गया।विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि जापान के साथ भारत की मजबूत साझेदारी है और दोनों देशों के बीच पूर्वोत्तर भारत से संबंधित कई योजनाएं हैं। भारत इन संबंधों को और आगे बढ़ाना चाहता है।यह बयान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची की मुलाकात के कुछ घंटे बाद आया था। इसी घटनाक्रम के बीच बांग्लादेश में ट्रांजिट कॉरिडोर को लेकर राजनीतिक चर्चा शुरू हुई।

12 दिसंबर को खत्म होगा गंगा जल समझौता

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर 12 दिसंबर 1996 को 30 साल का समझौता हुआ था। इसके तहत जनवरी से मई के बीच फरक्का बैराज के पास गंगा के पानी का बंटवारा किया जाता है। यह अवधि नदी में पानी का स्तर कम रहने के कारण महत्वपूर्ण मानी जाती है।बांग्लादेश चाहता है कि नए समझौते की अवधि लंबी हो और उसमें सूखे के मौसम में भी पानी का निर्धारित हिस्सा सुनिश्चित करने वाली शर्तें शामिल हों।

दूसरी ओर, भारत का कहना है कि गंगा जल बंटवारे और दोनों देशों के बीच बहने वाली नदियों से जुड़े विषयों पर संयुक्त नदी आयोग (JRC) के माध्यम से बातचीत होती है। इस आयोग की स्थापना 1972 में की गई थी, ताकि दोनों देश साझा नदियों के प्रबंधन और संबंधित मुद्दों पर मिलकर काम कर सकें।भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सितंबर में बताया था कि गंगा जल समझौते को लेकर दोनों देशों के अधिकारियों के बीच तकनीकी स्तर पर बातचीत जारी है।

भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए अहम होगा अगला कदम

ट्रांजिट कॉरिडोर और गंगा जल समझौते के मुद्दे बांग्लादेश की राजनीति में संवेदनशील विषय बनते दिख रहे हैं। एक तरफ बेहतर संपर्क मार्ग क्षेत्रीय व्यापार और परिवहन को बढ़ावा दे सकते हैं, तो दूसरी तरफ जल बंटवारे और राष्ट्रीय हितों को लेकर दोनों देशों की चिंताएं महत्वपूर्ण हैं।अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल समझौते को लेकर बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और ट्रांजिट कॉरिडोर से संबंधित संभावनाओं पर दोनों देशों का क्या रुख सामने आता है।