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पोलैंड में संवैधानिक संकट: जज ने अदालत के प्रमुख और उपप्रमुख को किया सस्पेंड, सड़कों पर उतरे हजारों लोग; राष्ट्रपति बीच दौरा छोड़ लौटे

 

पोलैंड में प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार और विपक्ष के बीच संवैधानिक संस्थाओं को लेकर विवाद गहरा गया है। देश की संवैधानिक ट्रिब्यूनल में शुक्रवार को ऐसा घटनाक्रम हुआ, जिसने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया। एक महिला जज ने ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष बोगदान श्विएंत्सकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तलोमिए सोचान्स्की को एक महीने के लिए निलंबित करने का आदेश दिया। इसके बाद उन्होंने खुद ही अदालत के नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालने का ऐलान कर दिया।

इस फैसले के बाद विपक्ष ने सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा करने की कोशिश का आरोप लगाया। वहीं, वारसॉ में संवैधानिक ट्रिब्यूनल की इमारत के बाहर हजारों लोग जमा हो गए। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिस पर चीजें फेंकीं और अदालत परिसर में प्रवेश करने की कोशिश की। बिगड़ते हालात के बीच राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की सेनेगल की यात्रा बीच में छोड़कर वापस लौट आए। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में राष्ट्रपति का देश में मौजूद रहना जरूरी है।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच टकराव की वजह क्या है?

पोलैंड में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क सरकार का नेतृत्व करते हैं, जबकि राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की देश के संवैधानिक प्रमुख हैं। दोनों के बीच लंबे समय से न्यायपालिका में नियुक्तियों और अदालतों की स्वतंत्रता को लेकर मतभेद चल रहे हैं।

टस्क सरकार का कहना है कि पिछली सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका में किए गए बदलावों ने अदालतों की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाया। उनकी सरकार न्यायिक व्यवस्था में सुधार करके कानून का राज बहाल करना चाहती है।

दूसरी तरफ, राष्ट्रपति नावरोत्स्की और विपक्षी लॉ एंड जस्टिस पार्टी (PiS) का आरोप है कि मौजूदा सरकार न्यायिक संस्थाओं में अपनी पसंद के लोगों को स्थापित करने के लिए संवैधानिक सीमाओं को पार कर रही है।

यही विवाद अब संवैधानिक ट्रिब्यूनल तक पहुंच गया है। दोनों पक्ष अपने कदमों को संविधान और कानून के अनुरूप बता रहे हैं, जबकि एक-दूसरे पर संस्थाओं की स्वतंत्रता को कमजोर करने के आरोप लगा रहे हैं।

2015 में शुरू हुआ था न्यायपालिका का विवाद

पोलैंड में अदालतों को लेकर राजनीतिक विवाद की जड़ें वर्ष 2015 तक जाती हैं। उस समय लॉ एंड जस्टिस पार्टी की सरकार सत्ता में आई थी। इसके बाद न्यायपालिका की नियुक्तियों और कामकाज से जुड़े कई नियमों में बदलाव किए गए।

इन बदलावों में सुप्रीम कोर्ट के जजों की सेवानिवृत्ति की उम्र 70 से घटाकर 65 वर्ष करना, अदालतों के प्रमुखों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका बढ़ाना और जजों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था में बदलाव शामिल थे।

विपक्ष और यूरोपीय संघ ने इन कदमों पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और सरकार का अदालतों पर नियंत्रण बढ़ सकता है।

वर्ष 2023 में डोनाल्ड टस्क के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में आया। उसने न्यायिक व्यवस्था में सुधार और कानून के शासन को मजबूत करने का वादा किया। लेकिन सरकार बदलने के बावजूद अदालतों से जुड़े विवाद समाप्त नहीं हुए। पिछली सरकार के कार्यकाल में नियुक्त किए गए कई न्यायिक अधिकारी अपने पदों पर बने रहे, जबकि नई सरकार नियुक्तियों और नियमों में बदलाव करना चाहती थी।

छह नए जजों की नियुक्ति ने विवाद को और बढ़ाया

इस साल मार्च में पोलैंड की संसद ने संवैधानिक ट्रिब्यूनल के लिए छह नए जजों का चयन किया। लेकिन राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की ने इनमें से केवल दो जजों को अपने सामने शपथ दिलाई। बाकी चार जजों को शपथ दिलाने से उन्होंने इनकार कर दिया।

इसके बाद 9 अप्रैल को चारों जजों ने संसद में शपथ ली और राष्ट्रपति कार्यालय को इसकी जानकारी दी। इनमें अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का भी शामिल थीं।

हालांकि, राष्ट्रपति कार्यालय ने संसद में ली गई शपथ को मान्यता नहीं दी। संवैधानिक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष बोगदान श्विएंत्सकोव्स्की ने भी इन चारों जजों को अदालत में काम करने की अनुमति नहीं दी।

इससे सरकार और राष्ट्रपति के बीच विवाद और बढ़ गया। टस्क सरकार का तर्क था कि संसद द्वारा चुने गए जजों को उनके पदों पर काम करने से रोकना अनुचित है। वहीं, राष्ट्रपति और PiS का कहना था कि न्यायिक नियुक्तियों में संवैधानिक प्रक्रिया का पालन होना जरूरी है।

जज ने ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष को क्यों किया निलंबित?

शुक्रवार को विवाद ने नया मोड़ ले लिया। जज अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का ने ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष बोगदान श्विएंत्सकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तलोमिए सोचान्स्की को एक महीने के लिए निलंबित करने का आदेश दिया।

रिपोर्टों के मुताबिक, उनका आरोप था कि चार नए जजों को काम करने से रोकने के कारण अदालत का कामकाज प्रभावित हो रहा है। उन्होंने अदालत की सामान्य कार्यप्रणाली बनाए रखने के लिए यह कदम उठाने की बात कही।

इसके बाद अन्ना ने खुद ट्रिब्यूनल के नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालने की घोषणा कर दी। इस फैसले ने एक नई कानूनी और संवैधानिक बहस को जन्म दे दिया।

विपक्ष ने सवाल उठाया कि जब राष्ट्रपति ने अन्ना को जज के रूप में शपथ नहीं दिलाई है, तो उन्हें अदालत का नेतृत्व संभालने का अधिकार कैसे मिल सकता है? दूसरी तरफ, इस कदम के समर्थकों का तर्क है कि नए जजों को काम करने से रोकने के विवाद का समाधान जरूरी है।

इस पूरे मामले में दोनों पक्षों के दावों और आदेशों की वैधानिकता पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के लिए स्वतंत्र कानूनी परीक्षण आवश्यक है।

सड़कों पर प्रदर्शन, पुलिस से झड़प के हालात

अदालत के शीर्ष अधिकारियों को निलंबित करने के फैसले के बाद वारसॉ में प्रदर्शन तेज हो गए। हजारों नागरिक संवैधानिक ट्रिब्यूनल की इमारत के बाहर इकट्ठा हुए। प्रदर्शनकारियों के बीच सरकार के समर्थन और विरोध में अलग-अलग आवाजें देखने को मिलीं।

कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर चीजें फेंकीं और अदालत परिसर में प्रवेश करने की कोशिश की। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया।

प्रदर्शन में कुछ लोगों ने सरकार विरोधी पोस्टर भी दिखाए। इन पर डोनाल्ड टस्क की सरकार के खिलाफ नारे लिखे थे। विपक्षी नेताओं ने इस घटनाक्रम को संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए।

राष्ट्रपति नावरोत्स्की यात्रा बीच में छोड़कर लौटे

बढ़ते तनाव के बीच राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की का सेनेगल दौरा भी चर्चा में आ गया। रिपोर्टों के मुताबिक, वह यात्रा के दौरान ही वापस लौट आए। राष्ट्रपति ने कहा कि मौजूदा हालात में उनका देश में मौजूद रहना जरूरी है।

राष्ट्रपति की वापसी ने इस संकट की गंभीरता को रेखांकित किया है। हालांकि, उनकी वापसी को लेकर आधिकारिक तौर पर बताए गए कारणों और घटनाक्रम के बीच संबंध को अलग-अलग समझना जरूरी है।

टस्क सरकार का बचाव: कानून का राज बहाल करना जरूरी

प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने अपनी सरकार की न्यायिक सुधार नीति का बचाव किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि PiS के शासनकाल में वर्षों तक कानून का उल्लंघन हुआ और अब कानून का राज बहाल करना एक कठिन प्रक्रिया है। उनके मुताबिक, इस प्रक्रिया में कभी-कभी कड़े फैसले लेने पड़ते हैं।

टस्क सरकार का दावा है कि उसका उद्देश्य न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना और संस्थाओं में जनता का विश्वास बहाल करना है।

इसके विपरीत, विपक्ष का कहना है कि सरकार न्यायिक सुधार के नाम पर संवैधानिक संस्थाओं की मौजूदा व्यवस्था को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश कर रही है।

अब आगे क्या होगा?

पोलैंड का यह विवाद अब केवल जजों की नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता, राष्ट्रपति के अधिकार, संसद की भूमिका और सरकार की संवैधानिक सीमाओं जैसे अहम सवाल शामिल हो गए हैं।आने वाले दिनों में इस मामले की कानूनी स्थिति और संवैधानिक ट्रिब्यूनल के नेतृत्व को लेकर होने वाले फैसले बेहद महत्वपूर्ण होंगे। साथ ही, यह भी देखना होगा कि प्रदर्शन शांत होते हैं या राजनीतिक टकराव और बढ़ता है।