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ईरान युद्ध के बीच सऊदी, UAE, कतर और कुवैत अमेरिका से बड़े कॉन्ट्रैक्ट वापस लेने पर कर रहे विचार

 

मध्य-पूर्व में चल रहे ईरान से जुड़े युद्ध के कारण खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर और कुवैत जैसे बड़े तेल उत्पादक देश अमेरिका के साथ किए गए कुछ निवेश समझौतों और कॉन्ट्रैक्ट्स की समीक्षा कर रहे हैं। यदि आर्थिक दबाव बढ़ता है तो ये देश भविष्य के निवेश और सौदों को कम या वापस भी ले सकते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार इन देशों के अधिकारियों ने आंतरिक स्तर पर यह जांच शुरू की है कि क्या मौजूदा समझौतों में “फोर्स मेज्योर” (अप्रत्याशित परिस्थितियों में अनुबंध से हटने का प्रावधान) लागू किया जा सकता है। इसका उद्देश्य मौजूदा युद्ध से पैदा हो रहे आर्थिक दबाव को कम करना है।

दरअसल, ईरान से जुड़े सैन्य संघर्ष ने पूरे मध्य-पूर्व की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। तेल और गैस की आपूर्ति में बाधा, समुद्री व्यापार में रुकावट और पर्यटन-एविएशन सेक्टर में गिरावट ने खाड़ी देशों के बजट पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। साथ ही सुरक्षा खर्च बढ़ने से भी इन देशों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि खाड़ी देशों की समृद्धि लंबे समय तक दो प्रमुख कारकों पर निर्भर रही है—लगातार ऊर्जा निर्यात और क्षेत्रीय स्थिरता। लेकिन हालिया संघर्ष ने इन दोनों आधारों को कमजोर कर दिया है। जहाजरानी मार्गों में रुकावट और तेल उत्पादन में गिरावट के कारण ऊर्जा से होने वाली आय भी प्रभावित हो रही है।

ईरान युद्ध का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। होरमुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति गुजरती है, वहां तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। इससे वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है और कई देशों में महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

युद्ध के चलते कुछ खाड़ी देशों को तेल उत्पादन और निर्यात में भी कटौती करनी पड़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबे समय तक जारी रहा तो ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों पर गहरा असर पड़ सकता है।

इसी पृष्ठभूमि में खाड़ी देशों के नीति-निर्माता विदेशों में किए गए निवेश और वित्तीय प्रतिबद्धताओं का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं। इसमें अमेरिकी कंपनियों के साथ समझौते, निवेश योजनाएं, खेल प्रायोजन और अन्य अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियां भी शामिल हो सकती हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि सऊदी अरब, UAE, कतर और कुवैत जैसे देशों ने अमेरिका में अपने निवेश या कॉन्ट्रैक्ट्स को कम किया तो इसका असर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। साथ ही यह कदम अमेरिका पर कूटनीतिक समाधान तलाशने का दबाव भी बढ़ा सकता है।

कुल मिलाकर, ईरान से जुड़े मौजूदा संघर्ष ने मध्य-पूर्व की राजनीति के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी नई अनिश्चितता में डाल दिया है। खाड़ी देशों द्वारा निवेश और अनुबंधों की समीक्षा इसी बढ़ते आर्थिक दबाव का संकेत माना जा रहा है।