ईरान-अमेरिका तनाव के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता पर विवाद, चीन समर्थन में आया तो अमेरिका ने उठाए सवाल
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान खुद को एक अहम शांति मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मतभेद तेज हो गए हैं। एक तरफ चीन पाकिस्तान की मध्यस्थता की सराहना कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों में इस पर सवाल उठने लगे हैं।
पाकिस्तान की शांति पहल पर दांव
रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष को कम करने के लिए कई दौर की कूटनीतिक पहल की है। इस्लामाबाद ने खुद को एक ब्रिज कंट्री के रूप में प्रस्तुत करते हुए बातचीत और संवाद को प्राथमिकता देने की बात कही है। पाकिस्तान का कहना है कि उसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना है और किसी भी सैन्य टकराव को टालना है। हाल के महीनों में उसने दोनों पक्षों के बीच सीजफायर और वार्ता को आगे बढ़ाने की कोशिशें भी की हैं।
चीन का समर्थन रणनीतिक सहयोग बढ़ा
चीन ने पाकिस्तान की मध्यस्थता भूमिका का समर्थन करते हुए इसे क्षेत्रीय शांति के लिए रचनात्मक प्रयास बताया है। बीजिंग का मानना है कि पाकिस्तान जैसे क्षेत्रीय देशों की भागीदारी से तनाव कम करने में मदद मिल सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार चीन और पाकिस्तान का यह रुख उनके बढ़ते रणनीतिक और आर्थिक सहयोग से भी जुड़ा हुआ है खासकर मध्य पूर्व में ऊर्जा और व्यापारिक हितों के कारण।
अमेरिका की चिंता और सवाल
दूसरी ओर अमेरिका में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर असंतोष और संदेह भी सामने आया है। अमेरिकी अधिकारियों और कुछ सांसदों ने सवाल उठाए हैं कि क्या पाकिस्तान वास्तव में एक निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभा पा रहा है। कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों और एयरबेस उपयोग को लेकर विवादों ने पाकिस्तान की स्थिति को और जटिल बना दिया है।
नूर खान एयरबेस और रणनीतिक महत्व
सूत्रों के मुताबिक नूर खान एयरबेस जैसे रणनीतिक ठिकानों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय चर्चा तेज हो गई है। हालांकि पाकिस्तान ने इन आरोपों और अटकलों को खारिज करते हुए कहा है कि उसकी धरती किसी भी दूसरे देश के खिलाफ उपयोग नहीं होने दी जाएगी।
वैश्विक राजनीति में बढ़ती खींचतान
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अमेरिका तनाव अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि इसमें चीन रूस और पाकिस्तान जैसे देश भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो चुके हैं। इसी कारण क्षेत्रीय कूटनीति और अधिक जटिल होती जा रही है।