इस भारतीय शहर में हैं दुनिया की सबसे छोटी और एशिया की बड़ी मस्जिद, जानें इतिहास
ट्रेवल न्यूज़ डेस्क, रमजान का पवित्र महीना शुरू हो गया है। इस मौके पर मुस्लिम समुदाय के लोग रोजा रखते हैं। मुस्लिम समुदाय में इसे बेहद पवित्र महीना माना जाता है। इस दौरान लोग मस्जिद में जाकर नमाज अदा करते हैं। इस पूरे महीने में सूर्योदय से पहले सहरी करने के बाद लोग दिन भर बिना कुछ खाए पिए रहते हैं और फिर शाम को इफ्तारी के साथ अपना उपवास खोलते हैं।भारत का दिल कहा जाने वाला मध्य प्रदेश अपने आप में एक अद्भुत राज्य है। यहां का पर्यटन देश और दुनिया में बहुत प्रसिद्ध है। प्रदेश की राजधानी भोपाल इन्हीं जगहों में से एक है, जहां घूमने और देखने लायक कई जगहें हैं। इस शहर में आपको एशिया की सबसे छोटी और सबसे बड़ी मस्जिद भी देखने को मिल जाएगी। यहां मौजूद ताज-उल-मस्जिद एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद और ढाई कदम वाली एशिया की सबसे छोटी मस्जिद है।
300 साल पुराना इतिहास
भोपाल में गांधी मेडिकल कॉलेज के पास स्थित इस मस्जिद को फतेहगढ़ किले के गढ़ पर बनाया गया था। उस समय जब यह मस्जिद अपने मूल स्वरूप में थी, तब यहां केवल तीन लोग ही नमाज पढ़ सकते थे। इस मस्जिद का इतिहास करीब 300 साल पुराना है। इसे भोपाल शहर के संस्थापक दोस्त मोहम्मद खान ने बनवाया था। दरअसल, यह मस्जिद बुर्ज की रखवाली करने वाले सैनिकों के लिए बनाई गई थी, ताकि वे रखवाली के दौरान नमाज अदा कर सकें।
इस तरह ढाई कदम वाली मस्जिद बनाई गई
ऐसे में पहरेदारों ने दोस्त मोहम्मद खान की सलाह पर मीनार पर एक छोटी मस्जिद बना दी. हालांकि, दोनों चौकीदार कुशल कारीगर नहीं थे, जिसके कारण उन्होंने दो सीढ़ी सही ढंग से बनाईं, लेकिन तीसरी सीढ़ी बनाते समय उसमें एक ईंट नहीं रखी जा सकी. तभी से इस मस्जिद का नाम बदलकर ढाई सीढ़ी वाली मस्जिद कर दिया गया। खास बात यह है कि इस मस्जिद को भोपाल शहर की पहली मस्जिद का दर्जा भी प्राप्त है।
एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद
वहीं बात करें एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद की तो भोपाल में ताज-उल-मस्जिद का निर्माण भोपाल पर शासन करने वाली शाहजहाँ बेगम ने करवाया था। शाहजहाँ बेगम ने 901 से 1987 तक शहर पर शासन किया। उन्हें इमारतों का बहुत शौक था। जब बेगम अपने निवास के लिए ताजमहल का निर्माण कर रही थीं, तो उन्हें एक बड़ी मस्जिद का ख्याल आया। इसके बाद मस्जिद बनाने का काम शुरू किया गया, लेकिन बेगम की मौत के बाद मस्जिद अधूरी रह गई।
दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद
इसके बाद साल 1970 में मौलाना मोहम्मद इमरान खान के प्रयास से दोबारा मस्जिद का निर्माण कार्य शुरू हुआ और तभी यह मस्जिद बनकर तैयार हुई। मोतिया तालाब और ताज-उल-मसदीज को मिलाकर इस मस्जिद का कुल क्षेत्रफल 14 लाख 52 हजार वर्ग फीट है, जो मक्का-मदीना के बाद सबसे ज्यादा है। यही वजह है कि इसे दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद भी कहा जाता है।