×

अंतिम चरण में अहंकार का त्याग करना होगा: ओशो के अनुसार ‘मैं’ को छोड़ना ही आध्यात्मिक यात्रा की अंतिम सीढ़ी

 

मानव जीवन की सबसे बड़ी आंतरिक बाधाओं में से एक है अहंकार। ओशो के अनुसार अहंकार कोई वास्तविक वस्तु नहीं है, बल्कि मन द्वारा बनाई गई एक कल्पना है। यह वह भावना है जिसमें व्यक्ति अपने बारे में एक निश्चित छवि बना लेता है—“मैं कौन हूं”, “मेरा महत्व कितना है”, “लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं।” यही कल्पित पहचान धीरे-धीरे व्यक्ति को स्वयं से दूर ले जाने लगती है।

ओशो कहते हैं कि अहंकार को सीधे छोड़ना संभव नहीं है, क्योंकि जो व्यक्ति कहता है कि “मैं अपना अहंकार छोड़ दूंगा”, वह भी अपने ‘मैं’ को ही मजबूत कर रहा होता है। अहंकार को खत्म करने का रास्ता उससे लड़ना नहीं, बल्कि उसे समझना और देखना है।

अहंकार एक विचारों का समूह है

<a style="border: 0px; overflow: hidden" href=https://youtube.com/embed/oZES1d81fRE?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/oZES1d81fRE/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden;" width="640">

ओशो की दृष्टि में अहंकार कोई स्थायी चीज नहीं, बल्कि विचारों और यादों से बना हुआ एक केंद्र है। बचपन से व्यक्ति को नाम, पहचान, उपलब्धियां, संबंध और सामाजिक सम्मान मिलते हैं। धीरे-धीरे इन सबके आधार पर वह अपने चारों ओर एक मानसिक छवि बना लेता है।

जब कोई उस छवि की प्रशंसा करता है तो व्यक्ति खुश होता है और जब कोई उसे चोट पहुंचाता है तो दुख, क्रोध या अपमान की भावना पैदा होती है। ओशो के अनुसार यह चोट वास्तविक ‘स्व’ को नहीं, बल्कि बनाए गए अहंकार को लगती है।

अहंकार को देखने की कला

ओशो ध्यान और साक्षीभाव को अहंकार से मुक्ति का मार्ग बताते हैं। उनका कहना है कि अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को बिना निर्णय किए देखना सीखना चाहिए।

जब व्यक्ति अपने भीतर उठते विचारों को देखने लगता है, तो उसे धीरे-धीरे अनुभव होता है कि विचार अलग हैं और देखने वाला अलग। यही जागरूकता अहंकार की पकड़ को कमजोर करती है।

प्रशंसा और आलोचना दोनों से ऊपर उठना

अहंकार को सबसे ज्यादा ऊर्जा दूसरों की राय से मिलती है। व्यक्ति चाहता है कि लोग उसकी प्रशंसा करें, उसे महत्व दें और उसकी छवि अच्छी बनी रहे।

ओशो के अनुसार जो व्यक्ति अपनी आंतरिक शांति के लिए दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर नहीं रहता, वह धीरे-धीरे अहंकार से मुक्त होने लगता है। प्रशंसा मिलने पर भी वह उससे चिपकता नहीं और आलोचना होने पर टूटता नहीं।

ध्यान है अहंकार से मुक्ति का मार्ग

ओशो के अनुसार ध्यान का अर्थ विचारों को जबरदस्ती रोकना नहीं है, बल्कि उन्हें जागरूक होकर देखना है। जब मन शांत होता है और व्यक्ति अपने भीतर उतरता है, तो उसे अनुभव होता है कि उसका वास्तविक अस्तित्व नाम, पद, धन या सामाजिक पहचान से कहीं अधिक गहरा है।

यही अनुभव अहंकार के भ्रम को तोड़ता है।

अहंकार छोड़ना नहीं, समझना है

ओशो की शिक्षा का मूल भाव यह है कि अहंकार को दबाना नहीं चाहिए। दबाया गया अहंकार किसी दूसरे रूप में वापस आ सकता है। इसके बजाय उसे पूरी सजगता से समझना चाहिए।

जिस क्षण व्यक्ति यह देख लेता है कि उसका ‘मैं’ केवल विचारों और धारणाओं का निर्माण है, उसी क्षण अहंकार की शक्ति कम होने लगती है।

अंततः ओशो के अनुसार अहंकार का अंत किसी प्रयास से नहीं, बल्कि जागरूकता से होता है। जितनी गहरी चेतना आती है, उतना ही ‘मैं’ का भ्रम मिटता जाता है और व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप के करीब पहुंचने लगता है।