×

बीकानेर के राजा गंगासिंह ने किया था भारत की सबसे बड़ी नाहर का निर्माण ? वीडियो में देखे गंगनहर से इंदिरा गांधी नहर बनने की कहानी 

 

रेगिस्तान की धरती कहलाने वाला राजस्थान जल संकट के लिए जाना जाता है। यहां जल संकट के कारण कृषि और जनजीवन काफी प्रभावित था। लेकिन इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) ने इस रेगिस्तानी राज्य में जल संकट को काफी हद तक कम कर दिया है। यह नहर राजस्थान की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना है और इसे राज्य की जीवन रेखा माना जाता है।

<a href=https://youtube.com/embed/41v9MArD1fo?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/41v9MArD1fo/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden"" title="Indira Gandhi Nahar | इंदिरा गाँधी नहर कब बनी, कैसे बनी, कुल लम्बाई | Indira Gandhi Canal | गंगनहर" width="695">
इंदिरा गांधी नहर का ऐतिहासिक परिचय

इंदिरा गांधी नहर भारत की सबसे लंबी नहरों में से एक है, जिसका निर्माण राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों को सिंचाई और पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए किया गया था। इसका इतिहास 19वीं सदी के अंत से जुड़ा हुआ है, जब बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने अपने राज्य में जल संकट की गंभीर समस्या को हल करने के लिए नहर बनाने के बारे में सोचा था।

गंग नहर का निर्माण
बीकानेर क्षेत्र में जल की कमी हमेशा से एक चुनौती रही है। 1899 में महाराजा गंगा सिंह ने गंग नहर का निर्माण करवाया, जिसका निर्माण पंजाब से पानी लाकर बीकानेर की शुष्क भूमि की सिंचाई के लिए किया गया था। इस नहर के निर्माण से कृषि और पेयजल की उपलब्धता में सुधार हुआ, जिससे स्थानीय लोगों को बड़ी राहत मिली।

इंदिरा गांधी नहर योजना का जन्म
हालाँकि, गंग नहर अकेले बीकानेर क्षेत्र की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। महाराजा गंगा सिंह ने इसे जैसलमेर और अन्य रेगिस्तानी इलाकों तक विस्तारित करने की योजना बनाई, लेकिन दुर्भाग्य से उनकी मृत्यु के कारण यह योजना पूरी नहीं हो सकी। 1948 में महाराजा गंगा सिंह के दरबार के एक इंजीनियर कंवर सेन ने सरकार के समक्ष एक विस्तृत योजना का मसौदा पेश किया, जिसमें एक बड़ी नहर के निर्माण का प्रस्ताव था। इस नहर को पंजाब से राजस्थान तक पानी लाने के उद्देश्य से डिज़ाइन किया गया था।

स्वतंत्रता के बाद, 1948 में बीकानेर राज्य के सचिव और मुख्य अभियंता कंवर सेन ने इस विशाल नहर की योजना बनाई। पंजाब में व्यास और सतलुज नदियों के संगम पर हरिके बैराज के निर्माण के बाद इस योजना को केंद्रीय जलविद्युत आयोग ने मंजूरी दी, जिसके बाद 1955 और 1981 में नदी जल वितरण समझौते हुए। इन समझौतों के आधार पर इंदिरा गांधी नहर में 75.9 लाख एकड़ फीट पानी का उपयोग प्रस्तावित किया गया।

सरकार को इस परियोजना को मंजूरी देने में कई साल लग गए, लेकिन आखिरकार 31 मार्च 1958 को तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने नहर निर्माण कार्य का उद्घाटन किया। इससे सिंचाई 11 अक्टूबर 1961 को शुरू हुई, जब तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने नौरंगदेसर डिस्ट्रीब्यूटरी में पानी छोड़ा। शुरू में इस नहर को 'राजस्थान नहर' के नाम से जाना जाता था।

इंदिरा गांधी नहर निर्माण का पहला चरण

इंदिरा गांधी नहर का निर्माण भारत की सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण इंजीनियरिंग परियोजनाओं में से एक थी। यह नहर राजस्थान के शुष्क और रेगिस्तानी इलाकों में बनाई गई थी, जहाँ प्राकृतिक परिस्थितियाँ बेहद प्रतिकूल थीं।

निर्माण की चुनौतियाँ

थार रेगिस्तान एक विशाल और बंजर इलाका है, जहाँ गर्मियों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। साथ ही, इस इलाके में तेज़ धूल भरी आंधियाँ चलती रहती हैं, जिससे निर्माण कार्य में बाधा आती है। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद इंजीनियरों और मजदूरों ने अथक परिश्रम किया। उस समय आधुनिक मशीनरी सीमित थी, इसलिए नहर खोदने और बनाने के लिए मजदूरों और जानवरों का इस्तेमाल किया गया। मिट्टी और पत्थरों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए ऊँट और गधे का इस्तेमाल किया गया। इस काम में हज़ारों मजदूर लगे थे, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से इस विशाल परियोजना को साकार किया।

इंजीनियरों की भूमिका और अथक परिश्रम

इंजीनियर कंवर सेन और उनकी टीम ने अत्यधिक कठिनाइयों के बावजूद इस परियोजना को पूरा करने का संकल्प लिया। उन्होंने लगातार कई घंटों तक अथक परिश्रम किया ताकि यह नहर समय पर बनकर तैयार हो सके। रेगिस्तानी इलाकों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ा लक्ष्य था और इसे हासिल करने के लिए इंजीनियरों को हर चुनौती का सामना करना पड़ा।

नहर निर्माण का पहला चरण (1961)

करीब चार साल की मेहनत के बाद 1961 में राजस्थान नहर में पहला पानी पहुंचा। यह नहर निर्माण का पहला चरण था, जिसमें पंजाब के हरिके बैराज से हनुमानगढ़ जिले के मसीता तक पानी लाया गया। इस हिस्से को राजस्थान फीडर नाम दिया गया। राजस्थान फीडर के जरिए राजस्थान के अंदर पानी लाना संभव हुआ, जिससे रेगिस्तानी इलाकों में सिंचाई की सुविधा हुई और पेयजल आपूर्ति का नया स्रोत बना। यह राजस्थान की जल संकट समस्या के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

राजस्थान की जीवन रेखा का विस्तार

राजस्थान फीडर के निर्माण के बाद नहर को जैसलमेर तक ले जाने के लिए एक और नहर बनाने की जरूरत पड़ी। इसे मुख्य नहर कहा गया, जिसकी कुल लंबाई 445 किलोमीटर थी। यह नहर राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में पानी पहुंचाने का मुख्य साधन बन गई।

मुख्य नहर का निर्माण: एक कठिन चुनौती

मुख्य नहर का निर्माण पहले से भी अधिक कठिन था। थार रेगिस्तान की भौगोलिक संरचना सीधी और समतल नहीं है, बल्कि ऊंचे-नीचे टीले और असमान सतहें हैं। इस कारण पानी को ऊंचाई तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी। इस समस्या के समाधान के लिए इंजीनियरों ने लिफ्ट नहरों का निर्माण किया, जिनकी मदद से पानी को ऊंचाई तक पहुंचाया गया। इस तकनीक ने सुनिश्चित किया कि नहर का पानी सुदूर रेगिस्तानी इलाकों तक भी पहुंच सके।

1984 में पूरा हुआ काम

करीब तीन दशक की अथक मेहनत और अत्याधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों के इस्तेमाल के बाद 1984 में मुख्य नहर का निर्माण पूरा हुआ। इसके पूरा होते ही थार रेगिस्तान के एक बड़े हिस्से तक पानी पहुंचने लगा। इस नहर ने राजस्थान के लाखों लोगों के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाए। जहां पहले खेती करना असंभव माना जाता था, अब वहां उपजाऊ खेत लहलहाने लगे। पीने के पानी की उपलब्धता में सुधार हुआ और स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिले।

इंदिरा गांधी नहर का नामकरण
इंदिरा गांधी नहर का नाम भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सम्मान में रखा गया था। उन्होंने इस नहर परियोजना को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सरकार को इसके निर्माण को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित किया। शुरू में इस नहर को "राजस्थान नहर" के नाम से जाना जाता था। लेकिन 2 नवंबर 1984 को इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद सरकार ने उनके योगदान को याद करते हुए इस नहर का नाम बदलकर "इंदिरा गांधी नहर" रख दिया।