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इस दशहरे बनाएं कुछ अलग प्लान: दिल्ली-एनसीआर के पास स्थित उस अनोखे गांव की सैर करें जहाँ होती है रावण की पूजा

 

दशहरा यानी विजयादशमी पर देशभर में जगह-जगह रावण के पुतले का दहन किया जाता है। इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिल्ली-NCR के पास एक ऐसा गांव भी है, जहां दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि पूजा-पाठ और हवन किया जाता है? यह गांव उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में स्थित बिसरख है, जिसे स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रावण की जन्मस्थली माना जाता है।यहां का प्राचीन शिव मंदिर और दशहरे से जुड़ी अनोखी परंपरा इसे दूसरी जगहों से अलग बनाती है। अगर आप इस बार दशहरे पर कुछ अलग अनुभव करना चाहते हैं, तो बिसरख गांव की यात्रा आपके लिए एक दिलचस्प विकल्प हो सकती है।

आखिर क्या है बिसरख गांव का इतिहास?

बिसरख गांव का नाम ऋषि विश्रवा से जुड़ा माना जाता है, जिन्हें रामायण की परंपरा में रावण का पिता बताया गया है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, ऋषि विश्रवा इसी क्षेत्र में भगवान शिव की पूजा किया करते थे। गांव के प्राचीन शिव मंदिर को भी इसी धार्मिक परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रेनू भाटी ने अपने एक वीडियो में बिसरख गांव और यहां के मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के बारे में बताया है। उनके अनुसार, स्थानीय लोगों का विश्वास है कि रावण का जन्म इसी गांव में हुआ था और भगवान शिव की कठोर तपस्या के बाद उन्हें लंका प्राप्त हुई थी।मंदिर परिसर में शिवलिंग और अन्य धार्मिक प्रतीक मौजूद हैं, जिन्हें स्थानीय परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, बिसरख को रावण की जन्मस्थली मानने की बात ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं, बल्कि स्थानीय धार्मिक मान्यता है।

दशहरे पर क्यों नहीं जलाया जाता रावण का पुतला?

बिसरख गांव की सबसे खास पहचान दशहरे पर निभाई जाने वाली इसकी अनोखी परंपरा है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी पर रावण दहन किया जाता है, वहीं बिसरख में पूजा-पाठ और हवन को महत्व दिया जाता है।स्थानीय लोगों की मान्यता में रावण को पूर्वज के रूप में देखा जाता है। इसी धार्मिक विश्वास के कारण गांव में दशहरे पर रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं है।

यह परंपरा दिखाती है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में रामायण और विजयादशमी से जुड़ी मान्यताएं अलग-अलग रूपों में देखने को मिलती हैं। बिसरख की परंपरा को समझना उन लोगों के लिए खास अनुभव हो सकता है, जो देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को करीब से जानना चाहते हैं।

बिसरख गांव में घूमने और देखने लायक क्या है?

अगर आप बिसरख घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो यहां का प्राचीन शिव मंदिर आपकी यात्रा का प्रमुख पड़ाव हो सकता है।

यहां आप:

  • प्राचीन शिव मंदिर के दर्शन कर सकते हैं और शिवलिंग से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं के बारे में जान सकते हैं।

  • दशहरे की परंपरा को समझ सकते हैं। स्थानीय लोगों से बातचीत करके यह जान सकते हैं कि यहां रावण दहन के बजाय पूजा और हवन क्यों किए जाते हैं।

  • धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को करीब से देख सकते हैं। यह जगह उन लोगों के लिए दिलचस्प हो सकती है, जिन्हें रामायण से जुड़े स्थलों और परंपराओं में रुचि है।

मंदिर के किसी बंद हिस्से या गुफा में जाने से पहले मंदिर प्रबंधन से अनुमति और सुरक्षा संबंधी जानकारी जरूर लें।

दिल्ली-NCR से बिसरख गांव कैसे पहुंचें?

बिसरख गांव उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा वेस्ट क्षेत्र में स्थित है। दिल्ली और आसपास के NCR इलाकों से यहां सड़क मार्ग के जरिए पहुंचा जा सकता है।यात्रा पर निकलने से पहले मैप पर मंदिर की सही लोकेशन और उस दिन के ट्रैफिक की स्थिति जांच लें। अगर आप दशहरे के दिन जाने की योजना बना रहे हैं, तो मंदिर में दर्शन, पूजा और हवन के समय की जानकारी पहले लेना बेहतर रहेगा।

दशहरे पर कुछ अलग देखना चाहते हैं तो बिसरख को जानें

बिसरख गांव की पहचान केवल रावण की जन्मस्थली से जुड़ी स्थानीय मान्यता तक सीमित नहीं है। दशहरे पर रावण दहन के बजाय पूजा और हवन करने की परंपरा भी इसे खास बनाती है।अगर आप हर साल होने वाले रावण दहन से अलग कोई सांस्कृतिक अनुभव लेना चाहते हैं, तो बिसरख गांव की यात्रा पर विचार कर सकते हैं। यहां की धार्मिक परंपराओं को करीब से जानने का मौका मिलेगा और यह भी समझ आएगा कि भारत में एक ही त्योहार को अलग-अलग क्षेत्रों में कितने अलग अंदाज में मनाया जाता है।