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करणी माता मंदिर बीकानेर: राजस्थान का अनोखा मंदिर, जहां चूहों को माना जाता है पवित्र, वीडियो में जानिए 600 साल पुराना इतिहास

 

राजस्थान अपनी अनोखी धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक मंदिरों के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। बीकानेर जिले के देशनोक कस्बे में स्थित करणी माता मंदिर ऐसा ही एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, जहां हजारों चूहे मंदिर परिसर में स्वतंत्र रूप से घूमते दिखाई देते हैं। श्रद्धालु इन चूहों को पवित्र मानते हैं और इन्हें प्रेम से ‘काबा’ कहते हैं। माता करणी को समर्पित यह मंदिर अपनी आस्था, स्थापत्य कला और अनूठी परंपराओं के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है।

कौन थीं करणी माता?

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करणी माता राजस्थान की लोकदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। लोकमान्यताओं के अनुसार, उनका जन्म 14वीं सदी में हुआ था। उन्हें मां दुर्गा का अवतार माना जाता है। राजस्थान के कई क्षेत्रों में करणी माता के प्रति गहरी श्रद्धा है। बीकानेर और जोधपुर के शाही परिवारों के इतिहास में भी करणी माता का विशेष स्थान बताया जाता है।मान्यता है कि करणी माता ने राठौड़ शासकों को आशीर्वाद दिया था और राजस्थान के कई राजघरानों के लोग उन्हें अपनी आराध्य देवी मानते रहे हैं। देशनोक स्थित मंदिर इसी धार्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र है।

बीकानेर के देशनोक में स्थित है मंदिर

करणी माता मंदिर बीकानेर शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर देशनोक कस्बे में स्थित है। मंदिर में संगमरमर का सुंदर प्रवेश द्वार और चांदी की सजावटी कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। मंदिर के दरवाजों और अंदरूनी हिस्सों में की गई नक्काशी इसकी स्थापत्य सुंदरता को बढ़ाती है।मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण बीकानेर के शासक महाराजा गंगा सिंह के समय में 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में पूरा हुआ माना जाता है। मंदिर में माता करणी की प्रतिमा स्थापित है, जहां श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर में चूहों को क्यों माना जाता है पवित्र?

करणी माता मंदिर की सबसे प्रसिद्ध विशेषता यहां बड़ी संख्या में रहने वाले चूहे हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ये चूहे रणी माता के परिवार और अनुयायियों से जुड़ी आत्माओं के प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए श्रद्धालु इन्हें नुकसान नहीं पहुंचाते और इनके लिए भोजन तथा दूध की व्यवस्था करते हैं।मंदिर में चूहों को ‘काबा’ कहा जाता है। भक्त मानते हैं कि इनका दर्शन शुभ होता है। चूहों के बीच यदि कोई सफेद चूहा दिखाई दे जाए तो इसे विशेष सौभाग्य का संकेत माना जाता है। हालांकि, ये सभी मान्यताएं धार्मिक आस्था का हिस्सा हैं।मंदिर में चूहों के लिए भोजन रखा जाता है और श्रद्धालु उनकी गतिविधियों को ध्यान से देखते हैं। यहां आने वाले लोगों के लिए यह अनुभव काफी अलग होता है, क्योंकि भारत के अधिकांश मंदिरों में चूहों की इतनी बड़ी संख्या एक साथ देखने को नहीं मिलती।

करणी माता मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

लोककथा के अनुसार, करणी माता के परिवार के एक सदस्य की मृत्यु के बाद उन्होंने यमराज से उसे पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। मान्यता है कि यमराज ने उस परिवार के सदस्यों को चूहों के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। इसी कारण मंदिर में चूहों को विशेष सम्मान दिया जाता है।इस कथा के अलग-अलग रूप प्रचलित हैं। इसे ऐतिहासिक घटना के बजाय धार्मिक लोककथा के रूप में समझना चाहिए। यही मान्यता मंदिर की विशिष्ट परंपरा का आधार मानी जाती है।

नवरात्रि में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

करणी माता मंदिर में पूरे साल श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां विशेष रौनक रहती है। इन दिनों पूजा-अर्चना, धार्मिक आयोजन और दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले लोगों के साथ विदेशी पर्यटक भी मंदिर की अनूठी परंपरा को देखने पहुंचते हैं।

कैसे पहुंचें करणी माता मंदिर?

देशनोक का करणी माता मंदिर सड़क और रेल मार्ग से बीकानेर से जुड़ा हुआ है। बीकानेर से टैक्सी, निजी वाहन और स्थानीय परिवहन के माध्यम से मंदिर पहुंचा जा सकता है। देशनोक रेलवे स्टेशन भी मंदिर के पास स्थित है, जिससे रेल यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं को सुविधा मिलती है।करणी माता मंदिर राजस्थान की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां की चूहों से जुड़ी परंपरा, संगमरमर की वास्तुकला और करणी माता के प्रति श्रद्धा इसे एक विशिष्ट धार्मिक स्थल बनाती है। यह मंदिर दिखाता है कि राजस्थान की लोकआस्था और परंपराएं आज भी लोगों के जीवन में गहराई से जुड़ी हुई हैं।