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रणथंभौर कैसे बना राजस्थान की ‘टाइगर फैक्ट्री’, कभी शिकारगाह था जंगल, आज दुनिया भर में मशहूर बाघों का घर

 

राजस्थान का रणथंभौर आज देश के सबसे प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व में गिना जाता है। सवाई माधोपुर का यह जंगल देश-विदेश के पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है, लेकिन रणथंभौर की पहचान हमेशा से बाघों के सुरक्षित घर के रूप में नहीं थी। कभी यह इलाका राजघरानों की शिकारगाह हुआ करता था। समय के साथ संरक्षण की नीतियां बदलीं, शिकार पर रोक लगी और यही जंगल बाघों के संरक्षण की बड़ी प्रयोगशाला बन गया।

1955 में बना गेम सेंक्चुरी

रणथंभौर के संरक्षण की कहानी आजादी के बाद तेज हुई। राजस्थान सरकार ने 7 नवंबर 1955 को सवाई माधोपुर के जंगलों को ‘सवाई माधोपुर गेम सेंक्चुरी’ का दर्जा दिया। उस समय वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए एक गेम वार्डन और 12 गेम वॉचर्स तैनात किए गए थे।

हालांकि इसके बाद भी शिकार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। राजस्थान वन विभाग के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार, वर्ष 1961 में जयपुर के महाराजा की ओर से यहां आखिरी बड़े शिकार का आयोजन किया गया था। इसी दौरान एक बाघ का शिकार क्वीन एलिजाबेथ ने किया था।

1973 में आया बड़ा बदलाव

रणथंभौर के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ वर्ष 1973 में आया। इसी साल देश में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ शुरू किया गया और रणथंभौर भी शुरुआती नौ टाइगर रिजर्व में शामिल हुआ। इसके साथ जंगल की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई और वन्यजीव प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया।

वन विभाग ने जंगल में वन मार्गों का नेटवर्क विकसित किया, कर्मचारियों के लिए सुविधाएं तैयार कीं और वन्यजीवों के लिए पानी के स्रोत बनाए। उस समय अभयारण्य के भीतर 16 गांव मौजूद थे। वर्ष 1976 में इनमें से 12 गांवों को बाहर बसाकर पुनर्वासित किया गया। इससे वन्यजीवों के लिए ज्यादा सुरक्षित और निर्बाध क्षेत्र तैयार करने में मदद मिली।

1980 में नेशनल पार्क का दर्जा

संरक्षण की प्रक्रिया यहीं नहीं रुकी। वर्ष 1980 में सवाई माधोपुर सेंक्चुरी के 282.03 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। आज यही क्षेत्र रणथंभौर नेशनल पार्क के मुख्य हिस्से के रूप में जाना जाता है।

इसके बाद रणथंभौर में बाघों के साथ-साथ दूसरे वन्यजीवों के संरक्षण पर भी जोर बढ़ा। पानी के स्रोत, घास के मैदान और जंगल की सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होने से वन्यजीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार हुईं।

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इसलिए कहलाता है ‘टाइगर फैक्ट्री’

रणथंभौर को ‘टाइगर फैक्ट्री’ कहे जाने के पीछे इसकी बाघों को बढ़ाने और दूसरे टाइगर रिजर्वों को बाघ उपलब्ध कराने की भूमिका भी है। यहां की बाघिनों ने कई पीढ़ियों तक सफलतापूर्वक शावकों को जन्म दिया और रणथंभौर से दूसरे संरक्षित क्षेत्रों में बाघों को स्थानांतरित किया जाता रहा है।

हाल के वर्षों में भी रणथंभौर से बाघों को दूसरे रिजर्व में भेजने का सिलसिला जारी है। रामगढ़ विषधारी जैसे नए टाइगर रिजर्व में भी रणथंभौर से बाघों को स्थानांतरित किया गया है, ताकि वहां स्थायी बाघ आबादी विकसित हो सके।

राजस्थान वन विभाग के मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक रणथंभौर टाइगर रिजर्व का क्षेत्रफल 1,530.23 वर्ग किलोमीटर है। इसमें रणथंभौर नेशनल पार्क का 282.03 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र शामिल है। यह रिजर्व सवाई माधोपुर के साथ करौली, बूंदी और टोंक जिलों तक फैला हुआ है।

बाघों से पर्यटन तक बदली पूरी अर्थव्यवस्था

रणथंभौर में बाघों की मौजूदगी ने वन्यजीव पर्यटन को भी जबरदस्त बढ़ावा दिया है। देश-विदेश से पर्यटक यहां टाइगर सफारी के लिए पहुंचते हैं। जंगल में खुले में घूमते बाघों को देखने का अनुभव रणथंभौर की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है।

आज रणथंभौर केवल एक जंगल नहीं, बल्कि राजस्थान के वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन की बड़ी पहचान है। जिस क्षेत्र में कभी राजाओं के शिकार की कहानियां सुनाई जाती थीं, वही जंगल अब बाघों के संरक्षण की मिसाल बन चुका है।

रणथंभौर की यह यात्रा बताती है कि सही संरक्षण नीति, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और प्राकृतिक आवास को बचाने की कोशिश से किसी जंगल की पूरी तस्वीर बदली जा सकती है। कभी शिकारगाह रहा रणथंभौर आज राजस्थान की ‘टाइगर फैक्ट्री’ के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुका है।