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राजस्थान के थार में आज भी ज़िंदा हैं सदियों पुराने रीति-रिवाज,इस वायरल डॉक्यूमेंट्री में जानिए मरुस्थल की सांस्कृतिक गहराइयां

 

राजस्थान का थार मरुस्थल न सिर्फ अपनी भीषण गर्मी, रेत के विशाल टीलों और कठिन जीवनशैली के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां की संस्कृति और रीति-रिवाज एक ऐसी धरोहर हैं, जो भारत की विविधता को अनोखी गहराई देते हैं। यहां जीवन कठिन जरूर है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक जड़ें इतनी मजबूत हैं कि रेत की तपिश में भी उत्सव, रंग और संगीत की खुशबू महसूस की जा सकती है।थार का यह क्षेत्र राजस्थान के पश्चिमी भागों — जैसे जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर, नागौर और जोधपुर — में फैला हुआ है। यहां के लोग सदियों से मरुस्थल की कठोर परिस्थितियों में भी परंपरा, आस्था और मेहमाननवाजी को निभाते आ रहे हैं। आइए, जानते हैं कि थार की संस्कृति और रीति-रिवाज किस तरह इस क्षेत्र को विशेष बनाते हैं।

<a href=https://youtube.com/embed/QX5zI8rYV1s?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/QX5zI8rYV1s/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden"" title="Thar Desert | कैसे एक सागर से बना थार मरुस्थल, विस्तार, इतिहास, भूगोल, संस्कृति, जलवायु और वनस्पति" width="695">
1. पहनावा: रेत से लड़ते रंगों के सिपाही
थार के लोगों का पहनावा इस क्षेत्र की जलवायु और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है। पुरुष आमतौर पर सफेद या चमकीले रंग के धोती-कुर्ता, सिर पर पगड़ी (साफा) और कंधे पर अंगोछा पहनते हैं। वहीं महिलाएं बेहद रंग-बिरंगे घाघरा-चोली और सिर ढकने के लिए ओढ़नी पहनती हैं। इन कपड़ों पर बारीक कढ़ाई, मिरर वर्क और पारंपरिक डिज़ाइन थार की कारीगरी का परिचय देते हैं।इन परिधानों में छिपी आत्मा है लोकगाथाएं, समाज की मान्यताएं और एक विशिष्ट पहचान — जो हर गांव, हर जनजाति को एक-दूसरे से अलग करती है।

2. भाषा और बोली: मरुधर की मीठी आवाज़
थार क्षेत्र में मारवाड़ी, राजस्थानी, थली, मालवी जैसी अनेक बोलियां बोली जाती हैं, जिनका उच्चारण और लय बेहद मीठी होती है। यहां के लोग संवाद में आदर और अपनापन भर देते हैं। लोककथाएं, मुहावरे और कहावतें इस क्षेत्र की भाषा को और भी समृद्ध बनाते हैं।

3. लोकगीत और संगीत: रेत पर गूंजते सुरों की विरासत
थार के लोकगीत यहां की आत्मा हैं। 'पधारो म्हारे देश' जैसी लोकधुनें पर्यटकों को बार-बार राजस्थान की ओर खींच लाती हैं। मांगणियार, लांगाओं और कालबेलिया जैसी जनजातियों के पास अनमोल संगीत विरासत है। ये लोग कामायचा, सरंगी, खड़ताल, ढोलक, मोरोचंग जैसे वाद्य यंत्रों के साथ सुरों की ऐसी बौछार करते हैं जो मरुस्थल की तपन में ठंडी फुहार जैसी लगती है।

4. खान-पान: स्वाद में सादगी और सेहत का संगम
थार में भोजन मुख्यतः शाकाहारी होता है और गेहूं, बाजरा, मूंग, मोठ जैसी फसलों पर आधारित होता है। प्रमुख व्यंजन हैं –

दाल बाटी चूरमा,
गट्टे की सब्जी,
प्याज की कचौरी,
कढ़ी,
केर-सांगरी की सब्जी।
थार के व्यंजनों में घी और मसालों का भरपूर प्रयोग होता है, जो स्वाद के साथ-साथ शरीर को गर्मी से भी सुरक्षा देते हैं।

5. त्योहार और मेले: मरुस्थल में रंगों की बरसात
थार में साल भर उत्सवों का सिलसिला चलता रहता है। यहां मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहार हैं –
मरु उत्सव (जैसलमेर)
बीकानेर का ऊंट महोत्सव
गणगौर, तेej, दीपावली, होली,
करणी माता मेला (देशनोक)
इन मेलों में लोकनृत्य, गायन, पगड़ी प्रतियोगिता, ऊंट सजावट, लोककला प्रदर्शन जैसी रंगीन गतिविधियां होती हैं जो इस सूखे भूभाग में जीवन का उत्सव बन जाती हैं।

6. रीति-रिवाज और परंपराएं: सदियों पुराना सामाजिक ताना-बाना
थार के लोग परिवार, परंपरा और धर्म को अत्यधिक मान्यता देते हैं। शादी-ब्याह, नामकरण, जन्मोत्सव, ग्राम देवताओं की पूजा, गुगा नवमी, ढोला-मारू की लोकगाथा आदि यहाँ की रीति-रिवाजों में प्रमुख हैं। यहां पर जातीय पंचायतें अब भी सामाजिक न्याय और नियम तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं।

7. स्थानीय वास्तुकला और रहन-सहन
थार में पक्के मकानों के साथ-साथ झोपड़ियां भी आम हैं जिन्हें "ढाणी" कहा जाता है। मिट्टी और गाय के गोबर से लिपे-पुते ये घर गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्म रहते हैं। जैसलमेर और बाड़मेर में पीले पत्थरों से बनी हवेलियां और जैन मंदिर थार की स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण हैं।