अजमेर शरीफ दरगाह का पूरा इतिहास: ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह, वीडियो में जानिए इतिहास, धार्मिक महत्व और खुलने का समय
राजस्थान के अजमेर शहर में स्थित अजमेर शरीफ दरगाह भारत के प्रमुख सूफी धार्मिक स्थलों में से एक है। यहां सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की मजार है। उन्हें ख्वाजा गरीब नवाज के नाम से भी जाना जाता है। यह दरगाह केवल मुस्लिम समुदाय ही नहीं, बल्कि अलग-अलग धर्मों और आस्थाओं से जुड़े लोगों के लिए भी श्रद्धा का केंद्र है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार, दरगाह प्रेम, करुणा और आपसी सद्भाव की सूफी परंपरा से जुड़ी हुई है।
कौन थे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती?
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म 12वीं शताब्दी में फारस क्षेत्र में हुआ माना जाता है। वे सूफी संत थे और चिश्ती सिलसिले की शिक्षाओं को भारत में लोकप्रिय बनाने वाले प्रमुख संतों में गिने जाते हैं। उनकी शिक्षाओं में इंसानियत, दया, जरूरतमंदों की मदद और प्रेम को विशेष महत्व दिया जाता है।ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, ख्वाजा साहब लगभग 1192 ईस्वी में अजमेर पहुंचे और उन्होंने यहीं रहकर लोगों को आध्यात्मिक शिक्षा दी। वर्ष 1236 ईस्वी में उनका निधन हुआ। उनकी शिक्षाओं के कारण उन्हें ‘गरीब नवाज’ यानी गरीबों पर कृपा करने वाले के नाम से भी जाना जाता है।
कैसे बनी अजमेर शरीफ दरगाह?
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के निधन के बाद उनकी मजार पर धीरे-धीरे धार्मिक स्थल विकसित हुआ। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार, मुगल बादशाह हुमायूं ने संत के सम्मान में दरगाह का निर्माण करवाया। बाद में मुगल शासकों ने भी परिसर में विभिन्न इमारतों और मस्जिदों का निर्माण कराया।मुगल बादशाह अकबर का इस दरगाह से विशेष जुड़ाव बताया जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, अकबर अजमेर की यात्रा करते थे और दरगाह में जियारत करते थे। शाहजहां ने भी दरगाह परिसर में मस्जिद का निर्माण करवाया था। आज यहां के प्रवेश द्वार, आंगन, संगमरमर की जालियां और गुंबद इसकी ऐतिहासिक वास्तुकला को दर्शाते हैं।
दरगाह की वास्तुकला क्यों है खास?
अजमेर शरीफ दरगाह में कई ऐतिहासिक संरचनाएं हैं। इनमें निजाम गेट, शाहजहानी गेट और बुलंद दरवाजा प्रमुख हैं। मुख्य मजार के आसपास संगमरमर की जालियां और चांदी की रेलिंग दिखाई देती है। दरगाह परिसर में मस्जिदें, आंगन और अन्य धार्मिक इमारतें भी हैं।यहां आने वाले श्रद्धालु मजार पर चादर और फूल चढ़ाते हैं तथा दुआ करते हैं। परिसर में सूफी परंपरा से जुड़े धार्मिक आयोजन और कव्वाली भी लोगों को आकर्षित करते हैं।
अजमेर शरीफ दरगाह में उर्स क्यों मनाया जाता है?
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के निधन की बरसी को उर्स के रूप में मनाया जाता है। यह आयोजन इस्लामी कैलेंडर के रजब महीने में होता है। इस दौरान देश-विदेश से बड़ी संख्या में जायरीन अजमेर पहुंचते हैं। दरगाह में चादर चढ़ाने, दुआ करने और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने की परंपरा है।उर्स के समय अजमेर में श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। ऐसे में यात्रा की योजना बनाते समय आवास, यातायात और भीड़ से संबंधित जानकारी पहले जुटाना उपयोगी रहता है।
अजमेर शरीफ दरगाह खुलने का समय
उपलब्ध पर्यटन जानकारी के अनुसार, दरगाह का समय मौसम के हिसाब से अलग हो सकता है।
| मौसम |
सामान्य समय |
|---|---|
| सर्दियों में |
सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक |
| गर्मियों में |
सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक |
विशेष धार्मिक आयोजनों या व्यवस्थागत कारणों से समय में बदलाव संभव है। जाने से पहले दरगाह की आधिकारिक वेबसाइट पर जानकारी जांचना बेहतर है।
अजमेर शरीफ दरगाह कैसे पहुंचें?
अजमेर रेलवे और सड़क मार्ग से राजस्थान के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा है। दरगाह शहर के बीचोंबीच स्थित है और रेलवे स्टेशन से स्थानीय ऑटो, टैक्सी तथा अन्य साधनों से पहुंचा जा सकता है। जयपुर से अजमेर की दूरी सड़क मार्ग से लगभग 130 किलोमीटर है।