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50 साल, 5 हवेलियां और 1 परिवार... 60 साल में बनकर तैयार हुई राजस्थान की ये हवेली, वीडियो में जानिए पूरा इतिहास 

 

थार के सुनहरे रेगिस्तान के बीचोंबीच खड़ी पटवों की हवेली केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध व्यापारिक विरासत और बेजोड़ स्थापत्य कला का प्रतीक है। इस भव्य हवेली का निर्माण एक समय के प्रसिद्ध सोने-चांदी के व्यापारी गुमानचंद पटवा और उनके वंशजों द्वारा कराया गया था। पटवों की हवेली न सिर्फ जैसलमेर का गौरव है, बल्कि यह राजस्थानी शिल्पकला का ऐसा जीवंत उदाहरण है जिसे देखने दुनियाभर से सैलानी आते हैं।

<a href=https://youtube.com/embed/uAoTpo3nsb0?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/uAoTpo3nsb0/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden"" title="Patwon Ki Haveli Jaisalmer | पटवों की हवेली जैसलमेर का इतिहास, संरचना, कब-किसने बनवाई और कैसे पहुंचे" width="695">

कैसे हुई पटवों की हवेली के निर्माण की शुरुआत?

18वीं सदी के उत्तरार्ध में गुमानचंद पटवा जैसलमेर के एक बेहद समृद्ध व्यापारी थे। वे मुख्यतः सोने-चांदी के गहनों और वस्त्र व्यापार से जुड़े थे। उस समय जैसलमेर अपनी व्यापारिक गतिविधियों के लिए मध्य एशिया तक प्रसिद्ध था, और पटवा परिवार इसी समृद्धि का हिस्सा बना। गुमानचंद पटवा ने अपनी और अपने पांच बेटों की जरूरतों के लिए पांच अलग-अलग हवेलियों का निर्माण करवाने का सपना देखा।यह निर्माण कार्य 1805 के आस-पास शुरू हुआ और कहा जाता है कि इसे पूरा होने में लगभग 50 वर्षों का समय लगा। एक के बाद एक पांच हवेलियां तैयार की गईं, जो आज भी पटवों की हवेली के नाम से संयुक्त रूप से प्रसिद्ध हैं।

क्यों है पटवों की हवेली इतनी खास?

पटवों की हवेली की सबसे बड़ी खासियत इसकी जटिल नक्काशी और बेहतरीन स्थापत्य शैली है। पीले बलुआ पत्थर से बनी यह हवेली सूरज की रोशनी में सोने जैसी चमकती है, जिससे जैसलमेर को "स्वर्ण नगरी" (Golden City) का खिताब भी मिला।हवेली की दीवारों, खिड़कियों, बालकनियों और झरोखों पर इतनी बारीकी से नक्काशी की गई है कि आज के आधुनिक उपकरणों से भी वैसी सुंदरता उत्पन्न कर पाना कठिन है। हवेली का हर भाग राजसी वैभव और बारीकी से की गई कलाकारी का अद्भुत नमूना है।

आंतरिक संरचना और डिज़ाइन

पटवों की हवेली के अंदर प्रवेश करते ही मेहमानों को एक अलग दुनिया का अहसास होता है। हवेली में कई छोटे-बड़े कक्ष, आंगन और रंगीन कांचों से सुसज्जित खिड़कियाँ हैं। ऊँचे छज्जे, भव्य गलियारे और विस्तृत भित्ति चित्र हवेली की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं।हवेली का हर हिस्सा उस समय के उच्चवर्गीय जीवनशैली को दर्शाता है — बड़े-बड़े सभा कक्ष, निजी पूजा स्थलों के कक्ष, और महिलाओं के लिए बने विशिष्ट झरोखे, जहां से वे बिना देखे बाहर के दृश्य का आनंद ले सकती थीं।

व्यापारिक समृद्धि की निशानी

पटवों की हवेली सिर्फ वास्तुकला का अजूबा नहीं, बल्कि यह उस दौर की व्यापारिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा का भी प्रतीक है। कहा जाता है कि पटवा परिवार की इतनी समृद्धि थी कि उन्होंने एक पूरा मोहल्ला ही तैयार करवा दिया, जिसमें ये पांच हवेलियाँ सबसे प्रमुख थीं।इतिहासकार बताते हैं कि हवेली के निर्माण में न केवल स्थानीय कारीगरों को, बल्कि मध्य भारत और गुजरात से भी शिल्पकार बुलवाए गए थे। हर बालकनी, हर दरवाजे, हर झरोखे में उनकी मेहनत और कलात्मक दृष्टि झलकती है।

समय के साथ क्या हुआ?

समय के बदलते दौर में पटवों का परिवार जैसलमेर छोड़कर अन्य व्यापारिक केंद्रों की ओर बढ़ गया। हवेलियाँ कई वर्षों तक खाली रहीं, और फिर उनके अलग-अलग हिस्सों को विभिन्न मालिकों द्वारा देखरेख में लिया गया।वर्तमान में पटवों की हवेली के कुछ भागों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) द्वारा संरक्षित किया गया है, जबकि कुछ हिस्से निजी स्वामित्व में भी हैं। इनमें से एक प्रमुख हवेली को संग्रहालय के रूप में आम जनता के लिए खोल दिया गया है, जहां पर्यटक उस युग की जीवनशैली, वेशभूषा, फर्नीचर और दस्तावेजों को देख सकते हैं।

पर्यटन में पटवों की हवेली का महत्व

आज पटवों की हवेली जैसलमेर आने वाले हर पर्यटक की यात्रा का अहम हिस्सा बन गई है। स्वर्णिम रेत के बीच खड़ी यह हवेली इतिहास, संस्कृति और कला प्रेमियों को सम्मोहित कर लेती है। फोटोशूट, फिल्मों और डॉक्यूमेंट्रीज में भी पटवों की हवेली ने अपनी खास जगह बनाई है।राजस्थान सरकार भी इसके संरक्षण और प्रचार के लिए लगातार प्रयास कर रही है, ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ भी इस अद्वितीय धरोहर से रूबरू हो सकें।

निष्कर्ष

पटवों की हवेली न केवल एक स्थापत्य अजूबा है, बल्कि यह राजस्थान के व्यापारिक वैभव, सांस्कृतिक समृद्धि और कलात्मक उत्कर्ष का जिंदा प्रमाण भी है। यह हवेली हमें याद दिलाती है कि अगर सपने बड़े हों और मेहनत सच्ची हो, तो वे सदियों तक अमर रह सकते हैं। जैसलमेर की सुनहरी रेत पर खड़ी पटवों की हवेली आज भी गौरव से अपना इतिहास बयाँ कर रही है — एक व्यापारी की दूरदर्शिता, कारीगरों की मेहनत और कला के प्रति अगाध प्रेम की कहानी।