Raja Ram Mohan Roy:आज ही के दिन हुआ था भारतीय समाज में सुधार लाने वाले राजा राम मोहन रॉय का जन्म
संसार में तरह तरह के लोग हर पल जन्म लेते है। कुछ सदी के अंत तक याद रखे जाते है,कुछ का रुतबा युगो युगो तक रहता है। कुछ धूमकेतु के सितारे के तरह सामने एते है ओर अस्त हो जाते है,तोकुछ बिना किसी प्रसिद्धि के ही अपनों के बीच अपना जीवन समाप्त कर लेते है। लेकिन संसार को वास्तव में आवश्यकता सिर्फ उसकी है जो समाज प्रति अपनी जिमेदारियो को समझे ओर उसे पूरा करे।
जो समाज की रूढ़िवादी बेड़ियों को तोड़ने का न सिर्फ सहस रखता हो,बल्कि उन्हें तोड़कर आने वाली पीढ़ी के लिए एक बेहतरीन समाज,बेहतरीन संसार का निर्माण करे। राजा राम मोहन रॉय उन्ही लोगो में से एक थे। 22 मई १७७२ को जन्मे राजा राम मोहन रॉय का योगदान भारतीय इतिहासमे कितना ख़ास हैं,शायद उसका मापना असंभव हो। क्यूंकि अंग्रेजो से आजादी तो हर हिन्दुस्तानी चाहता था,लेकिन विचारो में आजादी का हर दौर में विरोध किया जाता है।
आजकल के दौर में तरक्की पसंद होना अच्छी बात माना जाता है,मगर पहले ऐसा नहीं हुआ करता था। राजा राममोहन रॉय को इसी वजह से कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। वे आजादी के साथ देश में सुधारो के लिए भी लड़ रहे थे। मगर इसके लिए उनका संघर्ष कितना कठिन रहा होगा इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की कहते है की जब सतीप्रथा का राजा राम मोहन रॉय द्वारा विरोध किया गया तो उनकी माँ तकने उन्हें घर से बाहर निकलने को कह दिया।
न केवल सती प्रथा,बल्कि वे एक समय में एक से अधिक विवाह,जातिवाद,कर्मकांड,बाल विवाह,पर्दा प्रथा जैसी उस समय की प्रचलित कुप्रथाओ का विरोध किया और उन्हें समाज से बाहर का रस्ता भी दिखाया। इसी वजह से उन्हें देश के सामाजिक सुधार का जनक भी कहा जाता है।
उन्हें राजा की उपाधि मुग़ल मुगल सम्राट अकबर द्वितीय द्वारा दी गयी थी। वास्तव में राम मोहन रॉय लगभग हर उस क्षेत्र में शामिल थे जिससे समाज बनता है। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना योगदान देते हुए ‘संवाद कौमुदी’, मिरात-उल-अखबार, बंगदूत जैसे अखबार निकले और इस क्षेत्र को भी एक नया आयाम दिया
खैर शायद उनपर लिखने लगे तो एक किताब भी कम पड़ जाए,पर बस इतना कहा जा सकता है की जब वे उस दौर में समाज की छलनी में से बुराई को छानने का काम कर सकते है तो संभवतः इस दौर में ऐसा कर पाना जरा भी मुश्किल नहीं है। और वैसे भी जीने के लिए एक ही जीवन है,तो फिर क्यों कोई भी काम किसी और के हवाले छोड़ना। इसी के साथ राजा राम मोहन रॉय के एक QUOTE के साथ विदा लेते है
“जरा सोचिए कि आपकी मृत्यु का दिन कितना भयानक होगा। दूसरे बोलते रहेंगे और आप वापस बहस करने में सक्षम नहीं होंगे।”