हिमालय के लिए क्यों बढ़ रहा खतरा? जानिए क्या होते हैं हैंगिंग ग्लेशियर और क्यों चिंतित हैं वैज्ञानिक
जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच वैज्ञानिकों ने हिमालयी क्षेत्र को लेकर एक बार फिर चिंता जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड और हिमालय के अन्य हिस्सों में मौजूद कई हैंगिंग ग्लेशियर (Hanging Glaciers) पहले की तुलना में अधिक अस्थिर होते जा रहे हैं। ऐसे ग्लेशियरों के टूटने से अचानक बाढ़, हिमस्खलन और बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।
क्या होते हैं हैंगिंग ग्लेशियर?
हैंगिंग ग्लेशियर वे बर्फीले हिमखंड होते हैं जो ऊंचे पर्वतीय ढलानों या खड़ी चट्टानों से चिपके रहते हैं। सामान्य ग्लेशियरों की तरह ये घाटियों में नहीं फैले होते, बल्कि पहाड़ों की ऊपरी ढलानों पर "लटके" हुए दिखाई देते हैं।
इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में लगातार दबाव में रहते हैं। यदि इनकी संरचना कमजोर हो जाए तो इनका कोई हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिर सकता है।
जलवायु परिवर्तन से क्यों बढ़ रहा खतरा?
वैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ते वैश्विक तापमान का असर हिमालयी बर्फ पर साफ दिखाई दे रहा है।
मुख्य कारण:
- तापमान बढ़ने से बर्फ तेजी से पिघल रही है।
- ग्लेशियरों के भीतर दरारें (क्रैक्स) विकसित हो रही हैं।
- बर्फ और चट्टानों के बीच का प्राकृतिक जुड़ाव कमजोर पड़ रहा है।
- बार-बार होने वाली बारिश और तापमान में उतार-चढ़ाव स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं।
इन कारणों से हैंगिंग ग्लेशियरों के टूटने की संभावना बढ़ जाती है।
टूटने पर क्या हो सकता है?
यदि कोई बड़ा हैंगिंग ग्लेशियर टूटता है तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
- विशाल हिमस्खलन (Avalanche)
- अचानक बाढ़ (Flash Flood)
- ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF)
- सड़क, पुल और गांवों को नुकसान
- तीर्थयात्रियों और पर्वतारोहियों के लिए खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और चारधाम यात्रा जैसे मार्गों पर विशेष निगरानी की आवश्यकता है।
उत्तराखंड में क्यों बढ़ी चिंता?
उत्तराखंड में कई ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऐसे ग्लेशियर मौजूद हैं। हाल के वर्षों में ग्लेशियरों के टूटने और हिमस्खलन की घटनाओं ने वैज्ञानिकों को अधिक सतर्क कर दिया है। चारधाम यात्रा, ट्रैकिंग मार्गों और सीमावर्ती इलाकों में हजारों लोगों की आवाजाही के कारण जोखिम और बढ़ जाता है।
वैज्ञानिक क्या सलाह दे रहे हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि:
- ग्लेशियरों की नियमित सैटेलाइट निगरानी की जाए।
- संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाएं।
- यात्रा मार्गों पर मौसम और हिमस्खलन संबंधी अलर्ट मजबूत किए जाएं।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए दीर्घकालिक कदम उठाए जाएं।
हिमालय को एशिया का "वाटर टावर" कहा जाता है, क्योंकि यहां से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों को पानी उपलब्ध कराती हैं। ऐसे में हैंगिंग ग्लेशियरों की बढ़ती अस्थिरता केवल पहाड़ी क्षेत्रों ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के लिए चिंता का विषय मानी जा रही है।