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उत्तराखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: POCSO मामले में युवक के खिलाफ कार्रवाई रद्द, कोर्ट ने कहा – प्यार वासना नहीं

 

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक POCSO (पॉक्सो) मामले में युवक के खिलाफ दर्ज केस को रद्द करने का बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने यह निर्णय यह कहते हुए दिया कि प्यार वासना नहीं है और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए युवक के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई उचित नहीं है।

जानकारी के अनुसार, जिस युवक के खिलाफ केस दर्ज किया गया था, वह विवाहित है। पीड़िता और युवक अब कानून रूप से विवाहित हैं और उनका एक बच्चा भी है। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता भी युवक के साथ अपना जीवन बिताना चाहती थी और उन्होंने यह स्पष्ट किया कि इस मामले में कोई जबरदस्ती या बलात्कार जैसी स्थिति नहीं थी।

हाई कोर्ट ने कहा कि POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों और नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, लेकिन इस मामले में मामला वयस्कों और उनकी आपसी सहमति से जुड़ा था। कोर्ट ने यह भी ध्यान रखा कि पीड़िता अब युवक के साथ रह रही है और उनका पारिवारिक जीवन चल रहा है।

विधिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला POCSO कानून के दायरे और उसके उद्देश्य के बीच एक संवेदनशील संतुलन स्थापित करता है। उन्होंने बताया कि कोर्ट ने मामले की पूरी पारिवारिक और सामाजिक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी नाबालिग या जबरदस्ती के मामले में POCSO की धारा के तहत कार्रवाई जरूरी है, लेकिन इस मामले में सहमति और विवाह की वास्तविकता के आधार पर केस रद्द करना उचित माना गया। यह फैसला न्यायपालिका की व्यक्तिगत परिस्थितियों और सामाजिक संदर्भ को समझने की क्षमता को भी दर्शाता है।

वकीलों और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला सहयोग और सहमति के बीच का अंतर समझाने का उदाहरण है। उन्होंने जोर देकर कहा कि POCSO कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और प्रत्येक मामले की परिस्थिति के अनुसार न्यायपालिका निर्णय लेती है।

इसके अलावा, विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि इस फैसले से कानूनी सटीकता और मानव संवेदनशीलता के बीच संतुलन को मजबूती मिली है। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि सहमति और प्यार के मामलों को गलत तरीके से अपराध में नहीं बदला जाना चाहिए।

कुल मिलाकर, उत्तराखंड हाई कोर्ट का यह फैसला POCSO कानून के उद्देश्य, सामाजिक और पारिवारिक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए लिया गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि न्यायपालिका व्यक्तिगत परिस्थितियों और वास्तविकता के आधार पर संवेदनशील और विवेकपूर्ण निर्णय ले सकती है।