रक्षाबंधन पर देवीधुरा में फिर सजेगा अनोखा ‘बग्वाल युद्ध’, कभी दी जाती थी नरबलि
उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित देवीधुरा का बग्वाल मेला अपनी अनोखी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। रक्षाबंधन के दिन यहां होने वाला बग्वाल युद्ध इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण होता है। इस वर्ष भी 28 अगस्त को खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान में चार खामों की सेनाएं आमने-सामने होंगी। सदियों पुरानी इस परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के देवीधुरा पहुंचने की उम्मीद है।
देवीधुरा में मां वाराही देवी के प्रति लोगों की गहरी आस्था है। मान्यता है कि मां वाराही को प्रसन्न करने के लिए प्राचीन समय में यहां नरबलि की परंपरा थी। स्थानीय मान्यता के अनुसार, बाद में एक वृद्धा ने मां वाराही की तपस्या कर अपने इकलौते पौत्र की बलि रोकने की प्रार्थना की। देवी के प्रसन्न होने के बाद मानव बलि के स्थान पर ऐसा युद्ध शुरू हुआ, जिसमें एक व्यक्ति के बराबर रक्त बहने को बलि के प्रतीक के तौर पर माना गया। इसी परंपरा ने आगे चलकर बग्वाल का स्वरूप लिया।
चार खामों के बीच होता है मुकाबला
बग्वाल में चार प्रमुख खामों के लोग हिस्सा लेते हैं। इनमें चम्याल, गहड़वाल, वालिक और लमगड़िया खाम शामिल हैं। मैदान में दोनों ओर से लोग पारंपरिक ढाल लेकर पहुंचते हैं और एक-दूसरे की ओर वस्तुएं फेंकते हुए इस अनोखे युद्ध का हिस्सा बनते हैं।
पहले इस दौरान पत्थरों की बौछार की जाती थी, जिससे कई लोग घायल भी होते थे। वर्ष 2013 के बाद अदालत के निर्देशों के चलते बग्वाल के स्वरूप में बदलाव किया गया और पत्थरों की जगह फल और फूलों का इस्तेमाल शुरू हुआ। हालांकि, युद्ध की पारंपरिक भावना और धार्मिक महत्व आज भी बरकरार है।
28 अगस्त को जुटेंगी ‘सेनाएं’
इस वर्ष देवीधुरा में 13 दिवसीय बग्वाल मेले की शुरुआत 23 अगस्त से हो चुकी है और इसका समापन 4 सितंबर को पुरस्कार वितरण के साथ होगा। मेले का मुख्य आकर्षण 28 अगस्त को होने वाली बग्वाल होगी। इसके लिए खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान को तैयार किया जा रहा है और चारों खामों के लोग अपनी तैयारियों में जुटे हैं।
बग्वाल के दौरान प्रतिभागी अलग-अलग रंगों की पारंपरिक साफे पहनते हैं। चम्याल खाम गुलाबी, गहड़वाल खाम केसरिया, वालिक खाम सफेद और लमगड़िया खाम पीले रंग के साफे पहनकर मैदान में उतरते हैं। हाथों में ढाल लेकर फल और फूलों से होने वाली बग्वाल इस परंपरा को विशिष्ट बनाती है।
आस्था के साथ सामाजिक सद्भाव का संदेश
देवीधुरा की बग्वाल केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। अलग-अलग समुदायों और खामों के लोग इसमें एक साथ भाग लेते हैं। बग्वाल समाप्त होने के बाद प्रतिभागी एक-दूसरे से गले मिलकर कुशलक्षेम पूछते हैं।
हर साल देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस अनोखी परंपरा को देखने देवीधुरा पहुंचते हैं। इस बार भी 28 अगस्त को होने वाली बग्वाल को लेकर स्थानीय लोगों में खास उत्साह है। सदियों पुरानी नरबलि की मान्यता से शुरू हुई यह परंपरा आज बदलते समय के साथ हिंसा को कम करते हुए फल और फूलों के प्रतीकात्मक युद्ध में बदल चुकी है।