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नैनीताल की 70% से ज्यादा पहाड़ियां खिसक रहीं, वैज्ञानिकों ने जताई 1880 जैसी त्रासदी की

 

नैनीताल की पहाड़ियों पर हुए नए वैज्ञानिक अध्ययन में 70 फीसदी से ज्यादा क्षेत्र में लगातार भू-गतिविधि सामने आई है। 1880 में 151 लोगों की जान लेने वाली त्रासदी के बाद अब फिर खतरे की चेतावनी सामने आई है।

नैनीताल की पहाड़ियों को लेकर वैज्ञानिकों की एक नई रिसर्च ने चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन में सामने आया है कि नैनीताल की 70 फीसदी से अधिक पहाड़ियों में लगातार भू-गतिविधि दर्ज की जा रही है। वैज्ञानिकों ने संवेदनशील इलाकों की नियमित निगरानी और समय रहते जरूरी कदम उठाने की जरूरत बताई है। रिपोर्ट में नैनीताल के इतिहास में हुई 1880 की विनाशकारी भूस्खलन की घटना को भी गंभीर चेतावनी के तौर पर सामने रखा गया है।

सात साल के सैटेलाइट डेटा का हुआ विश्लेषण

इस अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 से 2024 के बीच Sentinel-1A सैटेलाइट से मिले आंकड़ों का विश्लेषण किया। करीब 68.62 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जमीन की हलचल का अध्ययन किया गया। शोध के मुताबिक पहाड़ियों में भू-गतिविधि की औसत दर करीब 10 से 19 मिलीमीटर प्रति वर्ष रही। वर्ष 2023 में जमीन की गतिविधि अपेक्षाकृत अधिक दर्ज की गई। यह शोध 10 सितंबर को Springer Nature के ‘Bulletin of Engineering Geology and the Environment’ में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में बलियानाला क्षेत्र को विशेष रूप से संवेदनशील बताया गया है। दक्षिण-पूर्वी बलियानाला में जमीन हर साल करीब 5 से 11 मिलीमीटर की दर से धंस रही है। वहीं, शेर-का-डांडा रिज में जमीन के ऊपर उठने की गतिविधि भी दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसे बदलाव पहाड़ी क्षेत्र की भू-स्थिरता को समझने के लिए महत्वपूर्ण संकेत हैं।

24.9 फीसदी क्षेत्र हाई रिस्क जोन में

रिसर्च में 68.62 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को भूस्खलन के खतरे के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया। इनमें 17.08 वर्ग किलोमीटर यानी करीब 24.9 फीसदी क्षेत्र को उच्च जोखिम वाला पाया गया। 40.87 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मध्यम जोखिम और 10.66 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र कम जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया। उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में बलियानाला और नैनीताल झील भ्रंश का दक्षिण-पूर्वी हिस्सा प्रमुख है।

वैज्ञानिकों ने भू-गतिविधियों को क्षेत्र की विभिन्न भूगर्भीय संरचनाओं से भी जोड़ा है। इनमें मेन बाउंड्री थ्रस्ट, नैनीताल झील भ्रंश, कृष्णनगर भ्रंश, मनोरा भ्रंश, रामगढ़ थ्रस्ट और ज्योल थ्रस्ट जैसी संरचनाएं शामिल हैं। इसके अलावा भारी बारिश, कमजोर ढलान और मानवीय गतिविधियां भी भूस्खलन का खतरा बढ़ा सकती हैं।

1880 में 151 लोगों की गई थी जान

नैनीताल में बड़े भूस्खलन का इतिहास काफी पुराना है। 18 सितंबर 1880 को शेर-का-डांडा क्षेत्र में हुए विनाशकारी भूस्खलन में 151 लोगों की मौत हुई थी। इस घटना के बाद शहर में जल निकासी और पहाड़ी क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर कई व्यवस्थाएं विकसित की गई थीं।

हाल के वर्षों में भी नैनीताल के अलग-अलग हिस्सों में भूस्खलन और जमीन धंसने की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे में नई सैटेलाइट रिसर्च ने पहाड़ी क्षेत्र की निगरानी को लेकर चिंता फिर बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार सैटेलाइट आधारित निगरानी से धीरे-धीरे खिसक रही जमीन और संभावित भूस्खलन वाले क्षेत्रों की पहचान पहले से की जा सकती है।

रिसर्च के निष्कर्ष नैनीताल जैसे संवेदनशील पहाड़ी शहर में निर्माण, जल निकासी और आपदा प्रबंधन की निगरानी के महत्व को रेखांकित करते हैं। हालांकि अध्ययन से भविष्य में 1880 जैसी घटना निश्चित रूप से होने का निष्कर्ष नहीं निकलता, लेकिन भू-गतिविधियों के संकेतों को गंभीरता से लेने की जरूरत जरूर सामने आती है।