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च्यवनप्राश में उपयोग होने वाली हिमालयी जड़ी-बूटियां लुप्त होने के कगार पर, जाने क्यों हो रहा ऐसा 

 

आयुर्वेदिक औषधियों में प्रमुख स्थान रखने वाले च्यवनप्राश में उपयोग होने वाली कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से कम होती जा रही हैं। पर्यावरणीय बदलाव, बढ़ता दोहन और जलवायु परिवर्तन को इसके प्रमुख कारणों में माना जा रहा है।आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार, च्यवनप्राश में प्रयुक्त कई जड़ी-बूटियां पारंपरिक रूप से हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं। इनमें से कुछ पौधे बेहद धीमी गति से बढ़ते हैं और अनियंत्रित संग्रहण के कारण इनके अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन जड़ी-बूटियों का उपयोग केवल पारंपरिक औषधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इन्हें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, कमजोरी दूर करने और मानसिक तनाव कम करने में सहायक माना जाता है। कुछ आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार, यह सांस संबंधी समस्याओं में भी लाभकारी होती हैं।हालांकि, वैज्ञानिक समुदाय का यह भी कहना है कि इन औषधीय गुणों पर और अधिक शोध की आवश्यकता है, ताकि इनके प्रभावों को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मानकों पर परखा जा सके।

Ayurveda में इन जड़ी-बूटियों का उपयोग सदियों से किया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार आज इन पौधों के संरक्षण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।पर्यावरणविदों का कहना है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र बेहद संवेदनशील है और यदि इसी तरह प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी रहा तो कई महत्वपूर्ण औषधीय पौधे विलुप्त हो सकते हैं।

Himalayan region में जैव विविधता को बचाने के लिए सरकार और स्थानीय समुदायों द्वारा कई प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें औषधीय पौधों की खेती और संरक्षण कार्यक्रम शामिल हैं।विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि जंगली जड़ी-बूटियों के अत्यधिक संग्रहण पर रोक लगाई जाए और इनके वैकल्पिक संवर्धन के लिए खेती को बढ़ावा दिया जाए, ताकि पारंपरिक औषधियों की उपलब्ध भी बनी रहे और पर्यावरणीय संतुलन भी सुरक्षित रहे। फिलहाल इस मुद्दे पर शोध और संरक्षण कार्यक्रमों को तेज करने की आवश्यकता बताई जा रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह प्राकृतिक धरोहर सुरक्षित रह सके।