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Champawat News: चंपावत के गोशनी गांव में आज भी जिंदा है लाल बहादुर शास्त्री से जुड़ी याद, 1952 से 2 अक्टूबर को निभाई जा रही परंपरा

 

उत्तराखंड के चंपावत जिले का गोशनी गांव स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी एक खास ऐतिहासिक परंपरा के लिए जाना जाता है। स्थानीय मान्यता और उपलब्ध जानकारी के अनुसार, आजादी के आंदोलन के दौरान लाल बहादुर शास्त्री ने अंग्रेजों से बचते हुए इस गांव में कुछ समय बिताया था। इसी दौरान उन्होंने यहां स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी रणनीति तैयार की थी।

गोशनी गांव में आज भी महात्मा गांधी की जयंती और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के अवसर पर हर साल 2 अक्टूबर को एक पुरानी परंपरा निभाई जाती है। बताया जाता है कि वर्ष 1952 से गांव में इस दिन विशेष आयोजन और लोगों को भोजन कराने की परंपरा चली आ रही है।

अंग्रेजों से बचकर गांव में पहुंचे थे शास्त्री

स्थानीय इतिहास से जुड़ी जानकारी के अनुसार, स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अंग्रेजी शासन से बचने के लिए लाल बहादुर शास्त्री ने गोशनी गांव में शरण ली थी। यहां रहते हुए उन्होंने आंदोलन से जुड़े लोगों के साथ संपर्क और रणनीति पर चर्चा की थी। ग्रामीण आज भी इस घटना को अपने गांव के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।

शास्त्री जी के गांव से जुड़े होने की स्मृति को आगे बढ़ाने के लिए ग्रामीणों ने वर्षों से 2 अक्टूबर को विशेष आयोजन की परंपरा बनाए रखी है।

1952 से चली आ रही परंपरा

बताया जाता है कि वर्ष 1952 से हर साल 2 अक्टूबर को गोशनी गांव में लोगों को भोजन कराया जाता है। यह आयोजन स्वतंत्रता आंदोलन की याद और लाल बहादुर शास्त्री से जुड़े गांव के ऐतिहासिक संबंध की स्मृति में किया जाता है।

गांव के बुजुर्ग इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाते रहे हैं। 2 अक्टूबर को होने वाले आयोजन में स्थानीय लोग शामिल होते हैं और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े इतिहास को याद करते हैं।

इतिहास को सहेजने की कोशिश

गोशनी गांव की यह परंपरा स्थानीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों को जीवित रखने का माध्यम बनी हुई है। हर साल 2 अक्टूबर को होने वाले कार्यक्रम के जरिए ग्रामीण अपने गांव से जुड़े इस इतिहास को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।