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UP MLC नतीजों ने BJP की चुनौती बढ़ाई, 2027 से पहले गोरखपुर से आगरा तक भितरघात की चोट

 

उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों के नतीजों ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने संगठनात्मक चुनौतियों को उजागर किया है। भाजपा छह सीटें जीतकर 2020 का अपना आंकड़ा बरकरार रखने में सफल रही, लेकिन वाराणसी, लखनऊ और आगरा जैसे क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी (सपा) की सफलता ने चुनावी समीकरणों को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। टिकट बंटवारे से जुड़ी नाराजगी, बागी नेताओं की भूमिका और मतगणना के दौरान हुए विवाद भी चुनाव के केंद्र में रहे।

वाराणसी और लखनऊ में भाजपा को झटका

वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र है, जबकि लखनऊ से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सांसद हैं। इन दोनों क्षेत्रों में सपा के प्रदर्शन ने भाजपा के लिए राजनीतिक समीक्षा की स्थिति पैदा की है। सपा ने वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र पर अपनी सीट बरकरार रखी और लखनऊ स्नातक सीट भाजपा से छीन ली। आगरा शिक्षक सीट पर भी सपा के आकाश अग्रवाल ने जीत दर्ज की।

भाजपा ने मेरठ की दोनों सीटों, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट, लखनऊ शिक्षक सीट, आगरा स्नातक सीट और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट पर जीत हासिल की। इस तरह पार्टी ने छह सीटों का अपना पुराना आंकड़ा कायम रखा, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हार ने उसकी चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं।

गोरखपुर में करीबी मुकाबला और मतगणना पर विवाद

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र से जुड़े गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने निर्दलीय उम्मीदवार राजीव यादव को केवल 307 मतों से हराया। मतगणना के दौरान निर्दलीय उम्मीदवार और सपा प्रत्याशी संजयन त्रिपाठी ने अनियमितताओं के आरोप लगाए। संजयन त्रिपाठी ने मतगणना का बहिष्कार भी किया। हालांकि, कथित गड़बड़ियों के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

यह मुकाबला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि चुनाव से पहले भाजपा के कुछ नेताओं की नाराजगी और दूसरे उम्मीदवारों के समर्थन की खबरें सामने आई थीं। टिकट नहीं मिलने से असंतुष्ट नेताओं की भूमिका ने पार्टी के भीतर तालमेल को लेकर सवाल खड़े किए।

आगरा में भी सामने आई अंदरूनी खींचतान

आगरा शिक्षक सीट पर सपा उम्मीदवार आकाश अग्रवाल की जीत के बाद भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक समन्वय की समीक्षा महत्वपूर्ण हो गई है। चुनाव से पहले टिकट को लेकर असंतोष और नेताओं के पाला बदलने की चर्चाएं भी सामने आई थीं। हालांकि, किसी सीट पर हार का पूरा कारण केवल भितरघात को मानना उचित नहीं होगा। इसके लिए स्थानीय समीकरणों, उम्मीदवारों की स्थिति और मतों के आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण जरूरी है।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन की परीक्षा

एमएलसी चुनाव के नतीजे भाजपा और सपा दोनों के लिए आगामी विधानसभा चुनाव से पहले संगठन की स्थिति परखने का अवसर हैं। भाजपा के सामने अपनी सीटें बरकरार रखने के साथ स्थानीय असंतोष को दूर करने और नेताओं के बीच तालमेल मजबूत करने की चुनौती है। वहीं, सपा इन नतीजों को अपनी बढ़ती चुनावी मौजूदगी के रूप में पेश कर सकती है।

हालांकि, शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता विधानसभा चुनाव के मतदाताओं से अलग होते हैं। इसलिए इन नतीजों को 2027 के विधानसभा चुनाव का सीधा पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता। फिर भी, टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक एकजुटता जैसे मुद्दे आने वाले चुनाव में दोनों दलों की रणनीति का अहम हिस्सा बने रहेंगे।