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25 साल से चल रही थी नाबालिग अपहरण केस की सुनवाई, इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी- 'तारीख पर तारीख न्याय की पहचान नहीं बन सकती'

 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पुराने अपहरण मामले की सुनवाई के दौरान देश की न्यायिक व्यवस्था में होने वाली देरी पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "'तारीख पर तारीख' की स्थिति देश की न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बनने दी जा सकती।" कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई, जब उसके सामने वर्ष 2001 से लंबित एक अपहरण मामले की सुनवाई चल रही थी।

2001 में दर्ज हुआ था मामला

मामला वर्ष 2001 का है, जब एक पिता ने अपनी 15 वर्षीय बेटी के अपहरण का आरोप एक व्यक्ति पर लगाते हुए मामला दर्ज कराया था। इसके बाद से यह केस विभिन्न न्यायिक प्रक्रियाओं से गुजरता रहा और वर्षों तक अदालत में लंबित रहा।करीब ढाई दशक बाद भी मामले का अंतिम निस्तारण नहीं हो पाने पर हाईकोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की।

न्याय में देरी पर कोर्ट की नाराजगी

सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने कहा कि न्याय मिलने में अत्यधिक देरी न केवल पीड़ित पक्ष के लिए कष्टदायक होती है, बल्कि इससे आम लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा भी प्रभावित होता है।कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य समय पर न्याय उपलब्ध कराना है और अनावश्यक रूप से मामलों का वर्षों तक लंबित रहना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

"तारीख पर तारीख" पर कड़ी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि फिल्मों में मशहूर हुआ "तारीख पर तारीख" वाला संवाद वास्तविक न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बनना चाहिए। अदालत ने कहा कि न्यायिक संस्थाओं का दायित्व है कि मामलों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित किया जाए, ताकि पीड़ितों और उनके परिवारों को वर्षों तक इंतजार न करना पड़े।

लंबित मामलों पर उठे सवाल

इस मामले ने एक बार फिर देश की अदालतों में लंबित मामलों और न्याय मिलने में होने वाली देरी पर बहस को तेज कर दिया है। न्यायिक विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए प्रभावी कदम उठाना जरूरी है।

समयबद्ध न्याय की जरूरत पर जोर

हाईकोर्ट की टिप्पणी को न्यायिक सुधारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि न्याय तभी सार्थक है, जब वह समय पर मिले। वर्षों तक लंबित रहने वाले मामलों से न्याय प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठते हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करने की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित करती है।