मेरठ के गगोल गांव में दशहरे पर नहीं जलेंगे चूल्हे, 1857 की क्रांति में 9 पूर्वजों को फांसी देने की मान्यता; शहीदों की याद में होता है हवन
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के गगोल गांव में दशहरे की परंपरा बाकी जगहों से अलग है। यहां दशहरे के दिन घरों में चूल्हे नहीं जलाए जाते। गांव में मान्यता है कि 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने नौ पूर्वजों को फांसी दे दी थी। उनकी शहादत की याद में ग्रामीण दशहरे को शोक के रूप में मनाते हैं और शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए हवन करते हैं।
जहां देशभर में विजयादशमी पर रावण दहन और उत्सव का माहौल रहता है, वहीं गगोल गांव में इस दिन स्वतंत्रता संग्राम में जान गंवाने वाले पूर्वजों को याद किया जाता है। यह परंपरा गांव के इतिहास और लोगों की भावनाओं से जुड़ी हुई है।
1857 की क्रांति से जुड़ी है मान्यता
गांव के लोगों के अनुसार, 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने गगोल गांव के नौ लोगों को फांसी दी थी। ग्रामीण इन लोगों को स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के रूप में याद करते हैं। मान्यता के मुताबिक, दशहरे के दिन ही इन पूर्वजों को फांसी दी गई थी। इसी वजह से गांव में विजयादशमी का दिन उत्सव के बजाय शोक और श्रद्धांजलि के रूप में मनाया जाता है।
इस परंपरा के जरिए ग्रामीण नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों के बलिदान और देश की आजादी के संघर्ष से जुड़ी कहानियां सुनाते हैं।
दशहरे पर घरों में नहीं जलते चूल्हे
गगोल गांव में दशहरे के दिन चूल्हे नहीं जलाने की परंपरा है। ग्रामीण इस दिन सामान्य उत्सव से दूरी रखते हैं और शहीदों की याद में समय बिताते हैं। यह परंपरा गांव की सामूहिक स्मृति और स्वतंत्रता संग्राम में पूर्वजों के बलिदान के प्रति सम्मान को दर्शाती है।
दशहरे के दिन गांव में होने वाली गतिविधियां भी इसी परंपरा के अनुरूप रहती हैं। ग्रामीण अपने पूर्वजों को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
शहीदों की याद में किया जाता है हवन
गांव में शहीदों की स्मृति में हवन किया जाता है। इस दौरान पूर्वजों के बलिदान को याद कर उन्हें नमन किया जाता है। ग्रामीणों के लिए यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने इतिहास से जुड़े रहने का माध्यम भी है।
हवन और श्रद्धांजलि के जरिए गांव के लोग आने वाली पीढ़ियों को बताते हैं कि आजादी की लड़ाई में आम लोगों ने भी बड़ी कुर्बानियां दी थीं।
परंपरा में जीवित है बलिदान की स्मृति
गगोल गांव की यह परंपरा दिखाती है कि ऐतिहासिक घटनाएं किस तरह किसी समुदाय की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन जाती हैं। दशहरे पर चूल्हे नहीं जलाना और शहीदों की याद में हवन करना ग्रामीणों के लिए अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान जताने का तरीका है।
हालांकि, नौ पूर्वजों को फांसी दिए जाने से जुड़ी स्थानीय मान्यता के ऐतिहासिक विवरणों की पुष्टि संबंधित अभिलेखों से अलग से की जानी चाहिए। गांव में प्रचलित यह परंपरा आज भी स्वतंत्रता संग्राम के बलिदान को याद रखने का माध्यम बनी हुई है।