काम शुरू करने से पहले शटर बंद! सपा का IPAC को टाटा, UP में अब कौन पार लगाएगा नैया?
Samajwadi Party ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लेते हुए चुनावी रणनीति बनाने वाली संस्था IPAC से दूरी बना ली है। खास बात यह है कि यह फैसला ऐसे समय आया है जब विधानसभा और लोकसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक दल अपनी तैयारियों में जुटे हुए हैं। राजनीतिक गलियारों में इस कदम को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है कि आखिर समाजवादी पार्टी ने काम शुरू होने से पहले ही IPAC को “टाटा” क्यों कह दिया।
सूत्रों के मुताबिक, पार्टी और IPAC के बीच कई मुद्दों पर सहमति नहीं बन पा रही थी। संगठनात्मक रणनीति, उम्मीदवार चयन और चुनावी कैंपेन को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद सामने आए थे। बताया जा रहा है कि समाजवादी पार्टी नेतृत्व अपनी पारंपरिक राजनीतिक शैली और जमीनी कार्यकर्ताओं पर अधिक भरोसा करना चाहता है, जबकि IPAC आधुनिक चुनावी मैनेजमेंट और डेटा आधारित रणनीति पर जोर दे रही थी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला सपा के लिए जोखिम भरा भी साबित हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में देश की कई बड़ी पार्टियां चुनावी रणनीतिकारों और प्रोफेशनल एजेंसियों की मदद लेती रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से बेहद अहम राज्य में अब समाजवादी पार्टी की चुनावी नैया कौन पार लगाएगा।
Akhilesh Yadav लगातार भाजपा के खिलाफ मजबूत विपक्षी राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि पार्टी के सामने संगठन को मजबूत करने, बूथ स्तर तक पहुंच बढ़ाने और नए वोट बैंक को जोड़ने जैसी कई बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं। ऐसे में IPAC जैसी प्रोफेशनल एजेंसी से दूरी बनाना विपक्षी राजनीति के लिहाज से बड़ा फैसला माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सपा अब पुराने समाजवादी ढांचे और अपने पारंपरिक कैडर मॉडल पर भरोसा जता सकती है। पार्टी ग्रामीण इलाकों, पिछड़े वर्गों और युवाओं के बीच सीधे संवाद की रणनीति अपना सकती है। हालांकि डिजिटल प्रचार और डेटा मैनेजमेंट के इस दौर में बिना किसी बड़ी चुनावी रणनीतिक टीम के चुनावी मैदान में उतरना आसान नहीं माना जा रहा।
वहीं विपक्षी दलों के बीच भी इस फैसले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। भाजपा समर्थक इसे सपा की “कमजोर रणनीति” बता रहे हैं, जबकि पार्टी के नेता इसे आत्मनिर्भर राजनीतिक मॉडल की ओर कदम बता रहे हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या समाजवादी पार्टी बिना किसी बड़े चुनावी सलाहकार के उत्तर प्रदेश की राजनीतिक लड़ाई में मजबूत चुनौती पेश कर पाएगी, या फिर यह फैसला आने वाले चुनावों में पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है। आने वाले महीनों में सपा की नई रणनीति और संगठनात्मक तैयारी पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।