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शंकराचार्य–माघ मेला विवाद ने पकड़ा सियासी तूल, वीडियो में जानें सरकार और ब्यूरोक्रेसी पर बढ़ा दबाव

 

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और माघ मेला प्रशासन के बीच चल रहा विवाद अब उत्तर प्रदेश सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यह मामला केवल धार्मिक या प्रशासनिक दायरे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब इसमें सियासी बयानबाजी, संत समाज की नाराज़गी और ब्यूरोक्रेसी की असहमति भी खुलकर सामने आने लगी है। बीते करीब 10 दिनों से जारी यह टकराव अब सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहा है।

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इस पूरे विवाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की फायरब्रांड नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती के बयान ने आग में घी डालने का काम किया है। उमा भारती ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का खुलकर समर्थन करते हुए माघ मेला प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य से सबूत मांगना प्रशासन की मर्यादा के खिलाफ है। उमा भारती ने साफ शब्दों में कहा कि शंकराचार्य एक सम्मानित धार्मिक पद है और उनसे इस तरह का व्यवहार उचित नहीं है।

उमा भारती के बयान के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह बात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक भी पहुंचाई जाए। उनके इस बयान को सीधे तौर पर सरकार और प्रशासन पर दबाव बनाने के रूप में देखा जा रहा है। संत समाज के एक बड़े वर्ग में भी इसे लेकर नाराज़गी बढ़ती दिख रही है।

मामले में अब श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर केस के मुख्य याचिकाकर्ता दिनेश फलाहारी बाबा की एंट्री ने विवाद को और गंभीर बना दिया है। दिनेश फलाहारी बाबा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को खून से लिखा पत्र भेजा है। इस पत्र में उन्होंने मांग की है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को पूरे सम्मान के साथ गंगा स्नान कराने की व्यवस्था की जाए। साथ ही, जिन अधिकारियों ने उनके साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया है, उन्हें माफी मांगने के आदेश दिए जाएं। खून से लिखे गए इस पत्र ने धार्मिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।

इधर, माघ मेला प्रशासन और अविमुक्तेश्वरानंद के बीच चल रहा टकराव अब सीधे ब्यूरोक्रेसी तक पहुंच गया है। अयोध्या में तैनात GST के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने इस्तीफे में कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा मुख्यमंत्री के लिए इस्तेमाल किए गए अपशब्दों से वे बेहद आहत हैं। प्रशांत कुमार सिंह का कहना है कि वे अब और अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते, इसलिए उन्होंने यह कदम उठाया।

एक वरिष्ठ अधिकारी का इस तरह से इस्तीफा देना प्रशासनिक हलकों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। इसे योगी सरकार के प्रति ब्यूरोक्रेसी के एक वर्ग के समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह भी साफ हो रहा है कि विवाद ने शासन-प्रशासन को दो धड़ों में बांट दिया है।