NEET आंदोलन से फिर बनी राहुल-अखिलेश की जुगलबंदी, वीडियो में जाने जंतर-मंतर से यूपी की सड़कों तक दिखी एकजुटता; क्या बदलेगा सियासी समीकरण?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जुगलबंदी चर्चा का विषय बनी हुई है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में 'दो लड़कों' की जोड़ी अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी थी, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद दोनों दलों की बढ़ती नजदीकियों ने विपक्ष को नई ऊर्जा दी है। अब NEET पेपर लीक और छात्रों के मुद्दे पर जंतर-मंतर से लेकर संसद और उत्तर प्रदेश की सड़कों तक दोनों नेताओं की साझा रणनीति साफ नजर आ रही है। हाल के दिनों में राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने छात्रों से जुड़े मुद्दों पर एक सुर में केंद्र सरकार को घेरा है। संसद के भीतर विपक्ष ने सरकार से जवाब मांगा, वहीं संसद के बाहर भी दोनों नेताओं ने प्रदर्शन और विरोध कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाई। इस साझा आक्रामकता को विपक्ष की नई रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
यूपी में दिखा गठबंधन का असर
राहुल गांधी और अखिलेश यादव की गिरफ्तारी के विरोध का सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिला। लखनऊ समेत कई जिलों में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं व कार्यकर्ताओं ने संयुक्त प्रदर्शन किए। कई जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प भी हुई, जबकि दोनों दलों के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया।इन प्रदर्शनों में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के छात्र संगठनों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। छात्रों के मुद्दे को लेकर दोनों दलों ने संयुक्त रूप से सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की और इसे युवाओं के भविष्य से जुड़ा अहम सवाल बताया।
युवाओं के मुद्दे पर विपक्ष की नई रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों को विपक्ष युवाओं से जुड़ने के बड़े अवसर के रूप में देख रहा है। NEET विवाद ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को एक साझा राजनीतिक मंच दिया है, जहां दोनों दल युवाओं के हितों की आवाज उठाने का प्रयास कर रहे हैं।
भाजपा के सामने नई चुनौती?
हालांकि यह देखना दिलचस्प होगा कि राहुल-अखिलेश की यह राजनीतिक केमिस्ट्री उत्तर प्रदेश की राजनीति में कितना प्रभाव छोड़ती है। एक ओर विपक्ष युवाओं के असंतोष को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी अपने मजबूत संगठन, सरकार की योजनाओं और राजनीतिक रणनीति के दम पर इस चुनौती का सामना करने में जुटी है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी भी गठबंधन की सफलता केवल साझा विरोध तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसे चुनावी स्तर पर वोटों में बदलना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष का मनोबल जरूर बढ़ा है, लेकिन आगामी चुनावों में इसका वास्तविक असर मतदाताओं के फैसले पर निर्भर करेगा।
आने वाले चुनावों पर रहेगी नजर
फिलहाल NEET विवाद और छात्रों के आंदोलन ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को लगातार उठाकर युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं, जबकि भाजपा इसे राजनीतिक अवसरवाद करार देते हुए अपने पक्ष को मजबूती से रख रही है।आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि छात्रों के मुद्दे पर बनी राहुल गांधी और अखिलेश यादव की यह नई जुगलबंदी उत्तर प्रदेश की राजनीति में विपक्ष के लिए कितना बड़ा राजनीतिक लाभ लेकर आती है, या फिर भाजपा अपनी चुनावी रणनीति से इस चुनौती को प्रभावहीन करने में सफल रहती है।